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Fertility Rate: 70 वर्षों में कई गुना तक कम हो गई है भारत में प्रजनन दर, डॉक्टर ने बताया- ये हैं प्रमुख कारण

Fri, 22 Mar 2024 01:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कम होती प्रजनन दर - फोटो : istock
पिछले एक दशक में वैश्विक स्तर पर प्रजनन से संबंधित समस्याएं काफी तेजी से बढ़ती देखी जा रही हैं। भारत में भी इसका जोखिम बढ़ा है। इसी को लेकर द लैंसेट जर्नल में प्रकाशित हालिया शोध में विशेषज्ञों ने चिंता जताते हुए सभी लोगों को अलर्ट किया है। अध्ययन की रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 1950 की तुलना में भारत में प्रजनन दर काफी घट गई है, इतना ही नहीं अगले दो दशकों में इसमें और भी कमी आने की आशंका जताई जा रही है। लाइफस्टाइल और आहार में गड़बड़ी के साथ कई प्रकार के पर्यावरणीय कारकों को वैज्ञानिकों ने इसके लिए जिम्मेदार माना है। 

वैश्विक शोध की इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रजनन दर 1950 में लगभग 6.2 थी जो साल 2021 में घटकर 2 से कम हो गई है। वैज्ञानिकों ने चिंता जताई है कि जिस तरह की ये गिरावट जारी है ऐसे में ये दर साल 2050 तक और घटकर 1.29 और साल 2100 तक 1.04 रह जाने की आशंका है। ये संख्याएं वैश्विक रुझानों के अनुरूप पाई गईं, जहां कुल प्रजनन दर (टीएफआर) 1950 में प्रति महिला 4.8 बच्चों से अधिक थी जोकि 2021 में गिरकर 2.2 बच्चे प्रति महिला रह गई है। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दुनियाभर में प्रजनन संबंधी कई प्रकार की चुनौतियां देखी जा रही हैं। अगर इसमें सुधार न किया गया तो आने वाले वर्षों में जोखिमों के और भी बढ़ने की आशंका है।
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प्रजनन से संबंधित दिक्कतें - फोटो : Pixabay
क्या कहते हैं आंकड़े?

आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2021 में दुनियाभर में 12.9 करोड़ जीवित बच्चे पैदा हुए। ये संख्या साल 1950 में लगभग 9.3 करोड़ जन्मे बच्चों से तो अधिक थी पर साल 2016 में 14.2 करोड़ जन्मे बच्चों की तुलना में इसमें भारी गिरावट देखी गई। 

ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (जीबीडी) 2021 फर्टिलिटी एंड फोरकास्टिंग कोलैबोरेटर्स के शोधकर्ताओं ने कहा भले ही दुनिया के अधिकांश हिस्से कम प्रजनन क्षमता की चुनौतियों से जूझ रहे है, फिर भी 21वीं सदी के दौरान कई कम आय वाले देशों में इसका जोखिम कम देखा गया है। 
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गर्भावस्था और इसकी जटिलताएं - फोटो : istock
प्रतिकूल परिस्थितियों का देखा जा रहा है असर

वैज्ञानिकों ने बताया, कई जोखिम कारक हैं जो स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता को प्रभावित करते हुए देखे जा रहे हैं। बिगड़ता जलवायु परिवर्तन और खान-पान में आए बदलाव के कारण सबसे ज्यादा चुनौतियां देखी जा रही हैं।  

इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन (आईएचएमई) और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन (यूडब्ल्यू) ने इस अध्ययन में पाया कि गर्भावस्था तो बड़ी चुनौती बनती ही जा रही है साथ ही साथ नकारात्मक स्थितियों के कारण बाल मृत्यु दर और विकासात्मक समस्याओं का भी जोखिम हो सकता है।

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) की कार्यकारी निदेशक पूनम मुत्तरेजा कहती हैं, ये चुनौतियां भारत के लिए अभी भी कुछ दशक दूर हैं, लेकिन हमें भविष्य के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ अभी से कार्रवाई शुरू करने की जरूरत है।

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प्रजनन स्वास्थ्य की चुनौतियां - फोटो : iStock
क्या कहती हैं स्त्री रोग विशेषज्ञ?

अमर उजाला से बातचीत में भोपाल स्थित वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ दीप्ति गुप्ता बताती हैं, भारत में कम होती प्रजनन दर के लिए जिन कारणों को प्रमुख माना जा रहा है उनमें पहले की तुलना में देर में हो रही शादियां और इसके बाद बच्चों की प्लानिंग में होने वाली अतिरिक्त देरी शीर्ष वजह हो सकती है। जहां पहले 25-26 को गर्भावस्था की औसत आयु मानी जाती थी वो उम्र अब बढ़कर 32-34 हो गई है। उम्र बढ़ने के साथ अंडों की गुणवत्ता में कमी आने की वजह से प्रजनन दर कम होती जा रही है। 

इसके अलावा प्रजनन दर घटने का एक कारण ये भी है कि पहले की तुलना में अब लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं।
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कैसे सुधारें प्रजनन दर - फोटो : istock
कुछ उपायों से हो सकता है सुधार

स्ट्रेस, खान-पान और लाइफस्टाइल में गड़बड़ी के कारण पुरुषों की प्रजनन क्षमता में कमी आ गई है, जिसका भी इस दर पर परिणाम देखा गया है। हालांकि इन आंकड़ों को सिर्फ समस्या के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। 1950 के दशक की तुलना में अब अनियोजित बच्चे भी कम पैदा हो रहे हैं जिसका भी प्रजनन दर पर असर दिखना स्वाभाविक है। निश्चित ही लो फर्टिलिटी एक समस्या है, हालांकि लाइफस्टाइल-आहार में सुधार करके इस दर में भी सुधार किया जा सकता है।


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स्रोत और संदर्भ
Global fertility in 204 countries and territories, 1950–2021, with forecasts to 2100: a comprehensive demographic analysis for the Global Burden of Disease Study 2021

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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