दक्षिणी कश्मीर का पुलवामा जिला पिछले कुछ माह से आतंकवादी गतिविधियों के लिए सुर्खियों में है, लेकिन यहां से एक अच्छी खबर भी आई है। घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद पुलवामा के अच्छन गांव में करीब 30 वर्ष से बंद पड़े भैरो मंदिर में स्थानीय मुस्लिम समुदाय के लोगों ने पुनर्निर्माण का कार्य शुरू करने में पंडितों को सहयोग दिया है। अब इस गांव में एक बार फिर 80 साल पुराने मंदिर की घंटियां और पास में स्थित जामिया मस्जिद की अजान एक साथ सुनी जा सकेगी। यह न केवल कश्मीरियत की जिंदा मिसाल है, बल्कि उन लोगों के मुंह पर तमाचा है जो आतंकवाद को धर्म से जोड़कर लोगों में दरार डालने की कोशिश कर रहे हैं।
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pulwama terror attack
यह मंदिर लेथपोरा पुलवामा से केवल 12 किलोमीटर दूर स्थित है, जहां गत 14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ था। हमले में 40 जवान शहीद हो गए थे। श्रीनगर से करीब 42 किलोमीटर दूर पुलवामा जिले के अच्छन में 6 कनाल पर फैले इस मंदिर का पुनर्निर्माण का कार्य शुरू किया गया है। रंग रोगन, पलस्तर आदि का कार्य जारी है।
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shivling
- फोटो : shivling
मंदिर के भीतर एक शिवलिंग भी है। भूषण लाल नामक स्थानीय ने बताया कि काम खत्म होने के बाद जल्द ही मूर्तियां भी रखी जाएंगी, जिसके बाद से भजन, कीर्तन व आरती शुरू होगी। उन्होंने कहा कि एक बार फिर से 30 साल पुराना माहौल पैदा होते देखना चाहते हैं जब बाकी कश्मीरी पंडित भी यहां हवन और यज्ञ के दौरान मौजूद रहेंगे।
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कश्मीर घाटी
- फोटो : File Photo
40 से अधिक कश्मीरी पंडितों के थे परिवार
भूषण लाल ने बताया कि इस इलाके में करीब 40 से अधिक परिवार रहा करते थे। जो डर के मारे पलायन कर गए, लेकिन हम चाहते हैं कि वे वापस आएं। स्थानीय लोग भी इस जगह को काफी पूजते हैं और मंदिर की काफी मान्यता है। भूषण लाल के छोटे भाई संजय कुमार के अनुसार यहां की औकाफ कमेटी ने सब जिम्मेदारी लेते हुए मंदिर के पुनर्निर्माण में हाथ बटाया। पैसे से लेकर बाकी के कार्य का हमें कुछ भी नहीं पता यह लोग ही सब संभाल रहे हैं। जब बाहर के लोग यह देखेंगे कि अच्छन के मंदिर में ऐसे कार्य चल रहा है तो एक अच्छा संदेश जाएगा।
दोबारा लौट आए पुराने दिन
मोहम्मद यूनिस ने बताया कि हम कभी कश्मीरी पंडित और मुसलमान भाइयों की तरह रहते थे, लेकिन हालात के चलते वह यहां से चले गए। उन्होंने बताया कि हमारे गांव में यह मंदिर और जामिया मस्जिद आमने-सामने है, एक ओर से घंटियों की गूंज होती थी और दूसरी ओर अजान। लेकिन उस चीज और उन भाइयों को हम काफी याद करते हैं। इसलिए हमारी दिली ख्वाहिश है कि वह दिन दोबारा लौट आए। दोनों समुदाय वैसे ही रहें जैसे पहले रहा करते थे।