"ताली-थाली बजाने की पहल ने हमें जो ऊर्जी दी, वह शब्दों में बयां नहीं कर सकता"
डा. कमल बी कपूर
(मेडिकल डायरेक्टर)
शार्प साईट आई हॉस्पिटल्स
कोरोना पर अपने अनुभवों को साझा करते हुए डॉ कमल कहते हैं जब यह महामारी आई तो इससे मुकाबला कैसे करना है, इस बारे में किसी को पता नहीं था। ऐसे में जिसको जो समझ आया, रोगियों को ठीक करने के लिए हम डॉक्टर्स ने वह सारे उपाय करने शुरू कर दिए। हमारे उपाय काम नहीं करते तो बेबसी और परेशानी के कारण हमें घुटन होती, यह ऐसा अनुभव होता है जो आपको अंदर से तोड़ देता है। पर बतौर डॉक्टर, जिससे लोगों की उम्मीद जुड़ी हो, वह अपना हौसला कैसे कमजोर होने दे? हम सब लगे रहे, मरीजों का इलाज करते रहे, पर हम भी तो इंसान हैं, हमारे भीतर क्या चल रहा था, हम किस मानसिक स्थिति से गुजर रहे थे, न तो उस समय कोई सुनने वाला था, न हम किसी से बता सकते थे। इन सबके बीच परिवार से न मिल पाना, घंटों पीपीई किट पहनकर रखना, रोगियों को अपने सामने मरते देखना, कोरोना का दौर ऐसा भयावह था जिसे सोच कर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
हर इंसान को सहानुभूति की आवश्यकता होती है, हौसला बनाए रखने के लिए। पर कोरोना के समय में जब चारों तरफ बस बेबसी का माहौल था, हम डॉक्टर्स प्रधानमंत्री जी के उस पहल की सराहना करते हैं जिसमें उन्होंने हमारे सम्मान में देशवासियों से ताली और थाली बजाने की आह्वान किया था। यकीन मानिए उस 5-10 मिनट की पहल ने हमारे अंदर जान फूंक दी, शरीर में खून तेजी से दौड़ने लगा और शरीर में प्रबल इच्छा शक्ति और ऊर्जा का संचार हुआ। लोग भले ही इस पहल के तमाम राजनीतिक मतलब निकालें, लेकिन उस ताली और थाली बजाने के पल से हमें जो ऊर्जा मिली वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। कोरोना के उस गंभीर समय में हमें ऐसे ही ऊर्जा की आवश्यकता थी।
डॉ कमल बताते हैं, कोरोना के समय में हम कई महीनों तक घर नहीं जा पाए। 10-12 दिन काम करने के बाद जो छुट्टी मिलती वह भी क्वारंटीन में निकल जाता। हर बार हौंसला जवाब देने को होता लेकिन फिर उन मरीजों का चेहरा याद आ जाता, हम फिर काम पर लग जाते। आईसीयू में भर्ती मां, जिसके छोटे-छोटे बच्चे शीशे के उस पार से सिर्फ देख सकते थे, उससे मिल नही सकते, ऐसी घटनाओं को रोज देखना किसी भी इंसान को तोड़ देती हैं, हम भी तो इंसान ही थे। पीपीई किट पहनकर 8-10 घंटे काम करते रहना, जिसमें आप न पानी पी सकते हैं, न बाथरूम जा सकते हैं। किट उतारते समय शरीर पसीने से भीगा रहता था, चमड़ी सिकुड़ जाती थी। कोरोना में हम डॉक्टर्स ने इस तरह के शारीरिक और मानसिक कष्ट सहे हैं।
इतनी मेहनत के बीच कई जगहों पर डॉक्टरों के साथ बदसुलूकी की घटना, आत्मा को काफी चोट पहुंचाती थी। कोई भी डॉक्टर किसी रोगी को मरने नहीं देना चाहता, पर हम ईश्वर से तो मुकाबला नहीं कर सकते थे। लोगों को यह बातें न जाने क्यों समझ नहीं आती कि हम भी इंसान ही हैं।
कोरोना के इस समय ने समाज में मेरू पर्वत का मंथन किया है, जिसमें विष भी निकला है और अमृत भी। इस समय ने लोगों को असली-नकली की पहचान करा दी। नेशनल डॉक्टर्स डे पर डॉ कमल कहते हैं, डॉक्टरों को भी इंसान समझिए, हम आपकी ही सेवा के लिए ही हैं। हमें भी आपके प्यार की जरूरत है, आपका थोड़ा सा प्यार हमारे हौंसले को आसमान तक पहुंचा देता है।