इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रतिनिधिमंडल के बीच गुरुवार को हुई मुलाकात के बारे में पूछे जाने पर अब्दुल्ला ने कहा कि बैठक के बाद वे संतुष्ट थे क्योंकि खतरे की धारणा का कोई संकेत नहीं था, जिसके कारण अमरनाथ यात्रियों और घाटी से पर्यटकों को बाहर निकालने जैसे कदम उठाए जाएं।
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने राज्यपाल के आश्वासन के संदर्भ में बात की। उन्होंने कहा कि वह जम्मू कश्मीर में चुनाव चाहते हैं। वह राज्य में कोई गड़बड़ी नहीं चाहते हैं। वह संतुष्ट थे कि यह वर्ष पिछले वर्षों की तुलना में बेहतर रहा है। उमर ने कहा कि हम संतुष्ट होकर उस बैठक से बाहर आए, लेकिन मैं 24 घंटे के भीतर इस तरह के आदेश तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को निकालने की उम्मीद नहीं कर रहा था।
उमर ने कहा कि हमें पीएम की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि कोई खतरा था, जिससे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को निकालने की जरूरत पड़े। यही कारण है कि हमें अनुच्छेद 35ए और चुनावों पर पीएम से जो आश्वासन मिला वह सब अच्छा था, लेकिन फिर यह ऑर्डर सामने आया।
उन्होंने उम्मीद जताई कि केंद्र यह स्वीकार करेगा कि जम्मू कश्मीर का बेचैन, तनावग्रस्त और अशांत होना उनके हित में नहीं है। उमर ने कहा कि भारत सरकार जो कुछ भी कहती है वह यहां के लोगों में उत्पन्न हुए तनाव को निपटाने में मदद करेगा, जोकि उतना ही उनके हित में है जितना हमारे हित में है।
उन्होंने कहा कि इस राज्य और इसके लोगों से किए गए वादों को अनंत काल तक रखा जाना चाहिए। ये समयबद्ध आश्वासन नहीं थे। हमें कुछ शर्तों पर भारत के साथ विलय करने के लिए नहीं कहा गया था और फिर 70 वर्ष के बाद इन शर्तों को बदल दिया जाएगा।
उमर अब्दुल्ला ने राज्य के लोगों से शांत रहने और अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखने की अपील की और कहा कि ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जाए, जो निहित स्वार्थ वाले लोगों के उद्देश्य के साथ संरक्षित हो। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को नुकसान पहुंचाने के खिलाफ नेकां राजनीतिक और कानूनी रूप से किसी भी तरह की लड़ाई जारी रखेगी।