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जम्मू-कश्मीर: भारतीय सेना के श्रीनगर पहुंचने के 74 साल पूरे होने का मनाया जश्न, लड़ाकू विमानों ने दिखाया दमखम, देखिए तस्वीरें

Thu, 28 Oct 2021 11:15 AM IST
करिश्मा चिब अमृतपाल सिंह बाली, जम्मू-कश्मीर
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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर

कश्मीर के इतिहास में 27 अक्टूबर 1947 का दिन विशेष महत्व रखता है। 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा राजा हरि सिंह ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अगले दिन भारत ने कश्मीर को कबायलियों से आजाद कराने के लिए अपनी सेना उतार दी थी। हर साल 27 अक्टूबर को भारतीय सेना इन्फेंट्री डे के रूप में मनाती है। लेकिन इस बार खास बात यह रही कि मंगलवार को श्रीनगर में भारतीय वायु सेना की एयरबेस पर 1947 में पाकिस्तान के आक्रमण से जम्मू-कश्मीर को बचाने के लिए भारतीय सेना के श्रीनगर में हवाई इन्वेंशन के 75 साल पूरे होने का जश्न मनाया गया। पूरी तरह से उन दृश्यों को दोहराया गया जैसे उस समय की लैंडिंग के दौरान हुए थे। इसके अलावा स्काई डाइविंग और हेली बोर्न ऑपरेशन के साथ सुखोई-30 लड़ाकू विमानों ने हवाई दमखम दिखाया। सबसे पहले सेना की 4 पैरा स्पेशल फोर्सेज की टीम ने 9000 फीट की ऊंचाई से पैरा ड्रॉपिंग की गई। इस टीम को मेजर अभिशेख जैस्वाल लीड कर रहे थे, जबकि बाकी के सदस्य नायक गंगा, नायक मनोज नेगी, नायक सुनील, नायकसूरज छेत्री और नायक ईटी लोथा शामिल थे। इस टीम ने काफी समय तक आसमान में बिताते हुए सेफ लैंडिंग की, जिसे लोगों ने तालियों के साथ स्वागत किया। इसके बाद उस समय महाराजा हरि सिंह और ब्रिगेडियर राजिंदर सिंह के बीच की बातचीत, बारामुला में कबायलियों द्वारा सेंट जोसफ अस्पताल की नन के साथ बदसलूकी, मदबूल शेरवानी द्वारा कबायलियों को गलत रास्ता दिखाने के दृश्यों को नाटकीय तौर पर दर्शाया गया।

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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
बाद में डकोटा (डगलस डीसी-3) विंग नंबर वीपी 905 श्रीनगर एयरबेस पर लैंड किया। यह वही डकोटा था, जिसने 27 अक्टूबर, 1947 को इसी जगह पर लैंडिंग की थी। यह एक मात्र ऐसा डकोटा विमान है, जिसे भारत में 4 मई 2018 के बाद अब विंटेज कैटेगरी में संभाल के रखा गया है। बुधवार को इस डकोटा की लैंडिंग विंग कमांडर सिद्धार्थ और विंग कमांडर एके सिंह द्वारा लैंडिंग कराई गई। फिर एएन-32 में वैसे ही जवानों को लैंड कराया गया, जैसे उस समय 1 सिख के जवानों ने लैंड किया था। एएन-32 की लैंडिंग स्क्वाड्रन लीडर अभिनव नौटियाल द्वारा करवाई गई।
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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
कार्यक्रम के दौरान स्पेशल फोर्सेज के हेली-बोर्न ऑपरेशन दिखाए गए, जिसमें स्पेशल फोर्सेज की क्षमता को दर्शाया गया। इसके बाद 207 आर्मी एविएशन स्क्वाड और एडवांस लैंडिंग हेलीकाप्टर (एएलएच) द्वारा एरो हेड फार्मेशन में फ्लाई पास्ट किया। आखिर में सुखोई सू-30 लड़ाकू विमान ने फ्लाई पास्ट कर वर्टीकल चार्ली करतब दिखाया और शहीदों को श्रद्धांजलि दीी। बडगाम लैंडिंग स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य अभियान रहा है, जब भारतीय सेना को 27 अक्टूबर 1947 को बडगाम हवाई अड्डे पर भारतीय वायु सेना द्वारा शामिल किया गया था। लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय की कमान में फर्स्ट सिख ने युद्ध के पाठ्यक्रम को बदल दिया, जिसमें पाकिस्तानी सेना को बेदखल करने के लिए जम्मू कश्मीर के राज्य बलों और भारतीय सेना के लोगों और सैनिकों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी और उन्हें 5 जनवरी 1949 को युद्धविराम तक जम्मू कश्मीर के अधिकांश हिस्सों से खदेड़ दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय युद्ध के दौरान बारामुला में शहीद हुए थे।

