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अलर्ट: बार-बार क्लब-पार्टी में जाते हैं तो सेहत को लेकर हो जाएं सावधान, कहीं आपको दिमागी बीमारी न हो जाए?

Mon, 14 Sep 2026 10:27 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

कंसर्ट में तेज संगीत सुनना कानों की नाजुक कोशिकाओं और सुनने वाली नसों को नुकसान पहुंचा सकता है। कानों में घंटी बजना या आवाज धीमी लगना चेतावनी हो सकती है। शोध में सुनने की क्षमता में कमी को डिमेंशिया के महत्वपूर्ण जोखिम कारकों में शामिल किया गया है।
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पार्टी की आदत का ब्रेन पर असर - फोटो : Amarujala.com/AI
क्या आप भी क्लब, पार्टी और कंसर्ट के शौकीन हैं, इस तरह के इवेंट्स में अक्सर जाते रहते हैं? अगर हां तो सावधान हो जाइए। डॉक्टरों की टीम ने ऐसे लोगों को अपनी सेहत को लेकर सावधानी बरतते रहने की सलाह दी है।

क्लब और कंसर्ट में तेज म्यूजिक, लोगों की भीड़ और गाने की बीट्स के बीच हर कोई खो जाना चाहता है। पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, अक्सर इस तरह के माहौल में जाना आपके कानों से लेकर दिमाग तक के लिए खतरा बढ़ाने वाला पाया गया है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, लंबे समय तक तेज आवाज में रहने के बाद कानों में लगातार सीटी या घंटी जैसी आवाज सुनाई देती है, आसपास की आवाज कुछ धीमी लग सकती है या कान कुछ देर के लिए बंद-बंद महसूस हो सकता है, इसे अक्सर सामान्य मान लिया जाता है। पर इस तरह की स्थिति लोगों के लिए मुश्किलों का कारण हो सकती है।
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तेज आवाज ब्रेन के लिए भी खतरनाक - फोटो : Freepik.com
तेज आवाज से कान के साथ ब्रेन को भी खतरा

न्यूरोसर्जन के मुताबिक तेज आवाज के कारण कानों में होने वाली परेशानी को हमेशा हल्के में नहीं लेना चाहिए। कई बार यह कान के अंदर मौजूद बेहद नाजुक कोशिकाओं और नसों पर पड़े दबाव का संकेत हो सकती है, जो आवाज को दिमाग तक पहुंचाने का काम करती हैं। समस्या यह है कि इन कोशिकाओं को एक बार नुकसान पहुंचने के बाद उनके दोबारा ठीक होने की उम्मीद न के बराबर होती है।
 
  • वैज्ञानिकों का कहना है कि तेज आवाज के लगातार संपर्क में रहने से सिर्फ सुनने की क्षमता कम नहीं होती है बल्कि इसका असर दिमाग की सेहत पर भी पड़ सकता है। 
  • उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और सोचने-समझने की समस्या और डिमेंशिया को लेकर हुए शोध में सुनने की क्षमता में कमी को एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में देखा गया है।
  • मसलन अगर आपके सुनने की क्षमता कम हो गई है तो इसका असर मस्तिष्क की सेहत को भी  प्रभावित करने वाला हो सकता है।
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सुनने की क्षमता में कमी का असर - फोटो : Adobe stock photos
डिमेंशिया का खतरा

अमेरिका की न्यूरोसर्जन डॉक्टर रूपा जुथानी कहती हैं, कंसर्ट या भी क्लब जैसी जगहों पर ईयरप्लग का इस्तेमाल जरूरी है।
 
  • डॉक्टर रूपा जुथानी कहती हैं, सुनने की क्षमता में कमी डिमेंशिया के उन जोखिम कारकों में से एक है, जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है।  
  • तेज आवाज के संपर्क में थोड़े समय के लिए आने से भी कान के अंदर मौजूद बेहद नाजुक नसों और संरचनाओं को नुकसान हो सकता है। ये दीर्घकालिक तौर पर ब्रेन हेल्थ को नुकसान पहुंचाने वाली हो सकती है। 
  • इसका मतलब है कि कंसर्ट से लौटने के बाद कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना या कुछ समय के लिए आवाज धीमी सुनाई देना सिर्फ मामूली परेशानी नहीं है।
  • यह इस बात का शुरुआती संकेत हो सकता है कि कान के अंदर सुनने से जुड़ी नसों को नुकसान पहुंचा है।

तेज आवाज कैसे पहुंचाती है नुकसान

डॉ जुथाानी बताती हैं, जब आवाज करीब 85 डेसिबल से ज्यादा हो जाती है, तो कान के अंदर मौजूद कोक्लिया की हेयर सेल्स यानी बेहद छोटी संवेदनशील कोशिकाओं पर दबाव पड़ना शुरू हो जाता है। कोक्लिया कान के अंदर मौजूद संरचना है, जो आवाज को ऐसे संकेतों में बदलती है जिन्हें दिमाग समझ सके। हेयर सेल्स इसी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
 
  • तेज आवाज के संपर्क में आने पर सबसे पहले ‘टेम्परेरी थ्रेशोल्ड शिफ्ट’ हो सकता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि कुछ समय के लिए सुनने की क्षमता कम हो जाना। 
  • इसके साथ कानों में घंटी या सीटी जैसी आवाज यानी टिनिटस भी हो सकता है। आमतौर पर यह स्थिति 16 से 48 घंटे में ठीक हो जाती है। लेकिन इसका ठीक हो जाना यह साबित नहीं करता कि कानों को कोई नुकसान नहीं हुआ।
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डिमेंशिया और इसका खतरा - फोटो : Freepik.com
क्या कहती हैं डॉक्टर?

डॉ. जुथानी कहती हैं कि सुनने की क्षमता में कमी डिमेंशिया के खतरे को भी बढ़ाने वाली पाई गई है, हालांकि ये ऐसा जोखिम कारक है, जिसे समय रहते नियंत्रित किया जा सकता है। इसलिए कानों की सुरक्षा सिर्फ सुनने की क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक दिमाग को स्वस्थ रखने से भी जुड़ी हो सकती है।
 
  • लैंसेट कमीशन ऑन डिमेंशिया की रिपोर्ट में सुनने की क्षमता में कमी को जीवन के मध्य चरण में डिमेंशिया के सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक बताया है। 
  • करीब 15 लाख लोगों पर किए गए मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि सुनने की क्षमता में हर 10 डेसिबल की कमी के साथ डिमेंशिया का जोखिम 16 प्रतिशत बढ़ सकता है।
  • इसका मतलब यह नहीं है कि तेज संगीत सुनने वाले हर व्यक्ति डिमेंशिया का शिकार होगा। लेकिन लंबे समय में ये दिमाग की सेहत को नुकसान पहुंचाने वाला हो सकता है।



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स्रोत:
Hearing loss and dementia in older adults: A narrative review


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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