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थ्री इडियट्स के असली 'रैंचो' ने दुर्गम इलाकों में तैनात जवानों के लिए बनाया खास टेंट, देखिए तस्वीरें

Sat, 27 Feb 2021 07:46 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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इको-फ्रेंडली सोलर हीट टेंट - फोटो : सोशल मीडिया
मैग्सेसे अवार्ड विजेता और बॉलीवुड फिल्म थ्री-इडियट के असली रैंचो सोनम वांगचुक ने एक इको-फ्रेंडली सोलर हीट टेंट विकसित किया है। जिसका उपयोग सेना के जवान लद्दाख क्षेत्र के सियाचिन और गलवान घाटी जैसे ठंडे स्थानों में कर सकते हैं। इसके अंदर तापमान हमेशा 15 से 20 डिग्री सेल्सियस रहेगा। बाहर का तापमान अगर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक भी गिर जाएगा तब भी टेंट के अंदर कोई असर नहीं होगा। उनके द्वारा विकसित किए गए टेंट से पर्यावरण पर बुरे प्रभाव भी नहीं पड़ेंगे। इसमें सौर ऊर्जा का उपयोग होगा, जिससे पैसे की बचत भी होगी। 
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इको-फ्रेंडली सोलर हीट टेंट - फोटो : सोशल मीडिया
सोनम वांगचुक ने कहा कि सैन्य तंबू के स्लीपिंग चेंबर के अंदर का तापमान  बढ़ाया और घटाया भी जा सकता है। स्लीपिंग चेंबर में इन्सुलेशन की चार परतें हैं। बाहर का तापमान माइनस 14 डिग्री सेल्सियस होने पर भी अंदर का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस रहता है। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
वांगचुक ने कहा कि तंबू के अंदर का तापमान बहुत अधिक आरामदायक नहीं होना चाहिए। इसके पीछे उन्होंने तर्क दिया कि सैनिकों को खुले में दुश्मन से लड़ने के लिए तैयार रहना पड़ता है। जहां गलवान घाटी जैसे स्थानों में तापमान शून्य से 30 डिग्री सेल्सियस कम हो सकता है। 

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सोनम वांगचुक - फोटो : सोशल मीडिया
उन्होंने बताया कि 15 साल पहले पश्मीना बकरियों के पालन में लगे चरवाहों के लिए सोलर हीट टेंट बनाया था। सोनम वांगचुक ने जो टेंट तैयार किया है, उसमें हीटर लगा हुआ है। ये हीटर सोलर एनर्जी से गर्म होगा। एक टेंट में 10 जवान रह सकते हैं और इसका वजन 30 किलो से भी कम है।
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सोनम वांगचुक - फोटो : social media
वांगचुक ने इससे पहले भी पर्यावरण संरक्षण के लिए कई बेहतरीन काम किए हैं। ठंडे मरुस्थल और रूखे पहाड़ों के बीच बर्फ के स्तूप बनाकर लाखों लीटर पानी जमा कर लद्दाख के गांव देश दुनिया के लिए मिसाल बन चुके हैं। बीते साल इगू गांव ने बेबी ग्लेशियर बनाकर 85 लाख लीटर पानी स्टोर किया था जबकि तरछित ने 83 लाख और फ्यांग ने 63 लाख लीटर क्षमता का कृत्रिम ग्लेशियर तैयार किया था। जल संरक्षण की इस तकनीक के जनक और मैग्सेसे पुरस्कार विजेता सोनम वांगचुक की संस्था आईस स्तूप इंटरनेशनल की ओर से इन गांवों को पांच, तीन और दो लाख रुपये का पुरस्कार दिया। 



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