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अलर्ट: अगर आप भी हैं प्रेग्नेंसी से जुड़ी इन गलतफहमियों का शिकार, तो यहां जानें सच्चाई

Thu, 24 Jun 2021 05:50 PM IST
प्रकाश चंद जोशी हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
डॉ परवेश मलिक
फिजिशियन

Medically Reviewed by Dr. Parvesh Malik

जितनी खुशी किसी कपल को शादी के बंधन में बंधते वक्त होती है, उससे कहीं ज्यादा खुशी उन्हें उस वक्त होती है जब उन्हें पता चलता है कि वे माता-पिता बनने वाले हैं। घर में बच्चे की आने की खबर माता-पिता के अलावा घर-परिवार के बाकी लोगों को भी काफी खुशी देती है। लोग नन्हे मेहमान के आने की तैयारियों में लग जाते हैं, पूरा परिवार काफी उत्साहित होता है। हालांकि, महिला के गर्भवती होने के समय सब इस बात की दुआ भी करते हैं कि मां और बच्चा दोनों पूरी तरह सुरक्षित रहें। वहीं, गर्भावस्था को लेकर कुछ भ्रांतियां भी हैं, जो महिलाओं के बीच फैली हुई हैं। कुछ महिलाएं तो इन बातों पर विश्वास तक कर लेती है। ऐसे में इन भ्रांतियों को दूर करना काफी जरूरी है, ताकि इनसे बचा जा सके। तो चलिए हम आपको ऐसी ही कुछ भ्रांतियों के बारे में और इनकी सच्चाई के बारे में बताते हैं।
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pregnant lady - फोटो : social media
भ्रांति नंबर 1

अगर किसी महिला का जल्दी प्रसव होता है, तो उसका लड़का होता है। लेकिन अगर प्रसव देर से होता है तो भी लड़की का जन्म होता है।

सच्चाई ये है

ये बात सही नहीं है, क्योंकि डिलीवरी में देरी या जल्दी मेडिकल कंडीशन पर निर्भर करती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भ्रांति नंबर 2

अगर महिला का मीठा खाने का मन कर रहा है, तो फिर लड़की होगी। वहीं, अगर खट्टा खाने का मन कर रहा है, तो लड़के का जन्म होगा।

सच्चाई ये है

इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है, इसलिए ये बात बेकार है। लड़का होगा या लड़की ये सब हार्मोन्स के उतार-चढ़ाव के कारण होता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भ्रांति नंबर 3

अगर एक बार सिजेरियन से बच्चा पैदा हो जाए, तो फिर दूसरी डिलीवरी नॉर्मल नहीं हो सकती।

सच्चाई ये है

अगर डिलीवरी का केस सामान्य है, और इसमें कोई जटिलता नहीं है तो ऐसे में दूसरी बार नॉर्मल डिलीवरी हो सकती है। जब किसी केस में कॉम्पिलीकेशंस यानी जटिलताएं आती हैं, तभी सर्जरी की जाती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
भ्रांति नंबर 4

महिला के अलट्रासाउंड करवाने से बच्चे पर बुरा असर पड़ता है।

सच्चाई ये है

विशेषज्ञ भ्रूण की पोजिशन यानी स्थिति को देखने के लिए तीसरे, पांचवे, सातवें और फिर नौवें महीने में अलट्रासाउंड करवाते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चा पूरी तरह से सेहतमंद और सुरक्षित रहे।

नोट: डॉ. परवेश मलिक एक फिजिशियन हैं और वर्तमान में पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल में कार्यरत हैं। डॉ. मलिक ने हरियाणा के महर्षि मार्कंडेश्वर इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ साइंसेज एंड रिसर्च मुल्लाना, से अपना एबीबीएस पूरा किया है। इन्होंने जनरल मेडिसिन में एमडी भी किया। पानीपत के उजाला सिग्नस महाराजा अग्रसेन अस्पताल मेंसकाम करने से पहले डॉ परवेश ने एम.एम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च महर्षि मार्कंडेश्वर यूनिवर्सिटी में जूनियर रेजिडेंट के तौर पर काम किया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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