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कोरोना वायरस: क्या होता है साइटोकाइन स्टॉर्म, जो प्रतिरक्षा तंत्र को ही बना देता है शरीर का दुश्मन

Tue, 18 May 2021 01:20 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
देश में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से घट रहे हैं, लेकिन इसके कारण होने वाली मौतों का तांडव अभी जारी है। बीते 24 घंटे में दो लाख 60 हजार से अधिक नए मामले सामने आए हैं, जबकि इस दौरान 4,300 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी है। मरने वालों में बुजुर्गों से लेकर नौजवान तक शामिल हैं। इसमें सिर्फ वही लोग शामिल नहीं हैं, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है बल्कि इसमें सेहतमंद लोग भी शामिल हैं। ऐसा देखने में आया है कि संक्रमण से लोगों में साइटोकाइन स्टॉर्म का खतरा भी बढ़ रहा है। आइए जानते हैं कि ये साइटोकाइन स्टॉर्म क्या होता है और यह कैसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को ही शरीर का दुश्मन बना देता है? 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
क्या होता है साइटोकाइन स्टॉर्म? 
  • दिल्ली स्थित सेंट स्टीफन अस्पताल के डॉ. मैथ्यू वर्गीस कहते हैं, 'जब भी हमारे शरीर में कोई वायरस प्रवेश करता है तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता उससे लड़ती है और उसे खत्म कर देती है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमारा इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय हो जाता है और बीमारी से लड़ने के साथ-साथ हमारे शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं को भी नुकसान पहुंचाने लगता है।' इसे ही 'साइटोकाइन स्टॉर्म' कहा जाता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
डॉ. मैथ्यू वर्गीस कहते हैं, 'दरअसल, वायरस जब शरीर में प्रवेश करके तेजी से अपनी कॉपी बनाने लगता है, तो इम्यून सिस्टम भी वायरस को खत्म करने के लिए अधिक संख्या में साइटोकाइन पैदा करने लगता है। इस दौरान मरीज को तेज बुखार और सिरदर्द होता है।' इस बारे में विशेषज्ञ कहते हैं कि जब इम्यून सिस्टम अनियंत्रित हो जाता है और साइटोकाइन का अधिक उत्पादन करने लगता है, तब साइटोकाइन स्टॉर्म का खतरा बढ़ जाता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
उजाला सिग्नस अस्पताल के डॉ. राजन गांधी कहते हैं कि साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान मरीज कोमा में भी जा सकते हैं। इसके अलावा शरीर में साइटोकाइन के बढ़ने से ब्लड क्लॉट की समस्या पैदा हो सकती है, दिल की धड़कनें अनियंत्रित हो सकती हैं और हार्ट अटैक की संभावना बढ़ सकती है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
विशेषज्ञ कहते हैं कि महामारियों वाले फ्लू में शायद वायरस की वजह से नहीं बल्कि मरीज के शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक सक्रिय हो जाने की वजह से मौत होती है। 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू, 2003 में सार्स महामारी और एच1एन1 स्वाइन फ्लू में भी ऐसा देखने को मिला है। 

नोट: यह लेख दिल्ली स्थित सेंट स्टीफन अस्पताल के डॉ. मैथ्यू वर्गीस के एक वीडियो और डॉ. राजन गांधी से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। डॉ. राजन गांधी अत्यधिक योग्य और अनुभवी जनरल फिजिशियन हैं। इन्होंने कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज से अपना एमबीबीएस पूरा किया है। इसके बाद इन्होंने सीएच में डिप्लोमा पूरा किया। फिलहाल यह उजाला सिग्नस कुलवंती अस्पताल, कानपुर में मेडिकल डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट फिजिशियन के तौर पर काम कर रहे हैं। यह आईएमए (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के आजीवन सदस्य भी हैं। डॉ. राजन गांधी को इस क्षेत्र में 25 साल का अनुभव है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित अस्वीकरण- बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।  
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