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Alert: आने वाली है मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की सुनामी, आंकड़े बता रहे डरावनी सच्चाई; आखिर क्या है वजह?

Sat, 02 May 2026 08:11 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

डिजिटल ओवरलोड, नींद की कमी, शारीरिक गतिविधियों का कम होना मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बड़ा कारण है। दुनियाभर में इसका खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक 2030 तक दो तिहाई से ज्यादा ब्रिटिश युवाओं में मेंटल हेल्थ समस्याओं का खतरा हो सकता है।
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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा - फोटो : Amarujala.com
लाइफस्टाइल और खान-पान में गड़बड़ी ने हमारी सेहत के कितना नुकसान पहुंचाया है, किस तरह से कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां लोगों को चपेट में लेती जा रही हैं इसके बारे में हम सभी लगातार सुनते-पढ़ते रहते हैं। मेडिकल रिपोर्ट्स पर नजर डालें तो पता चलता है कि मौजूदा समय में शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मेंटल हेल्थ की समस्याओं का खतरा भी तेजी से बढ़ता जा रहा है।

तेजी से भागती इस दुनिया में बच्चे और युवा पहले से कहीं ज्यादा दबाव और तनाव में हैं। सोशल मीडिया पर परफेक्ट दिखाने और लोकप्रियता पाने की होड़, पढ़ाई और करियर का दबाव दिमाग पर लगातार बोझ बढ़ाता जा रहा है। इसका मेंटल हेल्थ पर सीधा असर देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि एंग्जायटी, डिप्रेशन और स्ट्रेस जैसी समस्याएं काफी आम हो गई हैं।

एक हालिया रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ और बढ़ने का खतरा है, जिससे लोगों की उत्पादकता तो कम होगी है साथ ही इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की आशंका है।

ब्रिटेन की एक नई रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि साल 2030 तक दो-तिहाई ब्रिटिश किशोरों को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने की आशंका है।
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युवाओं में बढ़ती स्ट्रेस-एंग्जाइटी की समस्या - फोटो : Freepik.com
किशोरों-युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा

मेडिकल रिपोर्ट से पता चलता है कि यूके में 15 से 19 साल के 51 प्रतिशत किशोरों में अभी मानसिक या व्यवहार संबंधी समस्याएं जैसे डिप्रेशन, एंग्जायटी और एडीएचडी का खतरा देखा जा रहा है। अगर यही स्थिति जारी रहे, तो अगले चार साल में यह आंकड़ा बढ़कर 64 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं ब्रिटेन में युवाओं में रोजगार के संकट और भी बढ़ाने वाली हो सकती हैं।
 
  • ये रिपोर्ट ब्रिटेन पर आधारित है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया के अधिकतर देशों में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति देखी जा रही है।
  • भारत भी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के गंभीर बोझ को झेल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक देश के 10 फीसदी से ज्यादा युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं हैं।
  • चिंता की बात ये है कि इनमें से केवल 10-15 प्रतिशत लोगों का ही इलाज हो रहा है। बहुत से लोगों को अपनी बीमारी के बारे में जानकारी ही नहीं है।
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स्ट्रेस-एंग्जाइटी के कारण होने वाले जोखिम - फोटो : Adobe Stock
उत्पादकता-आर्थिक विकास पर भी असर

हाल ही में यूके के स्वास्थ्य और सामाजिक देखभाल राज्य सचिव वेस स्ट्रीटिंग ने माना था कि ब्रिटेन में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का निदान काफी बढ़ा है। पिछले महीने जारी किए गए आंकड़ों से पता चलता है कि इंग्लैंड में 2012 में दर्ज की गई मेंटल हेल्थ की समस्याओं के मामलों से अब ढाई गुना से भी मरीज हैं।  
 
  • युवाओं ने एंग्जाइटी, डिप्रेशन, घबराहट, फोबिया और पैनिक अटैक जैसी मानसिक समस्याओं की शिकायत की। 
  • विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर इस स्थिति से निपटने के लिए कोई ठोस और कड़ा कदम नहीं उठाया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या देश की उत्पादकता, आर्थिक विकास और सामाजिक गतिशीलता के मार्ग में बड़ी बाधा बन सकती है।

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युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य - फोटो : Adobe stock
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

इंग्लैंड के एक्सेटर यूनिवर्सिटी में बाल मनोविज्ञान के प्रोफेसर विल शील्ड कहते हैं, बचपन या किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम तेजी से रिपोर्ट किया जा रहा है। आंकड़े दुनियाभर में तेजी से बिगड़ते मानसिक स्वास्थ्य की ओर इशारा करते हैं, ब्रिटेन के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य विशेष रूप से बहुत तेजी से बिगड़ रहा है।
 
  • यूके के युवाओं का मानसिक स्वास्थ्य जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और मलेशिया जैसे देशों के इसी उम्र के युवाओं की तुलना में ज्यादा खराब पाया गया है।
  • विशेषज्ञों ने पाया कि सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल, पढ़ाई का दबाव, आर्थिक अनिश्चितता मेंटल हेल्थ की दिक्कतों को तेजी से बढ़ाता जा रहा है। 
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सोशल मीडिया और बढ़ता स्क्रीन टाइम खतरनाक - फोटो : Freepik.com
क्यों बढ़ गई हैं मेंटल हेल्थ की समस्याएं?

मेडिकल रिपोर्ट्स में मानसिक स्वास्थ्य की बढ़ती समस्याओं के लिए कई कारणों को जिम्मेदार माना है।
 
  • ज्यादा स्क्रीन टाइम इसका बड़ा कारण है। रात में स्क्रीन इस्तेमाल नींद को प्रभावित करता है, जिससे मानसिक संतुलन बिगड़ता है। दिमाग हमेशा एक्टिव रहने की वजह से स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल बढ़ता है, जो मेंटल हेल्थ के लिए खतरनाक है।
  • सोशल मीडिया पर दूसरों से अपनी तुलना करने से आत्म-सम्मान कम होता है और डिप्रेशन का खतरा बढ़ता है। लाइक्स और फॉलोअर्स को ही युवा अपनी पहचान मानने लगे हैं।
  • 7-8 घंटे की पर्याप्त नींद न मिलना मानसिक स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करता है। नींद की कमी से दिमाग की रिकवरी नहीं हो पाती, जिससे मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन और एंग्जायटी बढ़ती है।
  • कॉर्पोरेट लाइफ, टारगेट और नौकरी जाने के डर के कारण तनाव लगातार बढ़ रहा है। ये बर्नआउट सिंड्रोम का कारण बनता है जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है।
  • महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक अस्थिरता लोगों में स्ट्रेस-एंग्जाइटी का बड़ा कारण है। जब भविष्य को लेकर अनिश्चितता होती है, तो मानसिक दबाव बढ़ता है।
  • परिवार और दोस्तों से दूरी मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है। अकेलापन संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, ये कैंसर तक का कारण बन सकती है। कैसे, जानने के लिए यहां क्लिक करें।



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स्रोत:
Two thirds of UK teenagers to have mental health problem by 2030


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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