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Exclusive: बढ़ती इनफर्टिलिटी एक बड़ी चुनौती, 'दाई से लेकर आईवीएफ विशेषज्ञ' की जरूरत के ट्रांसफॉर्मेशन को समझिए

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भारत में बढ़ती बांझपन की समस्या - फोटो : iStock
अगर आपका धर्म और आध्यात्म की तरफ झुकाव है, तो महाभारत के महानायक कर्ण के बारे में तो जानते ही होंगे? वही कर्ण जिनका जन्म कौमार्यावस्था में देवी कुंती के प्रताप (गर्भ से नहीं) से हुआ था। इस बात को जे़हन में रखिए और वापस द्वापर युग से कलयुग में लौट आइए। अब दो-तीन दशक पहले के वर्षों में चलिए जिसमें हमारी दादी-नानी के समय में लगभग हर औरत के तीन-चार बच्चे हुआ करते थे।

दिमाग के घोड़ों को युगों में दौड़ाने और इस भूमिका का संदर्भ यही है कि जिस धरा पर प्रताप और ऋषियों के प्रसाद से गर्भधारण हो जाया करता था, जहां दाई और घर की महिलाएं आसानी से प्रसव करा लिया करती थीं, उसी धरती पर आज के समय में बड़ी संख्या में लोग बांझपन की समस्या से परेशान हैं। इसका सीधा अर्थ है कि पिछले कुछ दशकों से हमने कुछ न कुछ प्रकृति के खिलाफ जाकर ऐसा जरूर किया है, जिसका यह परिणाम भुगतना पड़ रहा है। 

आमतौर पर हमारे समाज में 'बांझपन' शब्द को लिंग विशेष से जोड़कर समझा या प्रयोग किया जाता रहा है। पर इस लेख में आगे बढ़ने से पहले यह समझ लेना अत्यंत आवश्यक है कि इनफर्टिलिटी या बांझपन, किसी भी तरह से लिंग विशेष से संबंधित नहीं है। मतलब बांझपन का संबंध सिर्फ महिला से ही नहीं है, यह समस्या महिला या पुरुष किसी को भी हो सकती है। जिस भारतवर्ष की धरती पर मंत्रोच्चारण के माध्यम से मातृत्व का सुख प्राप्त करने की शक्ति हुआ करती थी, उसी धरती पर मौजूदा समय में बड़ी संख्या में लोग प्रजनन क्षमता में कमी की समस्या से जूझ रहे हैं। इतना ही नहीं अब मातृत्व सुख के लिए अनेकों दंपत्तियों को अप्राकृतिक गर्भधारण (आईवीएफ/ टेस्ट ट्यूब बेबी) तक का सहारा लेना पड़ रहा है।

आंकड़े बताते हैं कि भारत में 10-15 फीसदी दंपत्ति प्रजनन अक्षमता के कारण माता-पिता बनने के सुख से वंचित रह जाते हैं। यह डेटा निश्चित ही चौंकाने वाला है जिसके मुताबिक देश में 30 मिलियन (3 करोड़) से अधिक दंपत्ति प्रजनन समस्याओं से परेशान हैं। आगे हम इसी बारे में विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर पिछले 15-20 साल में ऐसा क्या हुआ है, जिसने हमारी प्रजनन क्षमता को इस कदर प्रभावित कर दिया है कि कई लोगों को अब अप्राकृतिक गर्भधारण का सहारा लेना पड़ रहा है? 
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इनफर्टिलिटी को लेकर समाज में गलत जानकारियां - फोटो : Pixabay
अभिशाप या दोष नहीं है बांझपन

इनफर्टिलिटी के कारण और इसके उपायों के बारे में जानने से पहले यह समझना बहुत आवश्यक है कि बांझपन या प्रजनन में आ रही दिक्कत, किसी प्रकार का अभिशाप, दोष या कमी नहीं है। बांझपन के संदर्भ में 'कमी' शब्द का प्रयोग वर्षों से सामाजिक रूप से बड़ी हानि का कारण बनता आ रहा है। जिस तरह से लिवर-किडनी में बीमारियां होती हैं, हाथ-पैर टूट जाते हैं और उनका इलाज करके ठीक किया जा सकता है, इनफर्टिलिटी भी बिल्कुल उसी तरह एक शारीरिक समस्या है, जिसे ठीक किया जा सकता है या न ठीक हो पाने की स्थिति में दूसरे विकल्प हैं।

