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कोरोना वायरस वैक्सीन पर बड़ी कामयाबी, बंदरों में विकसित हुई एंटीबॉडी, अब इंसानों पर ट्रायल

Fri, 15 May 2020 04:58 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर
अमेरिका और ब्रिटेन के कुछ शोधकर्ताओं ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से बताया है कि ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी में कोरोना वायरस की जिस वैक्सीन पर काम चल रहा है, उसके शुरुआती निष्कर्ष आशाजनक हैं। शोधकर्ताओं ने छह बंदरों के एक समूह पर इस वैक्सीन को आजमाया और पाया कि ये काम कर रही है।

बताया गया है कि अब इस वैक्सीन का ट्रायल इंसानों पर चल रहा है। साथ ही आने वाले दिनों में कुछ अन्य वैज्ञानिकों से इस वैक्सीन का रिव्यू करवाया जाएगा। ब्रिटेन के दवा निर्माता AZN.L ने पिछले महीने घोषणा की थी कि उसने ऑक्सफॉर्ड वैक्सीन ग्रुप और जेनर संस्थान के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर कोरोना वायरस के टीके पर काम शुरू किया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
बंदरों पर ट्रायल
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि छह बंदरों को कोरोना वायरस की भारी डोज देने से पहले, उन्हें यह टीका लगाया गया था। हमने पाया कि कुछ बंदरों के शरीर में इस टीके से 14 दिनों में एंटीबॉडी विकसित हो गईं और कुछ को 28 दिन लगे।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
शोधकर्ताओं के अनुसार, "कोरोना वायरस के संपर्क में आने के बाद, इस वैक्सीन ने उन बंदरों के फेफड़ों को नुकसान से बचाया और वायरस को शरीर में खुद की कॉपियां बनाने और बढ़ने से रोका। लेकिन वायरस अभी भी नाक में सक्रिय दिखाई दे रहा था।"

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शोध (फाइल फोटो) - फोटो : फाइल फोटो
लंदन स्कूल ऑफ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसन के एक प्रोफेसर, डॉक्टर स्टीफन इवांस ने कहा कि 'बंदरों पर शोध के बाद जो नतीजे आए हैं, वो निश्चित रूप से एक अच्छी ख़बर है।' उन्होंने कहा, "यह ऑक्सफर्ड वैक्सीन के लिए एक बड़ी बाधा की तरह था जिसे उन्होंने बहुत अच्छी तरह से पार कर लिया है।"
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कोरोना वायरस - फोटो : social media
सफल होने की संभावना?
टीका विकसित करने की प्रक्रिया में उसका बंदरों पर सफल होना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिकों की जानकारी के अनुसार कई टीके जो लैब में बंदरों की रक्षा कर पाते हैं, वो अंतत: मनुष्यों की रक्षा करने में विफल रहते हैं।
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कोरोना वायरस जांच (फाइल फोटो) - फोटो : बासित जरगर
प्रोफेसर इवांस कहते हैं, "इस मामले में एक चीज जो अच्छी है, वो ये कि जो टीके काम नहीं करते, वो सुरक्षा देने की बजाय, कई बार बीमारी को बदतर बनाते हैं। कोरोना वायरस का टीका विकसित करने में एक सैद्धांतिक चिंता तो निश्चित रूप से रहेगी और इस अध्ययन में कोई नकारात्मक सबूत ना मिलना, बहुत उत्साहजनक है।"
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कोरोना वायरस की जांच (फाइल फोटो) - फोटो : बासित जरगर
शोधकर्ताओं ने बताया है कि 13 मई तक इस शोध के लिए स्वेच्छा से सामने आए करीब एक हजार लोगों को ट्रायल के तौर पर यह टीका लगाया जा चुका है।शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि अगले एक महीने में वो कुछ स्पष्ट निष्कर्षों तक पहुंच पाएंगे।

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कई और जगह भी काम जारी
दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी कोरोना वायरस वैक्सीन के ट्रायल चल रहे हैं जो मानव परीक्षण की स्टेज तक पहुंच चुके हैं। मॉडर्ना कंपनी का MRNA.O, फाइजर कंपनी का PFE.N, बायोएन टेक कंपनी का 22UAy.F और चीन की कानसिंनो बायोलॉजिक्स कंपनी का 6185.HK टीका इसमें शामिल हैं। वैश्विक रूप से कोरोना वायरस से लड़ने के लिए 100 से अधिक टीकों पर काम चल रहा है।

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तापमान जांचते स्वास्थ्यकर्मी (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
लेकिन 40 लाख से ज्यादा लोगों को संक्रमित कर चुके और तीन लाख से ज्यादा लोगों की जान ले चुके इस वायरस का टीका तैयार करने वालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बात की है कि अगर टीका बना, तो कितनी बड़ी मात्रा में इसकी डोज तैयार करनी होगी।
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आम तौर पर, एक कामकाजी टीका विकसित करने में 10 साल तक का समय लग सकता है। लेकिन महामारी की तात्कालिकता में आई तेजी को देखते हुए और मरने वालों की संख्या को देखते हुए, बड़े शोधकर्ता कोरोना वायरस का टीका जल्द से जल्द विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
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