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विशेषज्ञों ने बताया: कोरोना के डेल्टा वेरिएंट के बाद अब क्या है 'डेल्टा प्लस'? यहां जानिए सबकुछ विस्तार से

Thu, 17 Jun 2021 12:04 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वेरिएंट डेल्टा प्लस में बदला (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
देश में कोरोना संक्रमण के मामले अब काफी हद तक थमते नजर आ रहे हैं। जिंदगी दोबारा पटरी पर लौट ही रही थी कि वैज्ञानिकों ने कोरोना के डेल्टा वेरिएंट्स के बारे में सूचित कर दिया। वैज्ञानिकों का कहना है कि देश में कोरोना की दूसरी लहर की मुख्य वजह इसी डेल्टा वेरिएंट को माना जा सकता है। डेल्टा वेरिएंट न केवल भारत, बल्कि पूरे विश्व में कहर बरपा रहा है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इस वेरिएंट को 'चिंता के विषय' के रूप में भी वर्गीकृत किया है। विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे पहले ब्रिटेन में पाए गए कोरोना के अल्फा वेरिएंट्स की तुलना में डेल्टा काफी अधिक प्रभावी है। हालिया अपडेट में वैज्ञानिकों ने बताया है कि कोरोना का डेल्टा वेरिएंट (B.1.617.2) म्यूटेशन के बाद 'डेल्टा प्लस' (AY.1) वेरिएंट में बदल गया है।
आइए इस लेख में कोरोना के इस घातक वेरिएंट के बारे में विस्तार से जानते हैं। इस लेख में विस्तार से समझने की कोशिश करेंगे कि 'डेल्टा प्लस' कितना खतरनाक हो सकता है? और क्या इसे ही कोरोना की तीसरी लहर के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए?
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कोरोना वायरस का डेल्टा वेरिएंट (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
कोरोना का डेल्टा वेरिएंट
'डेल्टा प्लस' के बारे में जानने से पहले आइए आपको बता देते हैं कि आखिर कोरोना का डेल्टा वेरिएंट क्या है, जिसे लेकर दुनियाभर में बहस छिड़ी हुई है। दूसरी लहर में कोरोना की गंभीर संक्रामकता के कारणों का पता लगा रहे विभिन्न भारतीय संस्थानों के वैज्ञानिकों की एक टीम ने डेल्टा वेरियंट (बी.1.617.2) के बारे में लोगों को सूचित किया। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के निष्कर्ष में पाया गया है कि डेल्टा वेरियंट (बी.1.617.2) अन्य वेरियंट्स की तुलना में काफी अधिक संक्रामक हैं। अल्फा वेरियंट की तुलना में इसका ट्रांसमिशन भी 50 फीसदी से अधिक होने का अनुमान है। इसके अलावा अल्फा की तुलना में डेल्टा वेरियंट का वायरल लोड भी अधिक पाया गया है। 
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कोरोना के बदलते वेरिएंट्स (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : pixabay
डेल्टा प्लस क्या है?
वैज्ञानिकों ने बताया है कि नया डेल्टा प्लस वेरिएंट, वायरस के K417N म्यूटेशन के कारण बना है। दिल्ली स्थित सीएसआईआर- इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के वैज्ञानिक विनोद स्कारिया ने एक ट्वीट में बताया कि कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन के कारण डेल्टा प्लस वेरिएंट सामने आया है।  
जीनोमिक अनुक्रमण में विशेषज्ञता रखने वाली वैज्ञानिक बानी जॉली बताती हैं कि डेल्टा के कुछ अनुक्रमों में म्यूटेशन देखने को मिला है। अब तक करीब 10 देशों से वायरस में इस तरह के बदलावों के बारे में जानकारी मिली है। ब्रिटेन के स्वास्थ्य अधिकारियों ने डेल्टा वेरिएंट के कुल 63 जीनोम की सूचना दी है जिनमें K417N म्यूटेशन का पता चला है।

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मोनोक्लोनल एंटीबॉडी रेजिस्टेंस है वायरस का नया रूप - फोटो : Pixabay
कितना खतरनाक साबित हो सकता है 'डेल्टा प्लस'
डॉ. स्कारिया के अनुसार, मौजूदा समय में भारत में वायरस के K417N म्यूटेशन वाले वेरिएंट की फ्रीक्वेंसी बहुत अधिक नहीं है। ज्यादातर यूरोप, एशिया और अमेरिका के हिस्सों में इसमें परिवर्तन की सूचना है। इस बारे में एक और बात पता चली है कि यह मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का प्रतिरोध कर सकता है। 
पुणे स्थित इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च की प्रोफेसर और इम्यूनोलॉजिस्ट विनीता बल कहती हैं कि फिलहाल इसका निर्धारण करना कठिन है कि नया स्ट्रेन कितना संक्रामक हो सकता है? इसके अलावा इसके ट्रांसमिशन को लेकर भी कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। हां इतना जरूर है कि इससे संक्रमित होने वाले लोगों में निश्चित ही खतरा अधिक हो सकता है। क्या यही कोरोना की तीसरी लहर का कारण बनेगा, इस बारे में स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है।
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डॉ. वीके पॉल (नीति आयोग) - फोटो : ANI
डेल्टा प्लस, 'वेरिएंट ऑफ कंसर्न' नहीं
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि डेल्टा प्लस को अभी डेल्टा वेरिएंट की तरह 'चिंता कारक' के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वीके पॉल ने कहा, “हम यह कह सकते हैं कि डेल्टा प्लस वेरिएंट के बारे में पता चला है, हालांकि इसे चिंता कारक के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया है। इस संबंध में जानने के लिए अभी और अधिक अध्ययनों की आवश्यकता है। किसी भी नए वेरिएंट से निपटने का एकमात्र सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है कोविड से बचाव के सभी नियमों का पालन करना। सभी लोगों को नियमित रूप से इन नियमों का पालन करते रहना चाहिए।

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नोट: यह लेख दिल्ली स्थित सीएसआईआर- इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स एंड इंटीग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) के वैज्ञानिक डॉ विनोद स्कारिया और जीनोमिक अनुक्रमण में विशेषज्ञता रखने वाली वैज्ञानिक बानी जॉली द्वारा दी गई जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में ट्वीट संलग्न हैं।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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