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ब्रेस्ट कैंसर: कैंसर का पता लगाने के लिए होने वाला टेस्ट कितना भरोसेमंद? सामने आ गई सच्चाई

Mon, 28 Sep 2026 02:21 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मेमोग्राफी ब्रेस्ट कैंसर की शुरुआती पहचान का महत्वपूर्ण टेस्ट है, लेकिन इसके जरिए सामने आने वाली कुछ असामान्य स्थितियों को लेकर ओवरडायग्नोसिस की बहस रही है। नए शोध में इस जोखिम का अनुमान पुराने आकलनों से काफी कम पाया गया है। इससे ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग को समझने की चर्चा फिर तेज हो गई है।
 
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ब्रेस्ट कैंसर का खतरा और जांच - फोटो : Amarujala.com/AI
स्तन कैंसर महिलाओं में होने वाले सबसे आम प्रकार के कैंसर में से एक है, जिससे हर साल लाखों मौतें हो जाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल इस कैंसर के 24 लाख से ज्यादा नए मामले सामने आते हैं और 6.94 लाख से अधिक महिलाएं मौत का शिकार होती हैं। समय रहते जांच हो जाए तो इसका इलाज और बीमारी के ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।

अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट में हमने बताया कि ब्रेस्ट कैंसर के मामले में हर बार गांठ महसूस होना जरूरी नहीं है, गांठ न होने पर भी कैंसर हो सकता है। ब्रेस्ट कैंसर की जांच को लेकर माना जाता रहा है कि जितनी जल्दी बीमारी का पता चले, उतना ही बेहतर होता है। इस कैंसर का पता लगाने के लिए मेमोग्राफी टेस्ट कराया जाता है।

मेमोग्राफी की मदद से स्तन में ऐसे बदलाव भी दिखाई दे सकते हैं, जिन्हें केवल हाथ से जांच करने पर महसूस करना मुश्किल हो सकता है। कैंसर की जांच को लेकर ये रिपोर्ट आपके सोच को बदलने वाली हो सकती है। 
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मैमोग्राफी ओवरडायग्नोसिस - फोटो : Adobe Stock
कैंसर स्क्रीनिंग की दुनिया में एक दूसरी चर्चा भी लगातार होती रही है, क्या जांच से सामने आने वाली हर असामान्य कोशिका या ट्यूमर भविष्य में खतरनाक बीमारी बनेगा?यहीं से ओवरडायग्नोसिस की चर्चा शुरू होती है। अब एक अहम शोध ने इस मुद्दे को नए आंकड़ों के साथ फिर चर्चा में ला दिया है। शोधकर्ताओं के निष्कर्ष पुराने अनुमानों से काफी अलग हैं। आखिर नया अध्ययन क्या बताता है और इसका महिलाओं के लिए क्या मतलब है? 


मेमोग्राफी से कैंसर की ओवरडायग्नोसिस का खतरा 5% से कम
 
  • शोध में सामने आया है कि मेमोग्राफी से कैंसर के ओवरडायग्नोसिस का खतरा पहले लगाए गए 30 से 50% तक के अनुमानों से काफी कम होकर महज 5% ही रह गया है।
  • मेमोग्राफी से ब्रेस्ट कैंसर की जांच में ऐसे कैंसर भी पकड़ में आने की संभावना रहती है, जो महिला की पूरी जिंदगी में कभी लक्षण या गंभीर बीमारी का कारण नहीं बनते। इसे ओवरडायग्नोसिस कहा जाता है।
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ब्रेस्ट कैंसर के जोखिम - फोटो : Adobe Stock
यूनिवर्सिटी ऑफ सदर्न डेनमार्क का अध्ययन अमेरिका के प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ द नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में प्रकाशित किया गया है। इसमें शोधकर्ताओं ने मेमोग्राफी से जुड़े आठ प्रमुख पुराने मामलों का दोबारा विश्लेषण किया। 

शोधकर्ताओं ने इन अध्ययनों के आंकड़ों की तुलना डेनमार्क के फ्यूनन क्षेत्र के नियमित ब्रेस्ट-कैंसर स्क्रीनिंग कार्यक्रम के आंकड़ों से की। डेनमार्क में अलग-अलग क्षेत्रों में स्क्रीनिंग अलग-अलग समय पर शुरू हुई थी। इससे यह देखने का मौका मिला कि स्क्रीनिंग शुरू होने के बाद कैंसर के मामलों में शुरुआती बढ़ोतरी और बाद में होने वाले बदलाव किस तरह सामने आते हैं।  

कैंसर के मामले बढ़ना हमेशा ओवरडायग्नोसिस का संकेत नहीं

शोध के मुताबिक स्क्रीनिंग शुरू होने पर कैंसर के मामले बढ़ना जरूरी नहीं कि ओवरडायग्नोसिस का संकेत हो। कई कैंसर ऐसे होते हैं जो बिना स्क्रीनिंग के भी कुछ साल बाद सामने आते हैं। अगर अध्ययन का फॉलोअप जल्दी खत्म हो जाए तो इन कैंसरों को गलती से ओवरडायग्नोसिस माना जा सकता है।


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स्रोत: 
Breast cancer overdiagnosis in mammography trials—separating signal from noise: a meta-analysis Get access Arrow


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। ये रिपोर्ट आज के समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर तैयार की गई है। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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