बर्फ से लकदक पहाड़। शीशे जैसी बर्फ की चादर पर चलना। सिर उठाकर देखो तो मानो आसमान इतना करीब, जितना कभी नहीं था। चादर ट्रैक की खूबसूरती को बयां करने के लिए शायद इससे बेहतर शब्द नहीं होंगे। जम चुकी जंस्कार नदी पर बर्फ की चादर ने इस ट्रैक को चादर ट्रैक का नाम दिया है।
बेशक कश्मीर धरती का स्वर्ग है, लेकिन लद्दाख की खूबसूरती को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। यहां की हसीन वादियों में कई ऐसी जगह हैं, जो दुनिया भर से हर साल लाखों लोगों को यहां खींच लाती हैं। वैसे तो लद्दाख में अधिकांश पर्यटक जुलाई से सितंबर माह के बीच पहुंचते हैं, लेकिन जो लोग निर्धारित रूट से हटकर और विपरीत मौसम में रोमांच का अनुभव करते हैं, उन्हें बर्फ की चादर बिछने का इंतजार रहता है।
जनवरी में लद्दाख के जंस्कार का चादर ट्रैक आकर्षण का केंद्र बनता है। यहां देश के साथ-साथ विदेशों से भी पर्यटक जमे हुए झरनों और जंस्कार नदी पर जमी बर्फ पर चलने का रोमांचक अनुभव लेने पहुंचते हैं। चादर ट्रैक को भारत के सबसे अनूठे और चुनौतीपूर्ण ट्रैक में से एक माना जाता है। आमतौर पर छह से आठ दिन का यह ट्रैक जनवरी माह के अंत से फरवरी माह के अंत और कभी-कभी मौसम अनुकूल रहने पर मार्च तक भी जारी रहता है।
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लद्दाख
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
स्थानीय लोग बताते हैं कि चादर ट्रैक सदियों से स्थानीय लोगों द्वारा खानपान की व्यवस्था और व्यापार के लिए प्रयोग में लाया जाता रहा है। बर्फबारी के बाद जब लेह से जंस्कार कट जाता है, तो यह पुराना ट्रैक ही जोड़े रखता है। पल-पल बदलता मौसम हो या फिर टूटती-बनती नदी पर जमी बर्फ, इस मार्ग पर जोखिम बढ़ा देते हैं। एक ओर चट्टानें तो दूसरी ओर नदी पर जमीं बर्फ पर कभी भी पैर फिसलने का डर भी होता है।
ट्रैकिंग के दौरान बर्फ पर पैर फिसलने से नदी में धंसने का भी खतरा बना रहता है। लेकिन रोमांच प्रेमी इस सबकी परवाह किए बिना जीवन के अभूतपूर्व अनुभव हासिल करने पहुंचते हैं। वहां न तो मोबाइल का नेटवर्क होता है और न ही संपर्क का कोई दूसरा साधन।
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लद्दाख
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
दिन 1- हवाई जहाज से लेह पहुंचें
ऊंचाई 11,400 फीट
आकर्षण का केंद्र नेरक का झरना
स्थानीय लोगों के अनुसार नेरक शब्द दरअसल नर्क शब्द से लिया गया है। चूंकि चादर ट्रैक का नेरक तक सफर जिंदगी और मौत के बीच का है। ऐसे में स्थानीय लोग इस पड़ाव को नेरक के नाम से जानते हैं। लेकिन नेरक जितना डरावना है, उतना ही खूबसूरत भी है। यहां के जमे झरनों को देखकर किसी दूसरी दुनिया में होने का अहसास होता है।
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लद्दाख
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
दिन 2- चिलिंग से होते हुए गाड़ी के जरिए 65 किलोमीटर का तिलत सुमडो तक सफर
ऊंचाई - 11400 से 10390 फीट रात टेंट में गुजारें
यह सामान पास होना जरूरी
ट्रैकर्स को गाइड कई तरह की सलाह देते हैं। इनमें 50-60 किलो का बैक पैक, रेन कवर, एनर्जी बार, ओआरएस, व्यक्तिगत टार्च, एक लीटर की बॉटल, दो ट्रैक पेंट (पूरी लंबाई की), थर्मल इनर, दो ट्रैक टी शर्ट, ऊनी स्वेटर और जैकेट के अलावा दो वाटर प्रूफ हैंड गल्वस, ऊनी मोजे, टायलेट पेपर, तौलिया, सन ग्लासेज, सन स्क्रीन लोशन और लिप गार्ड के साथ-साथ ट्रैकिंग के लिए मेडिकल किट और वॉकिंग स्टिक रखना जरूरी है। ट्रैकिंग पर जाने से पूर्व डाक्टरी सलाह जरूरी है।
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लद्दाख
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
दिन 3- तिलत सुमडो से शिंगारा कोमा तक 10 किलोमीटर ट्रेकिंग
ऊंचाई-10390 से 10550 फीट
रात टेंट में ही गुजारें
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दिन 4 - शिंगारा कोमा से 15 किलोमीटर ट्रेक टिब्ब केव तक
ऊंचाई - 10550 से 10760 फीट
रात टेंट में ही गुजारें
बदल जाती है नदी की दिशा
जम चुकी जंस्कार नदी पर बर्फ की चादर ने इस ट्रैक को चादर ट्रैक का नाम दिया है। पहाड़ों की गोद में कुदरत के इस विहंगम नजारे को आंखें अपलक देखने को मजबूर होती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार चादर शब्द सर्दी से बचने वाले वस्त्र से प्रचलन में आया है। जंस्कार नदी की दिशा उसके जमते ही बदल जाती है। उफनती नदी के समय जहां उसे पार कर पाना भी मुश्किल होता है, वहीं सर्दी में लेह से जंस्कार का यह ट्रैक नदी के प्रवाह की विपरीत दिशा में होता है।
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- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
दिन 5- टिब्ब केव से नेरक कैंप तक 12.5 किलोमीटर ट्रेकिंग
ऊंचाई- 10760 से 11150 फीट
रात टेंट में गुजारें
आकर्षण : यहां के जमे हुए झरने।
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- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
दिन 6 से दिन 8 नेरक कैंप से टिब्ब केव, शिंगारा कोमा और फिर तिलत सुमडो पर पड़ाव और फिर लेह वापसी कैंप के दौरान रात टेंट में ही गुजारें। लेह में गेस्ट हाउस की व्यवस्था रहती है।
लेह प्रशासन की तरफ से सुरक्षा नियम जारी
जनवरी में आयोजित होने वाले चादर ट्रैक की विकट परिस्थितियों और पर्यटकों की सुरक्षा को देखते हुए लेह प्रशासन ने नियमावली जारी कर दी है। विशेष रूप से टूर आपरेटर्स और पर्यटकों के लिए जारी नियमावली में पर्यटकों को लेह में पहले तीन रातें गुजारने, इसके बाद मेडिकल चेकअप कराने, वन्यजीव विभाग से परमिट, एएलटीओए से एनओसी हासिल करने को कहा है। चादर ट्रैक के लिए परमिट हासिल करने सहित चादर ट्रैक का फी स्ट्रक्चर भी जारी किया गया है। भारतीय नागरिकों के लिए पांच हजार, जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 5200 फीस निर्धारित है।