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विश्व रंगमंच दिवस: इन्होंने दुनिया में मनवाया अपने अभिनय का लोहा, पढ़िए बेहतरीन किस्से

Sat, 27 Mar 2021 02:59 PM IST
करिश्मा चिब न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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drama at Abhinav Theater jammu ( file photo) - फोटो : अमर उजाला
विश्व रंगमंच दिवस पर शनिवार को प्रदेश में रंगमंच से जुड़े उन कलाकारों को याद किया जाएगा, जिन्होंने प्रदेश, देश और दुनिया में अपने अभिनय का लोहा मनवाया है। विश्व रंगमंच दिवस पर जम्मू में अभिनव थियेटर में नाटक की प्रस्तुति की जाएगी। अन्य स्थानों पर भी कई आयोजन प्रस्तावित हैं। इसे लेकर कलाकार उत्साहित हैं। वर्तमान में रंगमंच की स्थिति और उसके प्रभाव पर भी विचार रखे जाएंगे। रंगमंच ने तकनीकी विकास की ऊंचाइयों को छू लिया है,लेनिन आज का रंगमंच आम जनमानस के उतना करीब नहीं हैं, जितना कभी हुआ करता था।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
स्थानीय कलाकारों को नहीं मिलता है सम्मान
जम्मू-कश्मीर के कलाकारों को वह प्लेटफार्म और सम्मान नहीं मिलता है, जैसा बाहरी राज्यों के कलाकारों को मिलता है। वार्षिक ड्रामा फेस्टिवल की व्यापक स्तर पर तैयारी की जाती है, लेकिन उसमें दर्शकों का अभाव रहता है। दूसरे राज्यों के कलाकार यहां आकर प्रस्तुति देते हैं, तो उसमें काफी भीड़ होती है। इसकी वजह से स्थानीय कलाकारों का मनोबल प्रभावित होता है। - तरुण शर्मा, संस्थापक, नटमंच
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Jammu Natrang Studio ( file photo) - फोटो : अमर उजाला
सरकारी सुविधाओं पर निर्भर आज की प्रस्तुतियां
वर्तमान में रंगमंच का दायरा सरकारी सुविधाओं तक सिमट गया है। कलाकारों में अभिनय के प्रति समर्पण पहले जैसा नहीं दिखता। रंगमंच को जानने की ललक भी कम हुई है। पहले रंगमंच की बारीकियों पर ध्यान दिया जाता था। आज के रंगमंच में सामंजस्य की भी कमी है। कलाकारों का लोगों से जुड़ाव नहीं होता। वह लोगों के बीच नहीं जाते। इसकी वजह से रंगमंच से दर्शक दूर होते जा रहे। - विजय मल्ला, संस्थापक, एकसाथ रंगमंडल

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वरिष्ठ रंगकर्मी और साहित्य प्रेमी मोहन सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
तकनीकी विकास के बीच रंगमंच जनमानस के कितना करीब
इक्कीसवीं सदी की दो दहाइयां पार करने के बाद जब हम रंगमंच के बारे में सोचते हैं, तो देखते हैं कि रंगमंच ने तकनीकी विकास की ऊंचाइयों को छू लिया है, लेकिन आज का रंगमंच आम जनमानस के उतना करीब नहीं है, जितना कभी हुआ करता था। विश्व रंगमंच दिवस पर इन्हीं पहलुओं पर प्रकाश डाल रहे हैं वरिष्ठ रंगकर्मी और साहित्य प्रेमी मोहन सिंह...

