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मानवता के खिलाफ जघन्यतम अपराध, लाखों मारे गए

Mon, 14 Mar 2016 08:50 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, दिल्ली
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जब जघन्यतम अपराधों से थर्रा उठी दुनिया - फोटो : द रिचेस्ट
आदम युग से ही इंसान खुद सभ्यता का निर्माण करता रहा है और इसके साथ-साथ विनाश और तबाही का कारण भी बनता रहा है। हम आपको थोड़ा पीछे ले जाते हैं, और रूबरू कराते हैं उस स्याह सच से, जिसकी खोह में असंख्य लोगों की चीखें दबी हैं। शासकों की निजी सनक का शिकार बने लाखों लोगों की राख में तब्दील हुई लाशें दबी हैं। अकारण ही दरिंदगी का शिकार हुए लाखों लोगों की शक्ल खाक ने भले ही अख्तियार कर ली हो लेकिन काले अक्षरों में दर्ज उनका इतिहास चीख-चीखकर कहता है कि वो मानवता के खिलाफ जघन्यतम अपराध थे। वो आगाह करते हैं। उनसे सबक लिया जाना चाहिए। पेश हैं इतिहास के पन्नों से मानवता कि खिलाफ जघन्यतम अपराधों की दांस्तां।
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अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद की बलि चढ़े लाखों - फोटो : द रिचेस्ट
मानवता के खिलाफ जघन्यतम अपराधों की फेहरिस्त में शीर्ष पर वो त्रासदी ही दिखती है जो अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद की देन है। ये बड़ी विडंबना ही रही कि दुनिया को मानवाधिकार का ककहरा सिखाने वाले यूरोप ने ही दुनिया कब्जाने के दौरान सबसे ज्यादा मानवाधिकारों का हनन किया। अमेरिका पर यूरोप का वर्चस्व कायम करने के लिए इतने लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया जिनकी गिनती करना मुश्किल है। साल 1492 में जब कोलंबस ने अमेरिका को खोज लिया तो यूरोप को धन उगाही का नया जरिया नजर आने लगा, जिसकी चाह में यूरोपीय शासकों ने 20वीं सदी के अंत तक अमेरिका केज्यादातर हिस्सों को लूटा, मारकाट मचाई, जिसमें करीब 95 फीसदी बेगुनाह अमेरिकी मारे गए। मारे गए लोगों का कुल आंकड़ा 50 मिलियन से 100 मिलियन का बताया जाता है।
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जब दुनिया की एक तिहाई यहूदी आबादी खत्म हो गई - फोटो : द रिचेस्ट
साल 1933 में अडोल्फ हिटलर जर्मनी की सत्ता में आया और उसने एक नस्लवादी साम्राज्य की स्थापना की, जिसमें यहूदियों को सब-ह्यूमन करार दिया गया और उन्हें इंसानी नस्ल का हिस्सा नहीं माना गया। 1939 में जर्मनी द्वारा विश्व युद्ध भड़काने के बाद हिटलर ने यहूदियों को जड़ से मिटाने के लिए अपने अंतिम हल को अमल में लाना शुरू किया। उसके सैनिक यहूदियों को कुछ खास इलाकों में ठूंसने लगे। उनसे काम करवाने, उन्हें एक जगह इकट्ठा करने और मार डालने के लिए विशेष कैंप स्थापित किए गए, जिनमें सबसे कुख्यात था ऑस्चविट्ज। यहूदियों को इन शिविरों में लाया जाता और वहां बंद कमरों में जहरीली गैस छोड़कर उन्हें मार डाला जाता। जिन्हें काम करने के काबिल नहीं समझा जाता, उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाता, जबकि बाकी बचे यहूदियों में से ज्यादातर भूख और बीमारी से दम तोड़ देते। युद्ध के बाद सामने आए दस्तावेजों से पता चलता है कि हिटलर का मकसद दुनिया से एक-एक यहूदी को खत्म कर देना था। युद्ध के छह साल के दौरान नाजियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या कर दी, जिनमें 15 लाख बच्चे थे। यहूदियों को जड़ से मिटाने के अपने मकसद को हिटलर ने इतने प्रभावी ढंग से अंजाम दिया कि दुनिया की एक तिहाई यहूदी आबादी खत्म हो गई। यह नरसंहार संख्या, प्रबंधन और क्रियान्वयन के लिहाज से विलक्षण था। इसके तहत एक समुदाय के लोग जहां भी मिले, वे मारे जाने लगे, सिर्फ इसलिए कि वे यहूदी पैदा हुए थे। इन कारणों के चलते ही इसे अपनी तरह का नाम दिया गया-होलोकॉस्ट। सोर्स-विकिपीडिया

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नाइजीरियाई गृहयुद्ध के दौरान मारे गए 30 लाख बेगुनाह - फोटो : द रिचेस्ट
नाइजीरियाई गृहयुद्ध के दौरान मारे गए बेगुनाहों की तादात 30 लाख लोगों से ज्यादा बताई जाती है। साल 1960 में जब ब्रिटेन से आजादी मिली तब देश के तीन बड़े जातीय समूहों इग्बो, हौसा और योरुबा ने देश की सियासत में पैठ बनाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया। साल 1966 आने तक देश के ईसाई समुदाय के लोगों को मारा जाने लगा। भयंकर कत्लेआम मचाकर इग्बो जाति के लोगों ने दक्षिणी छोर के एक टुकड़ें पर आधिपत्य जमा लिया। जिसे पांच देशों ने नाइजीरिया से आजाद बियाफ्रा गणराज्य के रूप में स्वीकार भी कर लिया। लेकिन नाइजीरिया की सरकार को ये मंजूर नहीं था। सरकारी आदेश पर आक्रमण किया गया। साल 1967 में बियाफ्रा की फूड सप्लाई बंद कर दी गई। कुछ ही महीनों में पचास फीसदी इग्बो जाति के लोग भूख से मर गए। और जो बचे थे उन्हें सेना ने मार डाला। साल 1970 में बियाफ्रा ने जब सरेंडर किया तब तक 30 लाख इग्बो मारे जा चुके थे।
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कंबोडिया नरसंहार - फोटो : द रिचेस्ट
कंबोडिया में आज भी 20 हजार कब्रें मानवता के खिलाफ किए उस जघन्यतम अपराध की गवाही देती हैं जिसकी बलि करीब 25 लाख लोग चढ़ गए। इन कब्रों को किलिंग फील्ड कहा जाता है। ये कंबोडिया के खमेर रूज शासन की सनक का नतीजा है। 70 के दशक तक चले खमेर रूज के राज में बेगुनाहों की हत्याएं की गईं। मारे गए लोगों में वियतनामी, चीनी, इस्लाम, ईसाई, बौद्ध, सेना के नायक, कारोबारी, पत्रकार, छात्र, डॉक्टर और वकील समेत तमाम लोग थे। आंकड़े बताते हैं कि साल 1975 से 1979 के बीच भूख, कुपोषण और यातनाओं से मरने वालों की तादात लाखों में है।
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