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Study: 20-30 की उम्र में मनोरोगों के रहे हैं शिकार तो भविष्य में इस जानलेवा समस्या का हो सकता है खतरा

Sun, 21 May 2023 04:52 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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तनाव के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : istock
मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, यही कारण है कि स्ट्रेस जैसी समस्याओं के कारण हाई ब्लड प्रेशर और गंभीर स्थितियों में हार्ट की समस्या का जोखिम बढ़ जाता है। अध्ययनकर्ता सभी लोगों को अपने मानसिक स्वास्थ्य के विशेष देखभाल की सलाह देते रहे हैं। एक हालिया शोध में भी इससे होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर अलर्ट किया गया है।

अध्ययन के अनुसार, जिन लोगों को 20-30 की आयु के बीच मानसिक स्वास्थ्य की समस्या रही है, ऐसे लोगों में भविष्य में  दिल का दौरा या स्ट्रोक होने का जोखिम अधिक हो सकता है।

इस शोध में अध्ययनकर्ताओं की टीम ने जोर दिया है कि मानसिक बीमारी वाले लोगों में एक साथ कई शारीरिक समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे लोगों को विशेष देखभाल और बचाव की आवश्यकता है, जिससे जानलेवा स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सके।
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बढ़ सकती हैं हृदय की समस्याएं - फोटो : iStock
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं और हार्ट स्ट्रोक का खतरा

यूरोपियन जर्नल ऑफ प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी में प्रकाशित हुए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के शरीरिक दुष्प्रभावों को लेकर लोगों को अलर्ट रहने की सलाह दी है।
 
शोधकर्ताओं ने दक्षिण कोरिया में रहने वाले 20-39 वर्ष की आयु के 65 लाख से अधिक लोगों के डेटा का विश्लेषण किया, जिनमें पहले दिल के दौरे या स्ट्रोक की कोई हिस्ट्री या जोखिम नहीं था। अध्ययन की शुरुआत में लगभग 13% लोगों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का पता चला। अन्य की तुलना में ऐसे लोगों में अगले 8 वर्षों के दौरान दिल का दौरा या स्ट्रोक का जोखिम अधिक देखा गया।
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युवावस्था के दौरान स्ट्रेस-एंग्जाइटी की समस्या - फोटो : iStock
अध्ययन में क्या पता चला?

अध्ययनकर्ताओं ने पाया कि युवावस्था के दौरान स्ट्रेस-एंग्जाइटी या डिप्रेशन के शिकार लोगों में भविष्य में हार्ट अटैक का खतरा, अन्य लोगों की तुलना में 58% अधिक था। वहीं इन लोगों में स्ट्रोक होने का 42% ज्यादा पाया गया। मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं की गंभीरता और प्रकार के आधार पर शारीरिक समस्याओं का खतरा बढ़ा हुआ हो सकता है। 

दिल के दौरे के शिकार ज्यादातर लोग पोस्टट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी), सिज़ोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर या पर्सनालिटी डिसऑर्डर के शिकार रह चुके थे।  

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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के दुष्प्रभाव - फोटो : Pixabay
रोगियों की कम हो सकती है लाइफ एक्सपेक्टेंसी

शोध में पाया गया कि पीटीएसडी या खाने के विकार वाले लोगों में स्ट्रोक का जोखिम ज्यादा नहीं था हालांकि जो लोग डिप्रेशन या स्ट्रेस के शिकार रहे थे, उनमें दिल के दौरे और स्ट्रोक दोनों का खतरा अधिक था।

सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के प्रोफेसर और अध्ययन के शोधकर्ता चैन सून पार्क कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य समस्या वाले मरीजों की लाइफ एक्सपेक्टेंसी, अन्य लोगों की तुलना में कम हो सकती है, इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि उनमें दिल का दौरा या स्ट्रोक जैसी जानलेवा समस्याओं को खतरा अधिक होता है। 
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मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत - फोटो : iStock
क्या है अध्ययन का निष्कर्ष?

शोधकर्ता कहते हैं,  हमारे अध्ययन में यह भी पाया गया है कि बड़ी संख्या में युवा-वयस्कों में कम से कम एक मानसिक स्वास्थ्य की समस्या है, जो उनमें दिल का दौरा और स्ट्रोक के जोखिमों को बढ़ाने वाली हो सकती है। सीडीसी के अनुसार, अकेले अमेरिका में 5 में से 1 वयस्कों को मानसिक बीमारी है, 25 में से 1 को सिज़ोफ्रेनिया या प्रमुख अवसाद जैसी गंभीर समस्या है।

यह भविष्य के लिए गंभीर सूचक है, जिसके लिए अभी से बचाव के उपायों का पालन शुरू कर देना चाहिए। ऐसे लोगों को लाइफस्टाइल में सुधार करना बहुत आवश्यक है। लाइफस्टाइल विकार आपमें हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम और भी बढ़ा देते हैं। 



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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