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काम की बात: क्या होता है प्लेसिबो? जानिए कोरोना मरीजों और वैक्सीन से किस तरह जुड़ा है ये

Thu, 29 Jul 2021 03:36 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
Medically Reviewed by Dr. Rajan Gandhi

डॉ. राजन गांधी

जनरल फिजिशियन, चाइल्डकेयर हॉस्पिटल, उजाला सिग्नस हॉस्पिटल
डिग्री- एम.बी.बी.एस, डिप्लोमा सी.एच
अनुभव- 25 वर्ष


पिछले साल दिसंबर में हरियाणा के गृहमंत्री अनिल विज जब कोरोना वैक्सीन लगने के बाद भी संक्रमित हो गए थे, तब वैक्सीन को लेकर खूब सवाल उठे थे कि आखिर कोरोना के टीके कारगर हैं या नहीं? इसके अलावा दिसंबर में ही कोवाक्सिन के ट्रायल में शामिल एक वॉलंटियर की मौत भी हो गई थी, जिसके बाद कई लोगों ने वैक्सीन पर सवाल उठाए थे। इन घटनाक्रमों के बीच एक और चीज की चर्चा खूब हुई थी और वो है प्लेसिबो। तब भारत बायोटेक नामक कंपनी ने कहा था कि तीसरे चरण के ट्रायल में 50 फीसदी लोगों को वैक्सीन दी जाती है जबकि अन्य 50 फीसदी को प्लेसिबो दिया जाता है। अब चूंकि वैक्सीन और उसकी प्रभावकारिता के बारे में तो लोग जान गए हैं, लेकिन प्लेसिबो के बारे में अभी भी बहुत सारे लोग नहीं जानते हैं। हालांकि यह कोई नया शब्द नहीं है, बल्कि काफी समय से प्रचलन में है। आइए जानते हैं कि आखिर ये प्लेसिबो होता क्या है? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
हाल ही में हुए एक अध्ययन में यह पाया गया है कि कोरोना मरीजों पर एजिथ्रोमाइसिन दवा सिर्फ एक प्लेसिबो की तरह काम करती है, यानी दवा खाने के बाद मरीजों को लगता है कि उन्हें आराम मिल गया है, जबकि असल में ऐसा नहीं होता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्लेसिबो एक ऐसी चीज है जो वैक्सीन या दवाई की तरह शरीर पर किसी तरह का कोई प्रभाव नहीं डालती, बल्कि डॉक्टर किसी व्यक्ति पर दवा लेने का कितना और कैसा मानसिक असर पड़ता है, ये जानने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
विशेषज्ञ कहते हैं कि प्लेसिबो को अगर आम भाषा में समझें तो यह एक ऐसी चिकित्सा पद्धति है, जिसमें दवा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है, बल्कि भ्रम पैदा करके या अहसास के आधार पर मरीज का इलाज किया जाता है। यानी किसी मरीज को दवा की तरह दिखने वाली गोली या 'नकली' इंजेक्शन दिया जाता है, लेकिन असल में वह दवा नहीं होती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
प्लेसिबो चिकित्सा पद्धति को 'भ्रामक उपचार' भी कहा जाता है। दरअसल, किसी मरीज को अगर लगता है कि वो दवाई खाकर या इंजेक्शन लेकर ठीक हो जाएगा, तो यह संभव है कि उसे दवाई की तरह दिखने वाली गोली दे दी जाए और उसे खाकर वह ठीक हो जाए। हालांकि प्लेसिबो चिकित्सा पद्धति का कोई वैज्ञानिक आधार तो नहीं होता, लेकिन कई बार मरीज इससे ठीक हो भी जाते हैं। 

स्रोत और संदर्भ:  
Effect of Oral Azithromycin vs Placebo on COVID-19 Symptoms in Outpatients With SARS-CoV-2 Infection 
https://jamanetwork.com/journals/jama/fullarticle/2782166 

अस्वीकरण नोट: यह लेख जामा नेटवर्क नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन और डॉ. राजन गांधी से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। किसी भी तरह की बीमारी के लक्षण हों अथवा आप किसी रोग से ग्रसित हों तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें।   
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