महिला या पुरुष में प्रजनन अक्षमता की स्थिति में 'कमी' शब्द का प्रयोग मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रताड़ना और पीड़ा को जन्म देती है। इसके कई सारे सामाजिक दुष्प्रभाव देखने को मिलते रहे हैं, इसलिए यह समझना नितांत आवश्यक है कि इनफर्टिलिटी एक फिजियोलॉजिकल यानी कि शारीरिक समस्या है, जिसका इलाज करके ठीक किया जा सकता है। जिस प्रकार से वीर्य'पतन' शब्द में पतन शब्द का हमारे मनोस्थिति पर नकारात्मक असर होता है, बिल्कुल इसी तरह ''पुरुष या महिला में कमी के कारण वह बच्चा पैदा नहीं कर पा रहे हैं'' इस वाक्य में कमी शब्द भी मस्तिष्क और समाज में नकारात्मकता पैदा करती है। इससे बचने का प्रयास करें।

चलिए अब विषय की ओर रुख करते हैं।
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प्रजनन संबंधी समस्याओं का बढ़ता जोखिम - फोटो : Pixabay
क्यों बढ़ गई है प्रजनन अक्षमता?

इस सवाल और इसके इर्द-गिर्द घूमते कई अन्य प्रश्नों के उत्तर को समझने के लिए हमने वरिष्ठ महिला रोग विशेषज्ञ डॉ दीप्ति गुप्ता से संपर्क किया। डॉ दीप्ति कहती हैं-

यह मौजूदा समय की सबसे प्रासंगिक समस्या है। महिला-पुरुष दोनों में इनफर्टिलिटी बढ़ती जा रही है, गर्भधारण हो भी रहा है तो उससे संबंधित कई जटिलताएं (जैसे गर्भपात, भ्रूण से संबंधित दिक्कतें, सामान्य प्रसव न हो पाना आदि) देखने को मिल रही हैं। यानि कि गर्भधारण से लेकर प्रसव तक, सभी चीजें पहले की तुलना में अब काफी जटिल हो गई हैं। 

सामान्यतौर पर इसके लिए पर्यावरणीय-सामाजिक कारकों के साथ हमारी गड़बड़ लाइफस्टाइल को प्रमुख कारण माना जा सकता है। देर से शादी होना, खान-पान और जीवनशैली में नकारात्मक परिवर्तन ने इनफर्टिलिटी को बढ़ा दिया है। पहले के समय में 22-25 की आयु में विवाह होकर 30 तक परिवार पूरा हो जाता था, अब ज्यादातर शादियां ही 30 के बाद हो रही हैं। इसके बाद गर्भधारण की योजना बनाते-बनाते 33-35 साल की उम्र बीत जाती है। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो 32 की आयु के बाद हर बढ़ते साल के साथ प्रजनन योग्य अंडों की गुणवत्ता कम होती जाती है।

इसके अलावा समय से भोजन न करना, सोने-जागने का कोई समय निर्धारित न होना, बाहर का खाना, जंक फूड्स, मोटापा और बढ़ता तनाव महिला और पुरुष दोनों में प्रजनन संबंधी दिक्कतों का कारण बन रहा है। पहले के समय में महिलाएं शारीरिक परिश्रम अधिक करती थीं, ऐसे में उनमें गर्भधारण या सामान्य प्रसव को लेकर कोई समस्या नहीं होती थी। वहीं अब के समय में हम घर के काम करने के लिए भी सहायक रख लेते हैं, शारीरिक श्रम काफी कम हो ही गया है, ऊपर से भोजन में पौष्टिकता की कमी का नकारात्मक असर हमारी प्रजनन क्षमता को कमजोर करता जा रहा है।

महिलाओं में पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) के कारण भी गर्भधारण की दिक्कत बढ़ रही है। पीसीओएस के कारण सामान्यतौर पर मासिक धर्म की अनियमितता, असामान्य रूप से शरीर पर बाल बढ़ने, मुंहासे और मोटापा जैसी दिक्कत हो सकती है। 

