श्रीनगर में शंकराचार्य पहाड़ी पर बसे ऐतिहासिक शंकराचार्य मंदिर में शुक्रवार को महाशिवरात्रि के पर्व पर बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे। गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने दौरे के दौरान शंकराचार्य पहाड़ी को नमन किया। इसकी तस्वीरें उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर भी साझा की हैं।
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शंकराचार्य मंदिर से श्रीनगर शहर का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
श्रीनगर में जबरवान रेंज पर शंकराचार्य पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित शंकराचार्य मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह कश्मीर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। कश्मीरी हिंदुओं की इस मंदिर में गहरी आस्था है। उनका यह भी दृढ़ विश्वास है कि इस मंदिर में आदि शंकराचार्य ने दौरा किया था और तब से यह मंदिर उनके साथ जुड़ा हुआ है। इस तरह मंदिर और पहाड़ी का नाम शंकराचार्य पड़ा।
श्रीनगर में घूमने आए पर्यटक भी इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लोगों के लिए महान आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। इस शुभ दिन पर देश के विभिन्न स्थानों से भक्त प्रार्थना करने और भगवान शिव का आशीर्वाद लेने के लिए पहुंचे हुए हैं।
शंकराचार्य मंदिर का वातावरण बम बम भोले की गूंज, भक्ति गीतों की ध्वनि और धूप की सुगंध से महक रहा है। भक्तों ने पारंपरिक अनुष्ठान किए और पवित्र लिंगम पर पवित्र जल, दूध और फूल चढ़ाते हुए प्रार्थना की।
शंकराचार्य मंदिर के प्रभारी विधु शर्मा ने बताया कि वे सभी भोलेनाथ के भक्त हैं। यह अवसर हमें उनकी सेवा करने का अवसर प्रदान करता है। वह देश भर के सभी लोगों को महा शिवरात्रि उत्सव की शुभकामनाएं देते हैं।
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Shankaracharya Temple Srinagar
- फोटो : अमर उजाला
दिल्ली से अपने पति के साथ आईं एक श्रद्धालु रितु ठाकुर ने बताया कि वह कई बार शिवरात्रि पर शंकराचार्य मंदिर जाने की योजना बनाने के बाद विफर रहे लेकिन इस बार, वे भगवान शिव के आशीर्वाद से यहां आ पाए हैं।
जम्मू की श्रद्धालु चंडी शर्मा ने कहा कि आज महा शिवरात्रि है। वे यहां सुबह चार बजे पूजा करने आये। उन्होंने कहा कि यहां आकर उन्हें बहुत अच्छा लगता है। यहां से डल झील के किनारे बसे श्रीनगर शहर का भी नजारा देखने को मिलता है।
मंदिर घाटी तल से 300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर से पूरे श्रीनगर शहर को देख जा सकता है। मंदिर और निकटवर्ती भूमि राष्ट्रीय महत्व का स्मारक है। इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत केंद्रीय रूप से संरक्षित किया गया है। जम्मू कश्मीर के धर्मार्थ ट्रस्ट ने क्षेत्र के अन्य लोगों के साथ मिलकर 19वीं सदी से इस मंदिर का प्रबंधन करता आ रहा है।