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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
इन्हें किया गया सम्मानित
 इस मेगा इवेंट का हिस्सा बनने के लिए देशभर से आए युद्ध के दिग्गजों के परिजनों को भी सम्मानित किया गया। बता दें कि समारोह के दौरान बुधवार को सम्मानित किए गए 1 सिख के परिजनों में जमादार नंद सिंह (विक्टोरिया क्त्रसॅस, महावीर चक्त्रस् से सम्मानित) की बेटी अमरजीत कौर ढींडसा (74) जोकि पिता के देहांत होने के समय 9 महीने की थीं, लेफ्टिनेंट कर्नल डीआर राय (एमवीसी) के पोते मेजर शिवजीत सिंह शेरगिल और सीओ 12 स्क्वाड्रन विंग कमांडर केएल भाटिया (वीआरसी) के छोटे बेटे राजेश भाटिया शामिल थे।
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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
सिख बटालियन की लैंडिंग की कहानी ...
1 सिख बटालियन की ऐतिहासिक लैंडिंग और उसके बाद बडगाम की लड़ाई में उनकी भूमिका इस देश के इतिहास में अविस्मरणीय क्षण था। इससे दुश्मन की सेना का पूरे जम्मू कश्मीर पर कब्जा करने का मंसूबा कामयाब नहीं हो सका। 27 अक्टूबर 1947 को श्रीनगर के ओल्ड एयरफील्ड पर 1 सिख बटालियन का उतरना स्वतंत्र भारत में सशस्त्र बलों द्वारा किया पहला सबसे महत्त्वपूर्ण ऑपरेशन था, जिसमें थल सेना और वायु सेना दोनों ने जम्मू कश्मीर रियासत को समय पर मदद मुहैया कराकर इसे पाकिस्तानी कबायलियों की मदद से पाकिस्तान के कब्जे में लिए जाने के उसके नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया।
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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
26 अक्टूबर को कमान मुख्यालय को एक बटालियन श्रीनगर भेजने का निर्देश मिला और आंतरिक सुरक्षा ड्यूटियों में तैनात 1 सिख बटालियन को दिल्ली में पालम एयरफील्ड पर जमा होने का आदेश दिया गया। 27 अक्टूबर तक मुख्यालय 1 सिख और इसकी दो कंपनी श्रीनगर पहुंच गई। शेष ट्रूूप्स को बाद में एयरलिफ्ट करके ले जाया गया। वहां उतरते ही लेफ्टिनेंट कर्नल राय ने साहसिक निर्णय लेते हुए बारामुला में आमने सामने की लड़ाई शुरू कर दी। लेफ्टिनेंट कर्नल राय ने थोड़ा पीछे हटने का निर्णय लिया, ताकि श्रीनगर और बारामुला के बीच पट्टन इलाके पर कब्जा किया जा सके। यह सुनिश्चित करने के लिए वह अग्रवर्ती मोर्चे पर डटे रहे, ताकि उनके सभी ट्रूूप्स सुरक्षित रूप से पीछे हट सकें।
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श्रीनगर में सेना की तरफ से कार्यक्रम का आयोजन - फोटो : बासित जरगर
इसी दौरान एक स्नाइपर की बुलेट से वे जख्मी हो गए। फिर भी वे दुश्मन को आगे बढ़ने से रोकने में कामयाब रहे। 3 नवम्बर को 4 कुमाऊं की एक कंपनी मेजर सोमनाथ शर्मा की अगुवाई में बडगाम पहुंची। इस कंपनी का सामना 500 से 700 की संख्या में मौजूद दुश्मन  से हुआ जो मोर्टार से हमला कर रही थी। मुठभेड़ छह घंटे तक चली। फ्रेैक्चर की वजह से एक बांह में प्लास्टर लगे होने के बावजूद मेजर शर्मा ने दुश्मन को बड़ा नुकसान पहुंचाया। लेफ्टिनेंट कर्नल राय और मेजर सोमनाथ शर्मा के अदम्य साहस और असाधारण बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र और परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

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