बोफोर्स तोप से लेकर धुनष तोप तक की कहानी काफी दिलचस्प है। इस पड़ाव तक आते-आते भारतीय सेना का तोपखाना इतिहास के सबसे खराब दौरे में पहुंच चुका है। अब इसमें धीरे-धीरे जान आ रही है। रक्षा मंत्रालय और भारतीय सेना दोनों तोपखाने की अहमियत को समझते हुए इसे धार देने में लगे हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल सैन्य बलों के आधुनिकीकरण के साथ-साथ देशी रक्षा तकनीक को भी काफी अहमियत दे रहे हैं।
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80 के दशक से जूझ रही है सेना की आर्टिलरी यूनिट
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होवित्जर तोप
- फोटो : pti
भारतीय सेना को 155 एमएम की 400 होवित्जर तोप देने के लिए 24 मार्च 1986 को भारत सरकार ने स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स से सौदा किया था। 1,437 करोड़ रुपये के इस सौदे में यह शर्त भी थी कि एबी बोफोर्स तकनीक का हस्तांतरण करेगी और भारतीय रक्षा कंपनियां देश में बोफोर्स तोप बनाने में सक्षम होगी।
लेकिन एबी बोफोर्स पर यह सौदा हथियाने के लिए 80 लाख डालर की दलाली चुकाने का भी आरोप लगा। यह देश का दुर्भाग्य रहा कि 1986 के बाद से करीब तीन दशक तक भारतीय सेना को कोई दूसरी तोप नहीं मिल पाई। कोई नया तोप सोदा सिरे नहीं चढ़ पाया। जबकि इस दौरान कई बार सेल्फ प्रोपेल्ड, टोड समेत 155 एमएम और 52 कैलिबर की निविदाएं निकली, ट्रायल हुए और सौदा पूरा होने के पहले भारत सरकार ने तोप सौदे की प्रक्रिया को रद्द कर दिया।
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बाई एंड मेक प्रोग्राम भी नहीं चढ़ पाया सिरे
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बोफोर्स तोप
- फोटो : अमर उजाला
कारगिल संघर्ष में भारतीय सेना को बोफोर्स तोप ने उम्दा सफलता दिलाई। मेजर जनरल(रिटा.) लखविंदर सिंह बताते हैं कि तब वह ब्रिगेड कमांड कर रहे थे। उनके ही निर्देशन में अर्ध चंद्राकार में तैनात कई बोफोर्स तोपों से गुलेल की तरह दुश्मन के ठिकाने पर गोले दागकर सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों, घुसपैठियों के दांत खट्टे कर दिए थे।
लेकिन कारगिल के बाद बनी कारगिल समीक्षा समिति ने भारतीय तोपखाने की गिरती क्षमता को संज्ञान लिया। भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय ने 2002-03 में बाई एंड मेक प्रोग्राम के तहत 400ऋ1100(तकनीकी हस्तांतरण) 155 एमएम की तोपें लेने के लिए अंतरराष्ट्रीय कंपनियों से आवेदन मांगे।
2007 में दोबारा रीक्वेस्ट फॉर प्रपोजल मंगाए गए। तीसरी बार फिर 2011 में यही प्रक्रिया दोहराई गई। तीसरी बार के प्रपोजल में बीएई ने भाग नहीं लिया और औईएम(नेक्सटर) एलबिट ने हिस्सा लिया। 2015 में संपन्न हुए ट्रायल में दोनों ही गन फेल कर गई। इसके बाद ट्रायल और रीट्रायल हुए। 2018 में निविदा खुलने के बाद एलबिट की सोल्टम एल1 आ गई, लेकिन अभी तक यह सौदा किसी अंजाम तक नहीं पहुंचा है।
भारत सरकार ने लिया बोफोर्स तोप बनाने का निर्णय
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Rajnath Singh
- फोटो : ANI
रक्षा मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि कोई भी तोपसौदा अमल में न आने के कारण सेना के तोपखाने की दशा दिन प्रतिदिन चुनौतीपूर्ण बन रही थी। उधर 80 के दशक में बोफोर्स तोप सौदे पर लगे दलाली के आरोप 2007-08 तक केन्द्र सरकार को झुलसा रहे थे।
नतीजन एबी बोफोर्स से 80 के दशक में सौदे के साथ मिली तकनीकी के जरिए और कुछ तकनीकी विकास को जोड़कर आर्डिनेंस फैक्टी बोर्ड ने 400 तोप तैयार करने का निर्णय लिया। अब ये धनुष तोप सेना में शामिल होना शुरू हो गई है। नये पैरामीटर में यह बोफोर्स से भी ज्यादा कारगर है।
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मेक इन इंडिया: आया डीआरडीओ, बनाई 155एमएम, 52 कैलीबर की नई तोप
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Make in India
रक्षा मंत्रालय और डीआरडीओ के सूत्र बताते हैं कि 2012 में डीआरडीओ ने भी सेना की जरूरतों के लिए कमर कसी। डीआरडीओ ने रिकार्ड 18 महीने के भीतर एडवांस टोड आर्टिलरी गन सिस्टम तैयार किया। डीआरडीओ के सूत्रों का दावा है कि यह तोप किसी भी अंतरराष्ट्रीय तोप के मुकाबले कहीं बेहतर है।
इसका आर्क ऑफ फायर न्यूनतम -5 और अधिकतम 75 डिग्री, आर्क ऑफ ट्रेवर्स 60 डिग्री और मार करने की क्षमता करीब 35 किमी(बीटी), 45 किमी(बीबी) तक है। जबकि अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की तोपें इसकी तुलना में काफी पीछे है। यहां तक कि निशाने पर मार करने के मामले में भी अच्छे नतीजे आ रहे हैं।
अभी के तोप सौदे में एक भी नहीं है देशी तकनीक की मेक इन इंडिया
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पैसिफिक मॉल के बाहर लगाई गई बोफोर्स तोप
- फोटो : अमर उजाला
400 वज्रा के-9 गन लार्सन एंड टुब्रो(कोरियन), 400 धनुष(आडिनेंस फैक्ट्री बोर्ड) तैयार कर रही है। 1500 इस्राइली गन के लिए अभी तक स्थिति साफ नहीं हो पाई है। यह सभी तोपें विदेशी तकनीक की और विदेशी कंपनियों की हैं। इन्हें भारतीय कंपनियों के साथ तैयार किया जा रहा है।
जबकि डीआरडीओ ने स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल करके, देशी कंपनियों के सहारे नई गन विकसित की है। डीआरडीओ के अधिकारी बताते हैं कि यह तोपें सेना के सभी पैरामीटर पर खरी उतरी हैं। इनमें सेना के उठाए गए मुद्दों का समाधान कर लिया गया है।
इसके लिए डीआरडीओ ने टाटा डिफेंस और भारत फोर्ज को भी साझीदार बनाया है, लेकिन डीआरडीओ के अधिकारियों को केन्द्र सरकार की स्वदेशी तकनीक और रक्षा क्षेत्र को बढावा देने की योजना दिखावा भर लग रही है।