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सलाह: बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए आवश्यक है पर्याप्त पोषण, आहार में इन चीजों को जरूर करें शामिल

Mon, 11 Oct 2021 06:58 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बच्चों को दें पौष्टिक आहार - फोटो : Pixabay
Medically Reviewed By-
डॉ. राकेश शुक्ला,
पीडियाट्रिशियन व नियोनेटोलॉजिस्ट,
रेस्पिरेटरी मेडिसिन,
बॉम्बे हॉस्पिटल


बचपन से हम सब अपने पैरेंट्स और डॉक्टरों से ये हिदायत सुनते आ रहे हैं कि- 'फल सब्जियां खाओगे तो हेल्दी रहोगे'। बड़े होने पर फिर यही सलाह हम अपने पैरेंट्स को देने लगते हैं। सेहत के लिए आखिर फल और सब्जियां क्यों हैं इतनी जरूरी? क्या इन्हें रोज खाने से वाकई सेहत पर कोई असर पड़ता है? क्यों बच्चे फल-सब्जियों से दूर भागते हैं और कैसे उनकी इस आदत को सुधारा जा सकता है? ये वो प्रश्न हैं जो लगभग हर पैरेंट के दिमाग में चलते हैं। इन सबकी वजह से खाने का समय और खाने का टेबल अक्सर युद्ध के मैदान में बदल जाता है।

मां चाहती हैं कि बच्चा हेल्दी खाना खाए, लेकिन बच्चा सब्जी को हाथ भी नहीं लगाना चाहता। नतीजा कई बार डांट और मार के बावजूद भी बहुत संतोषजनक नहीं निकलता। आख़िरकार माँ बच्चे की पसन्द की कोई एक चीज बनाकर खिला देती है, क्योंकि पेट भरना भी तो जरूरी है। यह स्थिति हम में से कइयों के घरों की है। इन सब के बीच जरूरी है कि सब्जी और फल खाने की आदत को बरकरार रखा जाना भी जरूरी है क्योंकि आखिर इससे फायदा ही है। 
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जंक फूड के नुकसान - फोटो : iStock
बच्चों का कैसा हो आहार?
खाने के स्वाद को सामान्यतः हम सब प्राथमिकता देते हैं। ज्यादातर मसालेदार, चटपटे या मीठे व्यंजन ही सबको पसन्द आते हैं। यह एक तथ्य है कि फायदा पहुंचाने वाला पौष्टिक भोजन अधिकांशतः स्वाद के मामले में मसालेदार भोजन की बराबरी नहीं कर सकते, लेकिन इसके फायदे सेहत को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। जब बड़ों के लिए ही स्वाद इतना आवश्यक हो जाता है तो बच्चों को आप जंक फूड या मसालेदार खाने से कैसे रोक सकते हैं? लेकिन जरूरी है कि जंक और पौष्टिक भोजन का अनुपात 30-70 रहे। यानी 30 प्रतिशत जंक और 70 प्रतिशत हेल्दी भोजन।

याद रखिए बच्चों के मामले में पराठे, पूरी, वेजिटेबल कटलेट, हलवा, आदि भी हेल्दी भोजन की ही श्रेणी में आता है। जरूरत है बस इसकी मात्रा को संतुलित रखने की। खैर, सामान्यतः एक बच्चे (3 वर्ष से ऊपर) के लिए दिन में 4 बार मील टाइम होना चाहिए। इसमें सुबह का नाश्ता, लंच, शाम का नाश्ता और डिनर शामिल है। इसमें आप कम से कम 2 बार फल शामिल कर सकते हैं।
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फल का सेवन बहुत आवश्यक - फोटो : Pixabay
सेहत के लिए क्यों जरूरी हैं फल?
फल और सब्जियों से एक बार की सर्विंग में ही भरपूर मात्रा में लगभग सभी तरह का पोषण मिल जाता है। फलों और सब्जियां, विटामिन, खनिज, एंटीऑक्सीडेंट्स, फाइबर आदि से भरपूर होते हैं। इनमें पानी की भी पर्याप्त मात्रा होती है, यानी शरीर के लिए जरूरी सभी आवश्यक पोषक तत्व फलों के जरिए मिल सकते हैं।

बच्चों का शरीर चूंकि विकास की अवस्था में होता है, इसलिए इस समय उनको इस तरह के पोषण की जरूरत भी होती है और इससे आगे आने वाले समय में उनका शरीर ज्यादा मजबूत बना रहता है। सबसे खास बात यह कि फल और सब्जियों में आर्टिफिशियल रंग, एक्स्ट्रा शुगर, मैदा, प्रिजरवेटिव्स और फैट नहीं होता, जिसकी वजह से बच्चों को बिना नुकसान पोषण मिल पाता है। शोध यह मानते हैं कि बचपन से फल और सब्जियां खाने की आदत बड़े होने पर क्रॉनिक डिसीज यानी गम्भीर बीमारियों से बचने में मदद कर सकती है।
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बच्चों के लिए जरूरी है पौष्टिक आहार - फोटो : Pixabay
इस तरह डालें खाने की आदत:
  • सबसे महत्वपूर्ण है हर मौसमी फल से बच्चे का परिचय करवाना। इसमें अमरूद से लेकर बेर, शहतूत, जामुन, पपीता, सीताफल आदि सभी शामिल हैं। अनार, पपीता, सेब, केले जैसे फल आजकल सालभर मिलते हैं लेकिन कोशिश करें कि बच्चे के पूरे दिन की डाइट में कम से कम 1 मौसमी फल जरूर शामिल हो।
  • घर के बड़े भी फल और सब्जी खाएं। बच्चे बड़ों की ही नकल करते हैं, जब वे आपको खाते हुए देखेंगे तो खुद भी खाना सीख जाएंगे।
  • फलों को रंगों के हिसाब से सजाकर बच्चों के सामने रखें। इसमें आप गाजर, चुकंदर और ककड़ी जैसे सलाद भी शामिल कर सकते हैं। अगर आप कच्चा सलाद नहीं देना चाहते तो फलों को काटकर, उन्हें हाफ बॉइल करें या भाप में कुछ देर पका लें। इसपर हल्का सा नमक या चाट मसाला डालकर फ्रूट चाट बनाकर खिलाएं। 
  • हर सब्जी खाने की आदत बच्चे को डालें। परवल, टिंडे, लौकी, कद्दू, बीन्स जैसी सब्जियां अक्सर सभी बच्चों को पसन्द नहीं आतीं लेकिन ये कई गुणों से भरी होती हैं। इन्हें आप दाल, सांभर, खिचड़ी, पुलाव, पराठे आदि में मिक्स करके भी खिला सकते हैं। 
  • कई बार बच्चों में फूड नियोफोबिया भी किसी सब्जी या फल को न खाने का कारण हो सकता है। इस फोबिया का मतलब है अनजान या नए भोजन का डर। यह मुख्यतः 2- 6 साल की उम्र में बच्चों में दिखाई देता है। ऐसे में जबरदस्ती करने की बजाय विशेषज्ञ से सलाह लें। ये समझें कि किस तरह बच्चे को हेल्दी खाने की आदत डाली जा सकती है।

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अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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