सुनने की क्षमता में कमी का असर
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डिमेंशिया का खतरा
अमेरिका की न्यूरोसर्जन डॉक्टर रूपा जुथानी कहती हैं, कंसर्ट या भी क्लब जैसी जगहों पर ईयरप्लग का इस्तेमाल जरूरी है।
- डॉक्टर रूपा जुथानी कहती हैं, सुनने की क्षमता में कमी डिमेंशिया के उन जोखिम कारकों में से एक है, जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है।
- तेज आवाज के संपर्क में थोड़े समय के लिए आने से भी कान के अंदर मौजूद बेहद नाजुक नसों और संरचनाओं को नुकसान हो सकता है। ये दीर्घकालिक तौर पर ब्रेन हेल्थ को नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती है।
- इसका मतलब है कि कंसर्ट से लौटने के बाद कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना या कुछ समय के लिए आवाज धीमी सुनाई देना सिर्फ मामूली परेशानी नहीं है।
- यह इस बात का शुरुआती संकेत हो सकता है कि कान के अंदर सुनने से जुड़ी नसों को नुकसान पहुंचा है।
तेज आवाज कैसे पहुंचाती है नुकसान
डॉ जुथाानी बताती हैं, जब आवाज करीब 85 डेसिबल से ज्यादा हो जाती है, तो कान के अंदर मौजूद कोक्लिया की हेयर सेल्स यानी बेहद छोटी संवेदनशील कोशिकाओं पर दबाव पड़ना शुरू हो जाता है। कोक्लिया कान के अंदर मौजूद संरचना है, जो आवाज को ऐसे संकेतों में बदलती है जिन्हें दिमाग समझ सके। हेयर सेल्स इसी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- तेज आवाज के संपर्क में आने पर सबसे पहले ‘टेम्परेरी थ्रेशोल्ड शिफ्ट’ हो सकता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि कुछ समय के लिए सुनने की क्षमता कम हो जाना।
- इसके साथ कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज यानी टिनिटस भी हो सकता है। आमतौर पर यह स्थिति 16 से 48 घंटे में ठीक हो जाती है। लेकिन इसका ठीक हो जाना यह साबित नहीं करता कि कानों को कोई नुकसान नहीं हुआ।