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नशे की लत और इनफर्टिलिटी की समस्या - फोटो : shutterstock
महिला-पुरुष दोनों में इनफर्टिलिटी के कारण को समझिए

इनफर्टिलिटी पर बात करते समय महिला और पुरुष दोनों को शामिल किया जाना आवश्यक है। दोनों में कुछ कारक कॉमन हैं- जैसे तनाव, मोटापा और लाइफस्टाइल की गड़बड़ी। इसके अलावा धूम्रपान-शराब के सेवन की आदत भी इसके लिए काफी जिम्मेदार मानी जाती है। धूम्रपान और अल्कोहल को फैशन ट्रेंड की तरह से लोग प्रयोग कर रहे हैं, पर शोध बताते हैं कि इसका हमारी प्रजनन क्षमता पर बहुत नकारात्मक असर होता है।

धूम्रपान के नुकसान
अध्ययन बताते हैं कि धूम्रपान करने वाले पुरुषों को सीमेन इंफ्लामेशन की दिक्कत हो सकती है जिससे शुक्राणु कमजोर हो जाते हैं और प्रजनन की दिक्कतें बढ़ सकती हैं। साल 2015 के एक शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि सिगरेट में कार्सिनोजेन्स (कैंसर पैदा करने वाले पदार्थ) के साथ इसके टार में कैडमियम और लेड जैसे विषाक्त पदार्थ हो सकते हैं। इसके अलावा अधिक धूम्रपान करने से शुक्राणु के डीएनए में क्षति हो सकती है।

साल 2014 के एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं में गर्भपात का जोखिम अधिक होता है। इसके अलावा धूम्रपान के कारण 'गर्भावस्था उच्च रक्तचाप' की समस्या के साथ शिशु में जन्मजात दोष, विकास संबंधी जटिलताओं का जोखिम भी बढ़ जाता है।

अल्कोहल का दुष्प्रभाव
धूम्रपान की ही तरह अल्कोहल का सेवन भी महिला-पुरुष दोनों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि अल्कोहल का सेवन करने वाले पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन के स्तर और शुक्राणु उत्पादन में कमी देखी जा रही है। शोध यह भी बताते हैं कि शराब का नियमित सेवन आगे चलकर डीएनए में परिवर्तन का कारण भी बन सकता है। 

इसी तरह महिलाओं पर किए गए शोध से पता चलता है कि शराब का सेवन करना आपमें मां बनने की संभावना को कम कर सकता है। अल्कोहल के सेवन के कारण मासिक धर्म चक्र और ओव्यूलेशन से संबंधित समस्याएं भी बढ़ सकती है, जिसे एमेनोरिया के रूप में जाना जाता है।

इतना ही नहीं एक अन्य शोध से पता चलता है कि जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान शराब का सेवन करती हैं, उनमें 'फेटल अल्कोहल स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर' की समस्या हो सकती है। इसमें भ्रूण के विकास में बाधा आ जाती है।

विशेषज्ञ कहते हैं, धूम्रपान या अल्कोहल के सेवन की कोई सेफ लिमिट नहीं होती है। थोड़ी भी मात्रा में शराब या कम मात्रा में अल्कोहल युक्त पेय भी आपके लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।

मोटापा भी एक कारण
शरीर का वजन अधिक होना, विशेषकर महिलाओं में इनफर्टिलिटी का खतरा बढ़ा देता है। पीएमसी जर्नल में साल 2015 में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है कि अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में प्रजनन संबंधी जटिलताओं का खतरा अधिक होता है। मोटापा के कारण गर्भधारण करना कठिन हो जाता है, साथ ही यह गर्भपात का जोखिम भी बढ़ा देती है। महिलाओं को वजन नियंत्रित रखने पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। 

