भ्रम या गलतफहमी
रोज़ 8 गिलास पानी पीने का भरम पूरी दुनिया में है। कई दशक से चली आ रही सोच इस क़दर हावी हो गई है कि हम इस पैमाने के हिसाब से पानी की भारी कमी के शिकार हैं। हालांकि जानकार मानते हैं कि हमें पानी की उतनी ही ज़रूरत है, जितना शरीर मांगे। अमेरिका की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ इर्विन रोज़ेनबर्ग कहते हैं कि, 'पानी के संतुलन को बनाना इंसान के शरीर ने हज़ारों साल की विकास की प्रक्रिया से गुज़र कर सीखा है।
इसकी शुरुआत तब से हुई थी जब समंदर से पहला जीव ज़मीन पर रहने पहुंचा था। आज इंसानों के शरीर में पानी का संतुलन बनाने की बेहद विकसित और पेचीदा व्यवस्था है।'किसी भी स्वस्थ शरीर में पानी की ज़रूरत होते ही दिमाग़ को पता चल जाता है। तो वो इंसान को प्यास लगने का संकेत देता है। दिमाग़ से एक हारमोन गुर्दों को भी निर्देश देता है कि वो पेशाब को गाढ़ा कर के शरीर से पानी निकालना कम करें और पानी बचाएं। ब्रिटेन की डॉक्टर और खिलाड़ियों की सलाहकार कोर्टनी किप्स कहती हैं कि, 'अगर आप अपने शरीर की बात सुनेंगे, तो ये बता देता है कि आप को प्यास कब लगी है।
लोगों का ये सोचना कि प्यास लगने का मतलब पानी की कमी होते हुए बहुत देर हो गई है, ग़लत है। हज़ारों साल से इंसान ऐसे ही संकेतों के बाद प्यास बुझाता आया है। ऐसे में शरीर पानी की कमी का ग़लत संकेत देगा, ये सोचना ही ग़लत है।' प्यास लगने पर पानी पीना सबसे अच्छा विकल्प है। क्योंकि इसमे कैलोरी नहीं होती। पर, हम प्यास लगने पर चाय, कॉफ़ी, कोल्ड ड्रिंक या दूसरे पेय पदार्थ लेकर भी पानी की कमी पूरी कर सकते हैं। कैफ़ीन के कुछ साइड इफेक्ट भले हों, पर कई रिसर्च ये बताती हैं कि चाय-कॉफ़ी से हमारे शरीर को पानी मिलता है। इसी तरह शराब और बीयर से भी शरीर को पानी मिलता है।