राष्ट्रपति का चुनाव काफी रोचक होता जा रहा है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार, नेशनल कांफ्रेंस के मुखिया फारूक अब्दुल्ला और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बाद अब महात्मा गांधी के पौत्र और पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी ने भी विपक्ष का ऑफर ठुकरा दिया है। उन्होंने साफ कहा कि वह विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनेंगे।
एक तरफ जहां, भाजपा की अगुआई वाली एनडीए में प्रत्याशी की खोज तेज हो गई है, वहीं विपक्ष से हर बड़ा शख्स खुद की उम्मीदवारी से पीछे हटता जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले पवार, देवेगौड़ा, फारूक अब्दुल्ला और फिर गोपाल कृष्ण गांधी क्यों विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनना चाहते हैं? जिस जोरशोर से विपक्ष एकजुट होने की कोशिश कर रहा था, अचानक ऐसा क्या हो गया कि सब एक के बाद एक अपने कदम पीछे खींचने लगे हैं?
आइए समझते हैं राष्ट्रपति चुनाव के पीछे की पूरी राजनीति और यह भी जानने की कोशिश करते हैं कि आखिल गोपाल कृष्ण गांधी ने अपने कदम पीछे क्यों खींचे?
विपक्ष के नेता
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पहले जान लीजिए विपक्ष ने अब तक क्या-क्या किया?
विपक्ष को एकजुट करने के लिए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी काफी कोशिशें कर रहीं हैं। 15 जून को ही उन्होंने 22 विपक्षी दलों की एक बैठक बुलाई थी। इसमें 17 दलों के नेता शामिल हुए। दिल्ली और पंजाब की सत्ता संभाल रही आम आदमी पार्टी, तेलंगाना की टीआरएस, ओडिशा की बीजेडी, आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस जैसी पार्टियों ने खुद को इस बैठक से अलग रखा।
इसी बैठक के बाद ममता बनर्जी, शरद पवार और विपक्ष के कई नेताओं ने प्रेस को संबोधित किया था। इसमें शरद पवार ने खुद की उम्मीदवारी को नकारते हुए कहा था कि जल्द ही विपक्ष की तरफ से प्रत्याशी का एलान कर दिया जाएगा। वहीं, ममता बनर्जी ने कहा था कि अगर शरद पवार तैयार हों तो पूरा विपक्ष उन्हें समर्थन देने के लिए तैयार है। उनके मना करने की स्थिति में अन्य नामों पर विचार किया जाएगा। इसके दो दिन बाद ही फारूक अब्दुल्ला और एचडी देवेगौड़ा ने भी साफ कह दिया कि वह विपक्ष की तरफ से राष्ट्रपति के उम्मीदवार नहीं बनेंगे।
गोपाल कृष्ण गांधी, फारूक अब्दुल्ला और शरद पवार
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फारूक, पवार और गांधी ने क्या-क्या कहा?
फारूक अब्दुल्ला : 'मैं भारत के राष्ट्रपति पद के लिए संभावित संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के रूप में अपने नाम के विचार को वापस लेता हूं। मेरा मानना है कि जम्मू-कश्मीर एक महत्वपूर्ण मोड़ से गुजर रहा है और इन अनिश्चित समय में नेविगेट करने में मदद के लिए मेरे प्रयासों की आवश्यकता है।'
आगे उन्होंने कहा, 'मेरे आगे बहुत अधिक सक्रिय राजनीति है। मैं जम्मू-कश्मीर और देश की सेवा में सकारात्मक योगदान देने के लिए तत्पर हूं। मेरा नाम प्रस्तावित करने के लिए मैं ममता दीदी का आभारी हूं। मैं उन सभी वरिष्ठ नेताओं का आभारी हूं, जिन्होंने मुझे अपना समर्थन दिया।'
शरद पवार : 'मैं राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारों की दौड़ में नहीं हूं। जल्द ही विपक्ष की तरफ से संयुक्त प्रत्याशी की घोषणा कर दी जाएगी।'
गोपाल कृष्ण गांधी : 'मेरे नाम पर विचार करने के लिए विपक्षी नेताओं को धन्यवाद। विपक्ष को राष्ट्रपति उम्मीदवार के लिए राष्ट्रीय आम सहमति बनानी चाहिए। कई और भी नेता होंगे जो इसे मुझसे बेहतर करेंगे।'
राष्ट्रपति चुनाव
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फारूक, शरद और गांधी ने क्यों इंकार किया?