मोबाइल बनता जा रहा है  गर्भनिरोधक
सोशल मीडिया पर आपने भी ऐसे कई मीम्स देखे होंगे जिसमें पति-पत्नी बेड पर एक दूसरे से विपरीत मुंह किए मोबाइल पर चैटिंग या सर्फिंग करते दिख रहे होंगे। विशेषज्ञ, मोबाइल फोन्स को आज के समय का 'कॉन्ट्रासेप्टिव' बताते हैं। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ विधि पिलानिया कहती हैं, मोबाइल फोन्स के बढ़ते इस्तेमाल ने पति-पत्नी के बीच के 'क्वालिटी टाइम' को कम कर दिया है। इसके अलावा शोध बताते हैं कि मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन के कारण प्रजनन क्षमता पर भी असर होता है। ऐसे में मोबाइल, आज के समय में गर्भनिरोधक बनता जा रहा है। इसके इस्तेमाल के समय को लेकर लोगों को ध्यान देने की आश्यकता है।

इन बातों का रखें ध्यान
पुरुषों में बढ़ती प्रजनन अक्षमताओं का एक कारण जिम में स्टेरॉयड युक्त मांसपेशियों को बढ़ाने वाले पाउडर या इंजेक्शन लेना भी माना जा रहा है। इसके कारण भी कुछ पुरुषों में वीर्य संबंधी दोष का पता चलता है। इसके अलावा समाज में एक गलत अवधारणा यह रही है कि हस्तमैथुन करने से प्रजनन क्षमता पर असर होता है, जबकि अध्ययन इस बात को प्रमाणित करते हैं कि हस्तमैथुन स्वस्थ क्रिया है, अगर इसे नियंत्रण में रखकर किया जाए तो इसे कोई नुकसान नहीं होता है।

(यह लेख भी पढ़ें-  हस्तमैथुन हमारी सेहत के लिए क्या फायदेमंद-कितना नुकसानदायक?)
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तनाव का प्रजनन क्षमता पर दुष्प्रभाव - फोटो : istock
अधिक तनाव ने भी बढ़ा दी है प्रजनन संबंधी समस्याएं

डॉ दीप्ति कहती हैं, कई तरह की सामाजिक और जीवनशैली के कारकों के चलते लोगों में तनाव की समस्या बढ़ गई है। इसे पुरुष और महिला दोनों में इनफर्टिलिटी को बढ़ाने वाला कारक माना जाता है। तनाव की स्थिति में शरीर में कोर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है, जो प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर सकता है। प्रजनन समस्याओं के शिकार ज्यादातर दंपत्तियों में तनाव की समस्या का निदान किया जाता है। 

ह्यूमन रिप्रोडक्सन जर्नल में प्रकाशित साल 2014 के शोध में वैज्ञानिकों ने पाया कि लंबे समय तक बने रहने वाली तनाव की समस्या आपके गर्भवती होने की क्षमता को 29 प्रतिशत तक कम कर सकती है। शोधकर्ताओं ने पाया कि अधिक तनाव लेने वाली महिलाओं में अल्फा-एमाइलेज एंजाइम की मात्रा बढ़ जाती है, जो आपमें गर्भधारण की क्षमता को प्रभावित कर सकती है। तनाव का प्रबंधन बहुत आवश्यक है।
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आईवीएफ की बढ़ती मांग - फोटो : Pixabay
कृत्रिम गर्भधारण की आवश्यकता

लाइफस्टाइल और अन्य कारकों के चलते चूंकि इनफर्टिलिटी की समस्या बढ़ गई है, ऐसे में पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम गर्भधारण या आईवीएफ एक उम्मीद और विकल्प बनकर उभरा है। आईवीएफ की मांग देश में किस तेजी से बढ़ी है, आंकड़े स्पष्ट गवाही देते हैं। डेटा के मुताबिक साल 2020 में भारत में आईवीएफ सेवाओं का मार्केट साइज 793.27 मिलियन डॉलर था। बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक साल 2030 तक यह आंकड़ा करीब 17 फीसदी वृद्धि के साथ बढ़कर 3,721.99 मिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। सामान्य गर्भधारण की बढ़ती अक्षमता ने आईवीएफ के रूप में दंपत्तियों को एक नई उम्मीद और बाजार को बूस्ट दिया है।

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) के बारे में समझने के लिए हमने बैंगलोर स्थित आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ अरुनिमा हलदर से बातचीत की। डॉ अरुनिमा बताती हैं, जो लोग सामान्य रूप से गर्भधारण करने में दिक्कतों का अनुभव करते हैं उनके लिए आईवीएफ बड़े अवसर के तौर पर हो सकता है। भारत में भी इसकी मांग तेजी से बढ़ती देखी जा रही है।

