क्या आपने कभी सोचा है कि जिस पानी को आप सुरक्षित समझकर पी रहे हैं, जिस खाने को पौष्टिक मानकर खा रहे हैं और जिस हवा में सांस ले रहे हैं, उसके साथ प्लास्टिक के बेहद छोटे-छोटे कण भी हमारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं? मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि जिस तरह से दुनियाभर में प्लास्टिक वाली चीजों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है, इसने माइक्रोप्लास्टिक के खतरे को भी बढ़ा दिया। यह अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि तेजी से उभरता हुआ स्वास्थ्य का भी बड़ा मुद्दा बन चुका है।
पिछले कुछ अध्ययनों में प्लास्टिक के सूक्ष्मकणों के खून, फेफड़ों, प्लेसेंटा, स्तन के दूध और यहां तक कि मस्तिष्क के ऊतकों तक में पाए जाने की रिपोर्ट सामने आई हैं। दरअसल, प्लास्टिक कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता। समय के साथ यह टूटकर छोटे-छोटे टुकड़ों में बदल जाता है। यही कण पानी, मिट्टी, हवा और खाद्य श्रृंखला का हिस्सा बन जाते हैं।
इंसानी शरीर में बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक के स्तर को वैज्ञानिक सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस, हार्मोनल असंतुलन और कोशिकाओं को डैमेज करने वाला बताते रहे हैं। तो क्या कोई तरीका है जिससे माइक्रोप्लास्टिक को शरीर में पहुंचने से रोका जा सके?