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क्या 'माउथवॉश' कर के कोरोना संक्रमण से बचा जा सकता है, क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

Fri, 15 May 2020 07:36 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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माउथवॉश (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच इसकी दवा और वायरस तैयार करने को लेकर दुनिया भर में शोध हो रहे हैं। कोरोना वायरस से निपटने के लिए उपाय ढूंढने में विभिन्न देशों के वैज्ञानिक प्रयासरत हैं। यह तो स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना हमारे नाक, आंख, मुंह आदि के रास्ते हमारे शरीर में प्रवेश कर सकता है और फिर गले से होकर यह हमारे फेफड़ों तक पहुंच जाता है। फेफड़ों में इसका संक्रमण फैलने के बाद सांस लेने में परेशानी बढ़ जाती है और फिर संक्रमित मरीज को वेंटिलेटर की जरूरत पड़ती है। आए दिन कोरोना वायरस से बचाव के लिए कई तरह के उपाय बताए जा रहे हैं। एक नई रिपोर्ट में शोधकर्ताओं का कहना है कि माउथवॉश कर के कोरोना संक्रमण को गंभीर होने से रोका जा सकता है। कहा जा रहा है कि संक्रमण फैलने से पहले ही माउथवॉश के दौरान कोरोना वायरस नष्ट हो सकता है। 
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शोध (फाइल फोटो)
डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शोधकर्ताओं का कहना है कि माउथवॉश करने से कोरोना वायरस को संक्रमण से पहले नष्ट किया जा सकता है। उनका तर्क है कि कोरोना वायरस के बाहरी हिस्से पर एक फैट की लेयर होती है, जिसे कुछ केमिकल्स यानी रसायनों द्वारा नष्ट किया जा सकता है। शोधकर्ताओं की टीम ने पाया कि माउथवॉश की मदद से वायरस की बाहरी लेयर नष्ट की जा सकती है और मुंह और गले में वायरस रेप्लिकेशन नहीं कर सकता है यानी कि अपनी संख्या नहीं बढ़ा सकता है। 
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शोध (फाइल फोटो)
इस शोध अध्ययन में कहा गया है कि टेस्ट ट्यूब प्रयोग और सीमित प्रयोग में पता चला है कि माउथवॉश में वायरसों को खत्म करने वाले रसायन पाए जाते हैं, जो लिपिड्स को टारगेट करते हैं। वायरस के बाहरी परत में ऐसे ही लिपिड्स पाए जाते हैं, जिन्हें माउथवॉश के जरिए नष्ट किया जा सकता है। हालांकि अबतक इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं है कि माउथवॉश कोरोना वायरस की लेयर पर भी असर करेंगे या नहीं।
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शोध(फाइल फोटो)
और ज्यादा शोध की जरूरत
वैज्ञानिकों का कहना है कि कोरोना वायरस को नष्ट करने में माउथवॉश कितने कारगर हैं, इसके लिए और ज्यादा शोध की जरूरत है। इस शोध अध्ययन के लेखकों का कहना है कि माउथवॉश में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों पर शोध किया जाना चाहिए। शोधकर्ताओं की टीम में वायरॉलजिस्ट, लिपिड साइंटिस्ट और हेल्थकेयर एक्सपर्ट शामिल थे। कार्डिफ यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिसिन और नॉटिंघम, कोलोराडो, ओटावा, बार्सिलोना और कैंब्रिज इंस्टिट्यूट ने मिलकर यह स्टडी की है।
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