मूल रूप से आईवीएफ, अंडे को कृत्रिम रूप से निषेचित करने की एक प्रक्रिया है, जिसमें दवाओं और सर्जिकल प्रक्रियाओं को प्रयोग में लाया जाता है। एक दशक पहले की तुलना में देखें तो लोगों में गर्भधारण और इससे संबंधित जागरूकता बढ़ी है, परेशान दंपत्ति आईवीएफ की मदद ले रहे हैं। आईवीएफ के दौरान पुरुष और महिला दोनों की प्रजनन क्षमता की जांच की जाती है। 
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आईवीएफ कितना सफल? - फोटो : Pixabay
कितना सफल है कृत्रिम गर्भधारण? 

कृत्रिम गर्भधारण को लेकर लोगों के मन में कई तरह के प्रश्न होते हैं। इसमें सबसे कॉमन है कि यह कितना सफल होता है? इस बारे में डॉ अरुनिमा कहती हैं, आईवीएफ की सफलता कई कारकों जैसे अंडों और वीर्य की गुणवत्ता, उम्र आदि पर निर्भर करती है। भारत में आईवीएफ की सफलता दर 40 से 45 फीसदी के करीब की मानी जाती है। हमेशा ध्यान रखें, आईवीएफ गर्भधारण की गारंटी नहीं है, यह भी कई कारकों पर निर्भर करती है।

मोटापे के कारण आईवीएफ प्रक्रिया के असफल होने का जोखिम बढ़ जाता है। क्लिनिकल एंडोक्रिनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म के जर्नल में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि मोटापे से ग्रस्त महिलाओं के शरीर में आईवीएफ प्रक्रिया के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली दवा 'जीएनआरएच एंटागोनिस्ट' के ठीक से काम करने की संभावना कम हो सकती है।
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प्रजनन स्वास्थ्य पर दें विशेष ध्यान - फोटो : istock
गर्भधारण से संबंधित समस्याओं से कैसे बचें?

महिला रोग विशेषज्ञ डॉ दीप्ति कहती हैं, हमें गर्भधारण की सामान्य प्रक्रिया पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। इसके लिए सही उम्र पर शादी, जीवनशैली और भोजन की पौष्टिकता और तनाव कम करना आवश्यक है। शादी के एक साल बाद तक अगर रेगुलर इंटरकोर्स के बाद भी आप गर्भधारण नहीं कर पा रही हैं, तो इस स्थिति में डॉक्टर से मिलकर आगे के उपायों पर विचार करना चाहिए।

आदर्श रूप से 26-30 की आयु प्रजनन के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है। अगर आप गर्भधारण करने का विचार कर रही हैं तो डॉक्टर से मिलकर प्री कंसीव सेशन लेने की सलाह दी जाती है, जिससे किसी भी जटिलता के बारे में पहले ही पता चल सके। अगर हम जीवनशैली, खानपान और तनाव प्रबंधन पर ध्यान दे लें और आपमें पहले से कोई अंतर्निहित स्वास्थ्य समस्या नहीं है, तो सामान्यत: गर्भधारण में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। 

मातृत्व संसार का सबसे बड़ा सुख माना जाता है। प्रकृति के नियमों में किए गए छेड़छाड़ के कारण हम इनफर्टिलिटी जैसी समस्याओं के शिकार हो रहे हैं। स्वस्थ आहार- स्वस्थ व्यवहार को जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, ताकि मातृत्व का जो सुख ईश्वर का आपको वरदान है, उसमें कोई व्याधा न आने पाए। 



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेख स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सुझाव और साझा की गई केस की जानकारी के साथ मेडिकल रिपोर्ट्स/अध्ययनों के आधार पर तैयार किया गया है। संबंधित अध्ययनों की कॉपी और डॉक्टर्स का परिचय साथ में संलग्न है। लेख का उद्देश्य समाज में फैली गलत जानकारियों/अफवाहों को लेकर आपको सचेत करना मात्र है। 
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