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Coronavirus: क्यों कोरोना वायरस का मुकाबला करने में भारतीय ज्यादा सक्षम हैं? चौंकाने वाली है ये रिपोर्ट

Mon, 02 Nov 2020 09:39 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
भारत में एक बड़ी आबादी को साफ पानी नसीब नहीं, बड़ी तादाद में लोग बासी या फिर सेहत खराब करने वाला खाना खाते हैं, दूषित हवा में सांस लेते हैं और ऐसी जगह रहते हैं जहां बेहद घनी आबादी होती है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसे वातावरण में रहने वाले लोगों को गैर-संक्रामक बीमारियां जैसे हृदय रोग, कैंसर, सांस संबंधी और मधुमेह जैसी बीमारियों के होने का खतरा अधिक होता है। एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा वातावरण कई गंभीर बीमारियों को न्योता देने का काम करता है। अकेले वायु प्रदूषण के कारण ही भारत में हर साल दस लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि कोविड-19 से सुरक्षित रहने के लिए सुरक्षित पानी, स्वच्छ और स्वस्थ माहौल अति आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने एक संयुक्त अध्ययन में पाया है कि दुनिया के लगभग तीन अरब लोग (वैश्विक आबादी का 40 फीसदी) विकासशील देशों में रह रहे हैं, जिनके पास 'बुनियादी हाथ धोने की सुविधा' तक नहीं है। यह तथ्य अपने आप में चिंता में डालना वाला था कि ऐसी स्थिति में जब हाथ धोने तक की सुविधा का अभाव है तो इन देशों को कोरोना वायरस के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे और भारत जैसे देशों में लाखों की संख्या में लोग मारे जाएंगे। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के डायरेक्टर जनरल डॉ. शेखर माण्डे कहते हैं, 'आमतौर पर इन देशों में स्वास्थ्य सुविधाओं की, स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण की स्थिति बहुत खराब है और अक्सर ऐसा माना जाता है कि ऐसे में यह माहौल संक्रामक बीमारियों के प्रसार के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। ऐसे में इस तरह की आशंका जताना स्वाभाविक था कि कोविड-19 का कहर निम्न और निम्न-मध्यम आय वर्ग वाले देशों में सबसे अधिक होगा।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
भारत की आबादी दुनिया की कुल आबादी का छठा हिस्सा है और अभी तक दुनिया में जितने लोग कोरोना संक्रमित हुए हैं उसका छठा हिस्सा भी भारत से ही दर्ज किया गया है। कोरोना संक्रमण से होने वाली मौतों में से दस प्रतिशत मौतें भारत में हुई हैं और केस फैटेलिटी रेट (CFR यानी कोविड-19 रोगियों के मरने की दर) सिर्फ दो प्रतिशत है। यह फैटेलिटी रेट दुनिया में सबसे कम है। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नए शोध का हवाला देते हुए कहा है कि साफ-सफाई की कमी, साफ पीने के पानी की कमी और अस्वच्छ परिस्थितियों में रहने के कारण यहां कोविड से कई लोगों की जिंदगी बच गई। 

अगर दूसरे शब्दों में कहें तो इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में रहने वाले लोग बचपन से ही कई तरह के रोगजनकों के संपर्क में आते हैं और उनकी इम्यूनिटी इतनी मजबूत हो गई है कि वो कोरोना वायरस का मुकाबला करने में सक्षम हो गए हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दोनों ही शोध का अभी निरीक्षण नहीं हुआ है, लेकिन उन दोनों ने ही फैटेलिटी रेट की तुलना करने के लिए प्रति दस लाख की आबादी पर मरने वालों की संख्या का इस्तेमाल किया है। एक पेपर में दो दर्जन मापदंडों पर आधारित 106 देशों के उपलब्ध सार्वजनिक डेटा का अध्ययन किया गया है। ये तुलना जनसंख्या घनत्व, डेमोग्राफी, बीमारियों की व्यापकता और स्वच्छता की गुणवत्ता जैसे और कई दूसरे मापदंडों के आधार पर की गई है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि उच्च आय वाले देशों में कोविड-19 से मरने वालों की संख्या तुलनात्मक रूप से अधिक है। अध्ययन के लेखकों में से एक डॉ. माण्डे के मुताबिक, 'गरीब और कम आय वाले देशों में लोगों की रोध प्रतिरोधक क्षमता उच्च आय वाले देशों की तुलना में अधिक है।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
एक अन्य अध्ययन में कोरोना संक्रमण के दौरान माइक्रोबायम की भूमिका पर गौर किया गया है। एक मानव शरीर के भीतर खरबों माइक्रोब्स रहते हैं। माइक्रोबायोम में बैक्टीरिया, वायरस, कवक और एक-कोशकीय वाले आर्किया शामिल होते हैं। वे पाचन में मदद करते हैं, रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं से सुरक्षित रखते हैं और प्रतिरक्षा प्रणाली को नियमित करते हैं। इसके साथ ही विटामिन का उत्पादन भी करते हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज के डॉ. प्रवीण कुमार और बाल चंदर ने दुनियाभर के 122 देशों के आंकड़ों का अध्ययन किया है, जिनमें से 80 देश उच्च आय और उच्च-मध्यम आय वाले थे। उनका मानना है कि कोविड-19 के कारण हुई मौतें उन देशों में तुलनात्मक रूप से कम हैं, जहां एक बड़ी आबादी अलग-अलग तरह के रोगाणुओं के संपर्क में आती है। यह बैक्टीरिया आमतौर पर गंभीर निमोनिया, ब्लड और यूरिनरी नलिकाओं और त्वचा संक्रमण के लिए जिम्मेदार होते हैं, लेकिन ऐसा माना जाता है कि यह बैक्टीरिया एक एंटीवायरल साइटोकाइन का निर्माण करते हैं जो रोगजनकों से लड़ने में सहायक होते हैं। इन्हें इंटफेरॉन कहा जाता है जो कोरोना वायरस के खिलाफ कोशिकाओं की रक्षा करता है। 

