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आतंकियों की कश्मीर को फिर रक्त रंजित करने की साजिश, सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म

Sat, 02 Jan 2021 04:38 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जम्मू
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सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म - फोटो : अमर उजाला
1990 हो, 2003 या 31 दिसबंर 2020 की शाम को सतपाल निश्चल शर्मा की हत्या...बर्बरतापूर्ण प्रहारों के निशान बार-बार एक ही सवाल पूछते हैं...आखिर हमारा कसूर क्या था? आखिर किस जुर्म की सजा मिली। यही बर्बरता और दर्द निश्चल परिवार को कचोट रहा है। निश्चल की हत्या ने नब्बे और नादिमर्ग के पुराने घावों को फिर कुरेद दिया है। मृतक के परिजनों को बुरा हाल है। रोते-रोते परिजन बार-बार एक ही सवाल कर रहे हैं कि आखिर आतंकियों ने सतपाल को क्यों मारा, उन्होंने किसी का क्या बिगाड़ा था। 
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सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म - फोटो : अमर उजाला
कश्मीर में 1989-90 में आतंकवाद चरम पर आते ही कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम शुरू हो गया। बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित जान बचाकर घाटी से पलायन कर गए। फिर भी नादिमर्ग में कश्मीरी पंडितों के दस परिवार वहीं बने रहे। समय गुजरता गया 23 मार्च, 2003 को गांव में दिन के समय आतंकी देखे गए। इसकी सूचना पुलिस को दी गई। बताया जाता है कि पुलिस मौके पर पहुंची ही नहीं थी।

 
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सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म - फोटो : अमर उजाला
इसी रात हथियारों से लैस आतंकी गांव में घुसे। इसके बाद आतंकियों ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। गांव के कश्मीरी पंडितों को कतार में खड़ा किया गया। जिसमें महिला, बच्चे और पुरुष थे। देखते ही देखते गोलियों की बौछार शुरू हो गई। हर ओर दिल दहला देने वाली चीखें थीं। थोड़ी देर बाद सन्नाटा पसर गया। हर तरफ लाशें थीं। सारा गांव श्मशान बन चुका था।
 

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सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म - फोटो : अमर उजाला
वहीं साल 1990 में आतंकियों का डेथ वारंट जारी करने वाले एक जज, वकील, कारोबारी समेत कई पंडितों को घर से निकालकर सरेआम गोली मार दी गई। किसी की आंखों के सामने भाई को मार दिया, तो किसी की बहू-बेटी की आबरू लूट ली गई। जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने पर आतंकियों ने एक नर्स को आरे से जिंदा चीर दिया। जान से मारने की धमकी के बाद घर में चावल के ड्रम में छिपे एक पंडित को गोलियों से भून दिया।
 
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सतपाल की हत्या ने हरे किए नादिमर्ग और नब्बे के जख्म - फोटो : बासित जरगर
इसके बाद आतंकियों ने उसकी पत्नी को खून से सने चावल पकाकर खिलाए। कश्मीर छोड़कर भाग जाने के लिए पंडितों के घरों के बाहर और सड़कों पर पोस्टर चस्पा कर दिए गए। 19 जनवरी, 1990 के दिन श्रीनगर में लाखों लोगों का जुलूस निकाला गया। नारे लगे- हम क्या चाहते आजादी, कश्मीरी पंडितों भाग जाओ, औरतों को छोड़ जाओ।

यह भी पढ़ेंः कश्मीरः डोमिसाइल सर्टिफिकेट बनवाने से सतपाल से खफा थे कायर आतंकी, दिख रही है बौखलाहट    

 
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