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कोरोना वायरस: बच्चों में पाई जा रही इस अजीब बीमारी ने क्या भारत में दस्तक दे दी है?

Thu, 21 May 2020 09:55 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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कोरोना संक्रमण (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : पेक्सेल्स
अब तक तो यही कहा जाता रहा है कि बच्चों में कोरोना के गंभीर लक्षण नहीं पाए जाते लेकिन चेन्नई में आठ साल के एक बच्चे में कोरोना का गंभीर लक्षण यानी हाइपर इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम पाया गया है। हाइपर इंफ्लेमेटरी सिंड्रोम के मामले में अगर तत्काल प्रभाव से चिकित्सीय सुविधा नहीं मिले तो शरीर के कई अंग काम करना बंद कर सकते हैं। इसके कई लक्षण कावासाकी बीमारी की तरह होते हैं जिसमें रक्त वाहिकाओं में सूजन आ जाती है।
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बच्चे की थर्मल स्क्रीनिंग करते कर्मचारी(File Photo) - फोटो : अमर उजाला
चेन्नई में कांची कमाकोटी चाइल्ड्स ट्रस्ट अस्पताल के निदेशक डॉक्टर एस. बालासुब्रमण्यन कहते हैं, "जब वायरस शरीर में घुसता है तो इसकी रक्षा करने वाले सभी हथियार इससे लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं। अगर किसी शख्स का शरीर जोरदार तरीके से इस पर प्रतिक्रिया देता है तो इसमें उसके शरीर में भारी मात्रा में प्रोटीन पैदा होता है जो संक्रमण से लड़ने के लिए जरूरी है। जिसके बदले में ये शरीर को नुकसान पहुंचाने लगता है। इस तरह से टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम का बच्चों पर असर पड़ता है।"
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
आठ वर्षीय बच्चे को एक दूसरे बच्चे के साथ अस्पताल तब लाया गया था जब उनका बुखार नियंत्रण में नहीं आ रहा था। डॉक्टर बालासुब्रमण्यन के साथी डॉक्टर बाला रामचंद्रन कहते हैं, "बच्चे को लगातार बुखार था, गले और जबान में सूजन थी, होंठ फट रहे थे और वो पूरी तरह से बेहद बीमार लग रहा था। पिछले अस्पताल ने उसका कोविड-19 का टेस्ट किया था लेकिन उसमें वो निगेटिव आया था। तब यह उसके बुखार का चौथा दिन था। नौवें दिन उसी लैब की रिपोर्ट में उसे पॉजिटिव पाया गया।" डॉक्टरों का कहना है कि बच्चे का इलाज किया गया और उसे 15 दिन बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

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Coronavirus Test - फोटो : Social Media
अमेरिका-यूरोप में आ चुके हैं ऐसे मामले
इस तरह के मामले यूरोप और अमेरिका में बाल रोग विशेषज्ञों को परेशान करते रहे हैं। मेडिकल जर्नल लैंसेट में सात मई को छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल के मध्य में लंदन के साउथ टेम्स रिट्राइवल सर्विस में आठ बच्चों में ऐसा पाया गया था जिनमें कोविड-19 के साथ-साथ अन्य बीमारियों के लक्षण थे। इसके बाद यूरोप के अन्य इलाकों के साथ-साथ अमेरिका से ऐसे मामलों के बारे में पता चला। डॉक्टर रामचंद्रन कहते हैं, "हम उन जैसे मामलों को देख रहे हैं।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : pixabay
कावासाकी बीमारी में प्रतिरक्षा तंत्र पर हमला होता है, यह किस कारण से है इसके बारे में मालूम नहीं है। यह शरीर के सभी अंगों पर असर डालता है और इसकी शुरुआत दिल से होती है। टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम एक तरह का बैक्टीरियल संक्रमण है जिसका एंटीबायोटिक से इलाज होता है। डॉक्टर रामचंद्रन कहते हैं कि दोनों एक-दूसरे में समा जाते हैं।
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केवल बुखार का लक्षण चिंताजनक नहीं है - फोटो : Pexels
परिजनों को क्या देखना चाहिए?
डॉक्टर बालासुब्रमण्यन कहते हैं, "इसमें बुखार का लक्षण चिंताजनक नहीं है लेकिन अगर बच्चा असामान्य रूप से सुस्त है, बेहद थका, कुछ खा नहीं रहा, कम पेशाब आ रहा है, पसीना ज्यादा आ रहा है, शरीर पर दाने निकल आए हैं, जबान और आंखें लाल हैं, पेट दर्द है तो परिजन को बच्चे को तुरंत अस्पताल लेकर जाना चाहिए।"
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बच्चे(File Photo) - फोटो : social media
डॉक्टर ये देखते हैं कि बच्चा सामान्य रूप से कितनी सांस ले पा रहा है और उसका रक्त प्रवाह कितना सामान्य है। डॉक्टर बालासुब्रमण्यन कहते हैं, "हाइपर-इन्फेलेमेटरी सिंड्रोम का इलाज कोविड की तरह नहीं है। बच्चे को गहन चिकित्सा की जरूरत है, उसे ज्यादा तरल पदार्थ की जरूरत है क्योंकि जब ब्लड प्रेशर गिरता है तो दिल तक खून का प्रवाह घट जाता है।"

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coronavirus - फोटो : PTI
भारत में कोविड-19 अपने पीक पर पहुंच चुका है?
कोरोना वायरस संक्रमण के मामले क्या भारत में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुके हैं? ये सवाल इसलिए भी अब उठ रहा है क्योंकि 19 साल से कम उम्र के बच्चों में यह बीमारी तब पाई जा रही है जब कोविड-19 के मामले पीक पर पहुंच जाते हैं।

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बच्चे में कावासाकी बीमारी (सांकेतिक) - फोटो : social media
डॉक्टर बालासुब्रमण्यन कहते हैं, "हमें नहीं लगता है कि हम भारत में अभी तक पीक पर पहुंच चुके हैं। लेकिन मुझे लगता है कि आने वाले महीनों में इस तरह के मामले बच्चों में बढ़ेंगे। यह बात भी ध्यान में रखने की जरूरत है कि जिन भी बच्चों में पेट दर्द की समस्या है उनका एपेंडिसाइटिस का इलाज नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि विदेशों में कुछ जगहों पर ऐसा किया गया है।"
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केवल बुखार का लक्षण चिंताजनक नहीं है - फोटो : Pexels
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने विस्तार से बताया था, "345 बच्चे जो कोविड-19 पॉजिटिव थे उनके स्वास्थ्य की पूरी जानकारी के बाद पता चला कि उनमें से 23 फीसदी को फेफड़े की बीमारी, दिल की बीमारी आदि पहले से थी।" विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि यूरोप और अमेरिका में जो मामले आए हैं वैसी स्थिति पूरी दुनिया में फैलने से पहले एक मानकीकृत डाटा तुरंत इकट्ठा करने की आवश्यकता है। संगठन ने पूरी दुनिया के एक कार्यकारी समूह का गठन किया है जिसमें एम्स के बाल रोग विभाग के डॉक्टर राकेश लोढा भी शामिल हैं।
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