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Alert: महामारी की इस आदत ने बढ़ा दिया है डेमेंशिया का खतरा, भारत में फिलहाल 40 लाख से अधिक लोग इसके शिकार

Mon, 16 Jan 2023 11:24 AM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सोशल आइसोलेशन के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : iStock
पिछले तीन साल से जारी कोरोना महामारी से बचाव के लिए हम सभी ने अपनी दिनचर्या में कई तरह के बदलाव किए, सोशल आइसोलेशन उसमें से एक है। इस आदत के माध्यम से कोरोना के प्रसार को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि अध्ययनकर्ताओं ने एक हालिया अध्ययन में पाया है कि सोशल आइसोलेशन के कारण लोगों में डेमेंशिया रोग का खतरा बढ़ रहा है।

डेमेंशिया, दिमाग की बनावट में होने वाले बदलाव के कारण होने वाली बीमारी है, जिसमें दिमाग की क्षमता कम हो जाती है और रोगियों को स्मृति, सोच, आचरण तथा मनोभाव से संबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

सोशल आइसोलेशन का हमारे शरीर पर किस प्रकार से असर होता है इसको जानने के लिए किए गए शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि यह आदत 50 से अधिक आयु वालों में डेमेंशिया के जोखिमों को बढ़ाने वाली हो सकती है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में 40 लाख से अधिक लोगों को डेमेंशिया की समस्या है। आमतौर पर 65 की आयु के बाद इस रोग का जोखिम अधिक होता है, पर हाल के वर्षों में इसकी आयु सीमा में भी कमी देखी जा रही है।
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डेमेंशिया का खतरा - फोटो : Pixabay
सोशल आइसोलेशन और डेमेंशिया का खतरा

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन और ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया है कि सोशल आइसोलेशन डेमेंशिया के खतरे को बढ़ाने का कारण बन सकती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सोशल आइसोलेशन सीधे तौर पर तो इस विकार का कारण नहीं बन रही है पर इसके कारण लोगों का एक दूसरे से संपर्क कम हो गया है।

एक दूसरे से बातचीत और मेल-जोल कम होने के कारण बड़ी संख्या में लोगों में व्यवहार परिवर्तन भी देखा जा रहा है। 50-60 के आयु वर्ग वालों में भी डेमेंशिया के खतरे की पहचान की जा रही है, जोकि चिंताकारक स्थिति हो सकती है।
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डेमेंशिया के खतरे के बारे में जानिए - फोटो : istock
अध्ययन में क्या पता चला?

अमेरिका में, 65 वर्ष से अधिक आयु के 4 में से एक व्यक्ति में डेमेंशिया की समस्या देखी जा रही है। जर्नल ऑफ द अमेरिकन गैरिएट्रिक्स सोसाइटी में प्रकाशित इस शोध के लिए  2011 में 5,022 मेडिकेयर वाले प्रतिभागियों के डेटा को शामिल किया गया। अध्ययन की शुरुआत में 23% लोग कई कारणों से सोशल आइसोलेशन में थे, हालांकि उनमें डेमेंशिया के लक्षण नहीं थे। हालांकि नौ साल के इस अध्ययन के अंत तक 21 फीसदी लोगों में डेमेंशिया की समस्या का निदान किया गया। 

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अकेले रहने की आदत हो सकती है खतरनाक - फोटो : iStock
लोगों के संपर्क में रहना बहुत आवश्यक

वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि 9 वर्षों के दौरान सोशली आइसोलेट रहने वालों में समय के साथ डेमेंशिया के विकसित होने का जोखिम 27 फीसदी अधिक हो गया। शोधकर्ता बताते हैं कि एक अन्य शोध में भी पाया गया है कि अगर लोग एक दूसरे से जुड़े रहते हैं तो इस जोखिम को 31 फीसदी तक कम किया जा सकता है।

इंसानी प्रवृत्ति एक दूसरे के साथ रहने और अपने सुख-दुख बांटने की है, इसमें होने वाली छेड़छाड़ के कारण कई प्रकार की न्यूरोलॉजिकल और व्यवहारिक समस्याओं का खतरा हो सकता है। 
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कम उम्र से ही करें डेमेंशिया से बचाव के तरीके - फोटो : iStock
क्या कहते हैं शोधकर्ता?

जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और अध्ययन के लेखकों में से एक डॉ एमफोन उमोह कहते हैं, संचार की सामान्य तकनीक का भी पालन करके डेमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। हमारे संज्ञानात्मक स्वास्थ्य को बेहतर रखने के लिए सोशल कनेक्शन बहुत आवश्यक है।

कोरोना महामारी के बाद से सोशल आइसोलेशन और भी बढ़ गया है, जिसके कारण आने वाले दशकों में गंभीर दुष्प्रभाव हो सकते हैं। भले ही आप आइसोलेशन में हों पर किसी भी माध्यम से लोगों के संपर्क में रहें, यह मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए बहुत आवश्यक है।
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मस्तिष्क को स्वस्थ रखने वाले उपाय करें - फोटो : Pixabay
डेमेंशिया से बचाव के उपाय भी जरूरी

अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि आइसोलेशन के अलावा लाइफस्टाइल के कई और कारक भी डेमेंशिया के खतरे को बढ़ाने वाले हो सकते हैं, इनसे कम उम्र से ही बचाव करते रहना चाहिए। सोशल मीडिया की जगह लोगों से व्यक्तिगत रूप से मेलजोल बढाएं। नियमित रूप से व्यायाम करना, शराब-धूम्रपान से दूरी और रक्तचाप को कंट्रोल में रखना आपमें डेमेंशिया के खतरे को कम कर सकता है। जिन लोगों में डेमेंशिया की फैमिली हिस्ट्री रही है, उन्हें विशेष सावधानी बरतते रहने की आवश्यकता है। 


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स्रोत और संदर्भ
Social isolation and 9-year dementia risk in community-dwelling Medicare beneficiaries in the United States

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 
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