यूं तो इसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण ये है कि विपक्ष अभी भी एकजुट नहीं है। गोपाल कृष्ण गांधी हों या फारूक अब्दुल्ला, एचडी देवेगौड़ा या शरद पवार, हर कोई ये जानता है कि विपक्ष इस वक्त पूरी तरह से एकजुट नहीं है। ऐसे में राष्ट्रपति का चुनाव जीत पाना मुमकिन नहीं है। ऐसे में शरद पवार, फारूक अब्दुल्ला, एचडी देवेगौड़ा और गोपाल कृष्ण गांधी कोई भी नेता इन चुनाव के लिए रिस्क नहीं लेना चाहता।
दूसरा कारण ये भी है कि ये चारों भले ही सत्ताधारी भाजपा के धुर-राजनीतिक विरोधी हैं, लेकिन इनके रिश्ते भाजपा में काफी अच्छे हैं। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय कुमार सिंह कहते हैं, 'ये सभी जानते हैं कि चुनाव जीत नहीं सकते, इसलिए बेवजह भाजपा से रिश्ते खराब करना ठीक नहीं होगा।'
खबर ये भी सामने आ रही है कि विपक्ष के कुछ दलों ने फारूक अब्दुल्ला के नाम पर असहमति भी जताई है। इन दलों का मानना है कि अगर वह फारूक अब्दुल्ला का समर्थन करते हैं तो 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा इसका फायदा उठा सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि फारूक अब्दुल्ला कई बार विवादित बयान दे चुके हैं।
सोनिया गांधी, शरद पवार और ममता बनर्जी
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अब आगे क्या होगा?
विपक्ष अब समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, राजद के प्रमुख लालू यादव, केरल से सांसद एनके प्रेमचंद्रन, यशवंत सिन्हा के नाम पर विचार कर रहा है। कल यानी 21 जून को ही विपक्ष की दूसरी बैठक भी होगी। ये बैठक शरद पवार खुद बुला रहे हैं। हालांकि, इस बार ममता बनर्जी ने बैठक से दूरी बना ली है। वह अपनी जगह भतीजे अभिषेक बनर्जी को भेजेंगी। बताया जाता है कि ममता भी अब मान चुकी हैं कि वह विपक्ष को एकजुट नहीं कर पाएंगी। कई विपक्षी दल उनका नेतृत्व स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। इसलिए वह दूरी बनाने लगीं हैं।
कल होने वाली बैठक में अब विपक्ष की ओर से तैयार देश के बड़े अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, पूर्व राजनयिकों के नाम पर चर्चा होगी। कुछ राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं के नाम का भी जिक्र चल रहा है।
राष्ट्रपति चुनाव
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चुनाव का ये है पूरा कार्यक्रम
राष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव के लिए अधिसूचना 15 जून को जारी हो चुकी है। नामांकन की आखिरी तारीख 29 जून है। नामांकन पत्रों की जांच 30 जून तक होगी। उम्मीदवार अपना नामांकन दो जुलाई तक वापस ले सकेंगे। राष्ट्रपति का चुनाव 18 जुलाई को होगा, जिसके नतीजे 21 जुलाई को आएंगे। 25 जुलाई को नए राष्ट्रपति का पदभार ग्रहण समारोह होगा।
राष्ट्रपति चुनाव।
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राष्ट्रपति चुनाव में कुल कितने मतदाता?
राष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों के विधानसभा के सदस्य वोट डालते हैं। 245 सदस्यों वाली राज्यसभा में से 233 सांसद ही वोट डाल सकते हैं, लेकिन कश्मीर में विधानसभा भंग है। यहां चार राज्यसभा सीटें खाली हैं। ऐसे में 229 राज्यसभा सांसद ही राष्ट्रपति चुनाव में वोट डाल सकेंगे।
राष्ट्रपति की ओर से मानित 12 सांसदों को भी इस चुनाव में वोट डालने का अधिकार नहीं है। दूसरी ओर, लोकसभा के सभी 543 सदस्य वोटिंग में हिस्सा लेंगे। इनमें आजमगढ़, रामपुर और संगरूर में हो रहे उपचुनाव में जीतने वाले सांसद भी शामिल होंगे। इसके अलावा सभी राज्यों के कुल 4033 विधायक भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए वोट डालेंगे। इस तरह से राष्ट्रपति चुनाव में कुल मतदाताओं की संख्या 4809 होगी। हालांकि, इनके वोटों की वैल्यू अलग-अलग होगी। इन मतदाताओं के वोटों की कुल कीमत 10 लाख 79 हजार 206 होगी।