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Study: वैज्ञानिकों ने माना- ये है कोरोना महामारी का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव, अगले 70-80 साल तक बना रह सकता है असर

Tue, 04 Jul 2023 12:19 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना और टाइप-1 डायबिटीज - फोटो : istock
कोरोना वायरस का हमारे पूरे शरीर पर कई प्रकार से गंभीर दुष्प्रभाव देखा गया है। अध्ययनों से पता चलता है कि गंभीर रूप से संक्रमण का शिकार रहे लोगों में हृदय-फेफड़े, श्वसन प्रणाली से संबंधित समस्याएं लंबे समय से बनी हुई देखी जा रही हैं। लॉन्ग कोविड से संबंधित एक अध्ययन में कहा गया है कि एक साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद अब भी कई लोगों में गंध-स्वाद की दिक्कत ठीक नहीं हुई है। वहीं एक हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं की टीम ने कोविड-19 के सबसे बड़े और चिंताजनक दुष्प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। 

शोधकर्ताओं ने पाया कि कोरोना महामारी के बाद से दुनियाभर में टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चों और किशोरों की संख्या में असामान्य वृद्धि हुई है। कम उम्र में ही डायबिटीज की समस्या पूरे जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। यानी अगर किसी 10 साल के बच्चे में इस डायबिटीज का निदान हुआ है तो उसे जीवनभर इंसुलिन लेने की आवश्यकता हो सकती है। जिसका मतलब है कि अगले  70-80 साल (जीवनकाल) तक इस दुष्प्रभाव का असर बना रह सकता है।
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टाइप-1 डायबिटीज के बढ़े मामले - फोटो : iStock
बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के बढ़े मामले

जामा नेटवर्क ओपन जर्नल प्रकाशित इस शोध के परिणाम में डॉक्टर्स की टीम ने बच्चों में डायबिटीज के बढ़ते मामलों के लेकर चिंता जाहिर की है। इस अध्ययन के लिए यूके सहित विभिन्न देशों से 38,000 से अधिक युवाओं का डेटा एकत्र किया गया है। जिसमें पाया गया है कि महामारी की शुरुआत के बाद से टाइप-1 डायबिटीज के निदान के आंकड़ों में तेजी से उछाल आया है।

अध्ययन के लेखकों का कहना है ये आंकड़े वास्तव में काफी चिंताजनक हैं, इससे भविष्य के लिए भी खतरा है।
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कोरोना महामारी के दुष्प्रभाव - फोटो : Istock
क्यों बढ़े टाइप-1 डायबिटीज के मामले?

विशेषज्ञों ने कहा, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि मामलों में वृद्धि किस कारण से हुई है, लेकिन कुछ बातें जरूर हैं जिनपर ध्यान दिया जाना चाहिए। एक सिद्धांत यह है कि कोविड कुछ बच्चों में प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकता है जिससे मधुमेह का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन इस प्रकार की ऑटोइम्यून प्रतिक्रिया को समझने के लिए किए गए अध्ययनों में पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं।

एक और परिकल्पना यह है कि सामान्य स्थितियों में जर्म्स और रोगजनकों के संपर्क में आने से बच्चों का शरीर स्वयं उससे मुकाबले के लिए प्रतिरक्षा विकसित कर लेता है।  वैज्ञानिकों का मानना है कि कोविड के दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के चलते कई बच्चे रोगाणुओं के संपर्क में ही नहीं आए जिससे उनमें प्रतिरक्षा विकसित ही नहीं हुई है।  

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बच्चों में डायबिटीज की समस्या - फोटो : istock
27 फीसदी तक बढ़े केस

महामारी से पहले बचपन में टाइप-1 डायबिटीज के निदान की दर प्रतिवर्ष लगभग 3% थी। हालिया अध्ययन में पाया गया कोविड से पहले की तुलना में महामारी के पहले वर्ष के दौरान इस दर में 14% की वृद्धि हुई थी। कोविड के दूसरे वर्ष में यह वृद्धि 27% से भी अधिक थी।

टोरंटो विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि कारण चाहे जो भी हो, टाइप-1 डायबिटीज से प्रभावित बच्चों और किशोरों की बढ़ती संख्या बहुत चिंताकारक है। युवा आबादी का इस गंभीर क्रोनिक बीमारी का शिकार होना न सिर्फ उनमें कई अन्य बीमारियों के खतरे को बढ़ा रहा है साथ ही इससे क्वालिटी ऑफ लाइफ भी प्रभावित हो सकती है।
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बच्चों में मधुमेह के लक्षणों पर ध्यान दें। - फोटो : Pixabay
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

टाइप-1 डायबिटीज चैरिटी जेडीआरएफयूके की नीति निदेशक हिलेरी नाथन कहती हैं, यह शोध दुनियाभर में बच्चों में बढ़े डायबिटीज के जोखिमों को लेकर अलर्ट करता है। बच्चों में मधुमेह के लक्षणों पर ध्यान दें। थकान, अधिक प्यास लगने, बार-बार पेशाब जाने की आवश्यकता और वजन कम होना अगर आप भी बच्चे में नोटिस कर रहे हैं तो तुंरत इसके निदान के लिए डॉक्टर से मिलें। 

डायबिटीज यूके के डॉ. फेय रिले कहते हैं, अध्ययनों में हम दीर्घकालिक समस्याओं की जांच कर रहे हैं, समय के साथ टाइप-1 की घटनाओं में वृद्धि और बच्चों को कैसे इसके खतरे से सुरक्षित किया जाए इसे समझने के लिए शोध जारी है।



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स्रोत और संदर्भ
Incidence of Diabetes in Children and Adolescents During the COVID-19 Pandemic


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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