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National Doctors Day 2020: समर्पण को सलाम, शादी के मंडप से अस्पताल तक

Wed, 01 Jul 2020 07:23 AM IST
संजीव कुमार झा परीक्षित निर्भय, अमर उजाला , नई दिल्ली
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डॉ. राहुल चौधरी (असिस्टेंट प्रोफेसर आरएमएल अस्पताल) - फोटो : amar ujala
जनवरी अंत में आरएमएल अस्पताल जॉइन करने के बाद 12 मार्च को मेरी शादी थी। मैंने शादी के बाद अंडमान निकोबार घूमने का प्लान बनाया था। लेकिन जब मैं सात फेरे ले रहा था, तभी मेरे दोस्तों ने बताया कि छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं। सभी को अस्पताल बुलाया है। इमरजेंसी है।

जब भी सोचता हूं तो मेरी कहानी फिल्मी लगती है, लेकिन हकीकत यही है कि मैंने घर वालों को समझाया और दिल्ली निकल गया। अब तक मैं 29 कोरोना संक्रमित महिलाओं की प्रसूति करा चुका हूं। मां का दूध लेने के बाद दूसरे वार्ड में भर्ती बच्चे तक उसे पहुंचाने और दूध पिलाने का आइडिया मैंने ही सबसे पहले आरएमएल में शुरू किया था, जिसके बाद दिशा-निर्देशों में बदलाव किया गया:-डॉ. राहुल चौधरी असिस्टेंट प्रोफेसर आरएमएल अस्पताल

(राजस्थान के सीकर निवासी। महाराष्ट्र के सोलापुर स्थित डॉ. वीएम शासकीय मेडिकल कॉलेज से चिकित्सकीय शिक्षा लेने के बाद दिल्ली के हिंदूराव मेडिकल कॉलेज से पीजी किया और कुछ दिन पहले ही आरएमएल में तैनात हुए। )
 
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अंकिता सिंह तोमर (पीजी स्टूडेंट हिंदूराव मेडिकल कॉलेज, दिल्ली) - फोटो : amar ujala
कोरोना के चलते 12-12 घंटे पीपीई किट पहननी पड़ रही है। भीषण गर्मी के कारण कई बार बेहोश हो चुकी हूं, लेकिन मेरे हौसले बुलंद हैं। दिल्ली में सबसे ज्यादा एनेस्थीसिया डॉक्टर संक्रमित हुए हैं।  एक की मौत भी हो चुकी है। इसके बावजूद मैं गंभीर मरीजों की सेवा कर रही हूं। कोरोना काल में ही मेरे भाई की मौत हुई, लेकिन मरीजों में ही उसको देख याद कर लेती हूं:-अंकिता सिंह तोमर पीजी स्टूडेंट हिंदूराव मेडिकल कॉलेज, दिल्ली

(उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर निवासी। सिद्धार्थ मेडिकल कॉलेज, विजयवाड़ा से एमबीबीएस। एनेस्थीसिया एंड क्रिटिकल केयर मरीजों की सेवा में जुटी हुई हैं।)
 
  • आगे की स्लाइड में पढ़िएःमरीजों में मां को देखती हूं...
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डॉ. ज्योतिका मल्होत्रा (जूनियर रेजीडेंट, आरएमएल अस्पताल, नई दिल्ली ) - फोटो : amar ujala
हम लोग 15 दिन कोविड वार्ड में ड्यूटी देने के बाद वापस 15 दिन के लिए एक होटल में क्वारंटीन रहती हैं। मंगलवार को जब मैं 15 दिन बाद कोविड वार्ड से बाहर आई तो मां को फोन किया। मां को देखते ही आंखों में आंसू छलक उठे। मैं बार-बार बस यही कह रही थी, “मरीजों में आपको देख लेती हूं मां, मेरी यहां बहुत जरूरत है। यहां इन लोगों का मेरे जैसों के अलावा दूसरा कोई नहीं है।

आप चिंता न करो, मैं वापस जरूर आऊंगी।” इतना सुनते ही उधर से रोती मां के चेहरे पर मुस्कान आ गई और उन्होंने कहा, “शाबाश, बेटा! तू बस ऐसे ही सेवा करती रह। जब तू आएगी तो मैं तेरी पंसदीदा  खीर बनाकर दूंगी:-डॉ. ज्योतिका मल्होत्रा ,जूनियर रेजीडेंट, आरएमएल अस्पताल, नई दिल्ली 

(गाजियाबाद मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करने के बाद दिल्ली के रोहिणी निवासी डॉ. ज्योतिका यहां मरीजों की सेवा में जुटी हुई हैं।)
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