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डॉक्टर चंदर ने बताया, 'अभी तक कोविड-19 का जो मौजूदा मॉडल हैं, उनमें माइक्रोबायोम और वातावरण से संपर्क में आने के कारण पैदा हुए प्रतिरोधक क्षमता को ध्यान में नहीं रखा गया है।' वैज्ञानिकों का मानना है कि कुल मिलाकर इनका सीधा संबंध व्यक्ति के हाइजीन से है। 

मैट रिशेल 'एन इलिगेंट डिफेंस: द एक्स्ट्राऑर्डिनरी न्यू साइंस ऑफ द इम्यून सिस्टम' के लेखक हैं। उनके मुताबिक, हमारे आस-पास का वातावरण इतना साफ हो चुका है कि इसकी वजह से हमारी प्रतिरोधक क्षमता गंभीर बीमारियों से लड़ने के लिए प्रशिक्षित नहीं हो पाई है। मैट रिशेल के अनुसार, 'मोटे तौर पर समझें तो बात इतनी सी है कि साफ-सफाई पर बहुत ज्यादा ध्यान देकर हम अपनी प्रतिरोधक क्षमता को बीमारियों से लड़ने के प्रशिक्षण से वंचित कर रहे हैं।' हालांकि ये सिद्धांत, अपने आप में नया नहीं है। 

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मौसमी बुखार पर साल 1989 में एक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था। इस शोध पत्र में एक बच्चे में मौसमी बुखार होने की आशंका और भाई-बहनों की संख्या के बीच एक बड़ा संबंध पाया गया था। इस शोध पत्र में कहा गया कि 'बचपन में बड़े भाई-बहनों या संक्रमित मां के संपर्क में आने से हुए संक्रमण के कारण एलर्जी से होने वाली बीमारियों से बचाव होता है।' 

विश्व एलर्जी संगठन के एक शोध पत्र में मिस्टर रिशेल के हवाले से लिखा गया है कि प्रवासियों पर अध्ययन से पता चलता है कि जब गरीब देश के लोग अमीर देश जाते हैं तो दोनों ही तरह की एलर्जी और ऑटो-इम्यूनिटी बढ़ जाती है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में इम्यूनोलॉजिस्ट स्मिता अय्यर का मानना है कि एंटी वायरल इम्यूनिटी के अध्ययन में हाईजीन की थ्यूरी सही नहीं साबित होती है। 

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स्मिता अय्यर के मुताबिक, 'हालांकि यह पहचानते हुए कि हमारी रोग प्रतिरक्षा प्रणाली एक ही बार में कई रोगाणुओं के हमले का सामना कर सकती है, हम एक मॉडल का निर्माण कर सकते हैं, जहां पहले किसी हमले के लिए प्रयोग में लाई गई प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, वर्तमान हमले के प्रति प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।' 

वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसे अध्ययनों पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है, लेकिन डॉक्टर माण्डे कहते हैं, 'इसका यह कत्तई अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि हमलोग इस बात की वकालत कर रहे हैं कि भविष्य में आने वाली महामारी से मुकाबला करने के लिए स्वच्छता का ध्यान रखना छोड़ दें।' 
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मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलाइना में संक्रामक रोगों की सहायक प्रोफेसर कृतिका कुप्पल्ली का कहना है कि नए शोध में कई तरह की धारणाओं को ध्यान में रखा गया है जो वैज्ञानिक रूप से अभी तक सिद्ध नहीं हुई हैं। 'वे वैज्ञानिक तथ्य से अधिक, परिकल्पना हैं।' 

इसके अलावा महामारी के विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की ज्यादातर आबादी युवा है और संभव है कि यह भी एक कारण हो कि यहां कोविड-19 से मरने वालों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम है। कोरोना वायरस का अधिक खतरा बुजुर्गों को है। हालांकि यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि पिछली संक्रामक बीमारियों के चलते पैदा हुई रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी इसका कारण है। स्पष्ट है कि फैटेलिटी रेट कम होने के पीछे कई कारण हो सकते हैं। 

प्रोफेसर कृतिका कुप्पल्ली कहती हैं, 'इस वायरस के बारे में जानने के लिए अभी बहुत कुछ है और इस महामारी से जूझते हुए हमें अभी दस महीने ही हुए हैं। सच्चाई यह है कि अभी इस वायरस के बारे में बहुत कुछ ऐसा है जो हमें पता तक नहीं है।' 
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