रंगमंच ने सदियों से लोगों का मनोरंजन किया है, लेकिन कोरे मनोरंजन से सदा दूर रहा है। चाहे वह विलियम शेक्सपियर का रंगमंच हो या भारतीय संस्कृति से जुड़ा रंगमंच। रंगमंच ने सामाजिक सरोकारों का निर्वाह किया है और जनमानस में जागृति लाने की कोशिश की है। बेशक रंगमंच के कलाकारों के सामने जीविका का प्रश्न भी रहा है। चाहे वह लोक रंगमंच के कलाकार हों या आधुनिक रंगमंच के। जीविका के सवाल ने हमेशा ही उन्हें परेशान किया है। इसके बावजूद उन्होंने रंगमंच की प्रतिष्ठा को बनाए रखने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और फटेहाल जीवन बिताते हुए भी रंगमंच को सामाजिक, सांस्कृतिक तथा क्षेत्रीय सरोकारों से जोड़े रखा। हर एक क्षेत्र विशेष के कलाकारों का योगदान इसमें अमूल्य रहा है। आज रंगमंच अपनी पहचान राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय पटल पर बना रहा है। उसकी पृष्ठभूमि में क्षेत्रीय रंगमंच और लोक रंगमंच का ही तो योगदान है।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
डुग्गर रामलीला रंगमंच की देन हैं कुंदन लाल सहगल, ओम प्रकाश और सुंदर
डुग्गर में रंगमंच को जीवित रखने में जिन लोक कलाकारों ने सदियों से पीढ़ी दर पीढ़ी अपना योगदान दिया और इस विरसे को हम तक पहुंचाया, वह आज गुमनामी के गर्त में हैं। गांव-गांव में होने वाला रामलीला रंगमंच और उसकी झलकियां उद्देश्यपूर्ण और सामाजिक सरोकारों से ओतप्रोत थीं। कुंदन लाल सहगल को पूरा विश्व जानता है। वे न सिर्फ गायक बल्कि महान अभिनेता भी थे। कुंदन लाल सहगल डुग्गर के क्षेत्रीय रामलीला रंगमंच की देन हैं। हास्य अभिनेता ओम प्रकाश और सुंदर भी इसी डुग्गर के क्षेत्रीय रंगमंच की देन हैं। तब से आज तक डुग्गर की धरती के कितने ही कलाकारों ने रंगमंच के क्षेत्र में अपना लोहा मनवाया है।
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अभिनव थियेटर में आयोजित नाटक (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
फिल्म और संगीत के क्षेत्र में भी डुग्गर के कलाकारों ने मनवाया लोहा
संगीत के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय पटल पर ख्याति प्राप्त उस्ताद अल्ला रक्खा खां और पंडित शिव कुमार शर्मा को कौन नहीं जानता। फिल्म सोलवां साल के पटकथा लेखक ओम डोगरा, जब-जब फूल खिले, फिल्म के लेखक बृज कटेआल और वेद राही का संबंध भी इसी धरती से रहा है। पुराने वक्त की मशहूर अभिनेत्री गुलाबो भी इसी डुग्गर धरती से थीं।
 
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Drama ( file photo) - फोटो : अमर उजाला
तब प्रेक्षागृह के नाम पर मुबारक मंडी, ग्रीन हाल और गुलाब भवन थे
लोक रंगमंच, रामलीला का मंच और फिर पारसी रंगमंच ने भी डुग्गर में अपनी साख कायम की और सिलसिलेवार रंगमंच से नए-नए कलाकार जुड़ते गए। आज से पचास साल पहले जब अपना रुझान रंगमंच की ओर हुआ तो रामलीला के मंच ने ही हमारे शौक को पाया तकमील तक पहुंचाया। उस समय राम रत्न शर्मा, शंभूनाथ शर्मा, दीनू भाई पंत, जितेंद्र शर्मा, वेदपालदीप आदि की खूब चर्चा होती थी। तब प्रेक्षागृह के नाम पर जम्मू शहर में मुबारक मंडी का ग्रीन हाल या फिर गुलाब भवन ही हुआ करते थे। कभी कभार यूथ हॉस्टल का प्लेटफार्म भी काम आता था। लेकिन ज्यादातर कलाकार मंच खुद बनाते थे। रंगमंच लोगों के इतना करीब था कि लोग वर्षों तक उसकी चर्चा करते। पचास और साठ के दशक में खेले गए डोगरी भाषा के नाटक ‘नमां ग्रां और सरंपच’ की चर्चा आज भी होती है।
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बाबा जित्तो नाटक का मंचन (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
 ...फिर भी आज का रंगमंच शहरों तक सिमट का रह गया
वर्तमान की बात करें तो ‘बाबा जित्तो’ नाटक को कई वर्षों से लगातार देखा जा रहा है। इसका कारण केवल बाबा जित्तो के प्रति आस्था ही नहीं है, बल्कि यहां की स्थानीय भाषा डोगरी का भी इसमें भरपूर योगदान है। आज तकनीकी सुविधाएं हैं। आर्थिक लाभ है। समाज में रुतबा है। फिर भी आज का रंगमंच शहरों तक सिमट गया है। जब रंगमंच पर लोगों की समस्याओं को उभारा ही नहीं जाएगा, तो लोगों का इससे दूर होना स्वाभाविक है। संवेदनहीनता यानी मानवीय मूल्यों का पतन, जिसकी आहट आज के रंगमंच में भी पूरी तरह से सुनाई देती है। विश्व रंगमंच दिवस पर इन बातों को समझने की जरूरत है।
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