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सम्राट के खाने का स्वाद न बिगड़ जाए इसलिए भी पहना गया था मास्क, जानिए मास्क का रोचक इतिहास

Mon, 05 Apr 2021 04:43 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मास्क की अहमियत को समझें - फोटो : pixabay

भले ही हमारे बीच वैक्सीन आ चुकी हो लेकिन जबतक वैक्सीन सभी को नहीं लग जाती तबतक तो मास्क ही वैक्सीन है। पिछले एक साल में हम सभी ने जान लिया कि मास्क पहनना कितना जरूरी है और किस तरह यह हम सभी के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। लोगों की लापरवाही का नतीजा है कि एकबार फिर कोरोना पूरे देश में बहुत तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि हम बिना मास्क के घर से बाहर न निकलें और मास्क की अहमियत को समझें। आइए अतीत के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं मास्क का इतिहास क्या है और कब-कब इसे पहनने की जरूरत पड़ी?

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बुने हुए स्कार्फ से अपना चेहरा ढंके रखना होता था - फोटो : Pixabay

13 वीं सदी में ऐसा था मास्क
मार्को पोलो के अनुसार 13वीं सदी के चीन में नौकरों को बुने हुए स्कार्फ से अपना चेहरा ढंके रखना होता था। यह कपड़ा मास्क की तरह ही हुआ करता था और सबसे महत्वपूर्ण इसके पीछे धारणा यह थी कि सम्राट के खाने की खुशबू या उसका स्वाद किसी अन्य व्यक्ति की सांस की वजह से न बिगड़ जाए इसलिए इसे पहनना जरूरी था। 

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डॉक्टर खासतौर पर मेडिकल मास्क का इस्तेमाल करने लगे - फोटो : Pixabay

ब्लैक डेथ प्लेग में पहना मास्क
14वीं सदी में ब्लैक डेथ प्लेग सबसे पहले यूरोप में फैलना शुरू हुआ। यह एक जानलेवा बीमारी था। 1347 से 1351 के बीच इस बीमारी से यहां 250 लाख लोगों की मौत हो गई। इतनी सारी मौत एकसाथ होने पर कहीं न कहीं चिकित्सकों के बीच खौफ बैठ गया।  इसके बाद यहां डॉक्टर खासतौर पर मेडिकल मास्क का इस्तेमाल करने लगे।

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सूरज की तेज रोशनी से बचाता था - फोटो : instagram

महिलाओं ने पहनें मास्क
19वीं सदी में लंदन में पढ़ी-लिखी महिलाओं की संख्या अधिक थी जो अपनी त्वचा को ढंक कर रखना पसंद करती थीं। इससे उनकी त्वचा पर किसी बाहरी तत्व का प्रभाव नहीं पड़ता था। वे गहनों के ऊपर जालीदार कपड़े पहनना पसंद करती थीं। जालीदार कपड़ा महिलाओं को बारिश, धूलकणों व सूरज की तेज रोशनी से बचाता था और गहनों को भी सुरक्षित रखता था। 

 

 

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मास्क को खुशबूदार जड़ी-बूटियों से भरा जाता था - फोटो : social media
ग्रेट प्लेग में पहना जड़ी-बूटी का मास्क
1665 में जब ग्रेट प्लेग आया तो उस दौरान मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टर चमड़े से बना ट्यूनिक, आंखों पर कांच के चश्मे, हाथों में ग्लव्स और सिर पर टोपी पहना करते थे। ये उस समय पीपीई किट की तरह ही होता था। ब्लैक प्लेग में इस्तेमाल किए जाने वाले मास्क को खुशबूदार जड़ी-बूटियों से भरा जाता था, ताकि गंध को शरीर के भीतर पहुंचने से रोका जा सके। बाद में भी ये मास्क इस्तेमाल होते रहे।
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