जीवन कटना था कट गया,
अच्छा कटा, बुरा कटा,
यह तुम जानो,
मैं तो यह समझता हूं,
कर्जा जो मिट्टी का पटना था पट गया।
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने से,
तुमको लग जाएँगी सदियाँ हमें भुलाने में।
मशहूर कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज का लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। वह 93 वर्ष के थे।
विज्ञापन
2 of 9
gopal-das neeraj
नीरज के निधन के बाद उनकी अनगिनत ,किस्से, कहानियां, गीत, लोकगीत पर चर्चा हो रही है। जीवन में नीरज ने बहुत कष्ट सहा। पेट पालने के लिए और जीवन को अनवरत चलाने के लिए इस गीतकार ने गंगा में गोता में भी गोता लगाया। न, न उन्होंने यह गोता किसी रोमांच के लिए नहीं लगाया बल्कि पेट पालने के लिए लगाया।
जिंदगी में कितनी भी परेशानियां आईं उनकी लेखनी और प्रगाढ होती गई। लेकिन वह कभी निराश नहीं हुए। और अनवरत बिंदास लिखते रहे। क्या नहीं लिखा नीरज ने, गीत, लोकगीत, दार्शनिक गीत, फिल्मी गीत, भक्तिगीत, प्रेमगीत, दोहा, गजल, हाइकू, छंद से कविता यहां तक कि ज्योतिष पर भी कविता लिखी। उन्होंने बताया कि ज्योतिष पर उन्होंने तीन किताबें लिखी हैं- नीरज ज्योतिष दोहावली, शुकनाड़ी, ज्योतिष दोहावली वह भी तीन खंडों में।
विज्ञापन
3 of 9
कवि गोपालदास 'नीरज', कवि हरिओम पंवार
- फोटो : अमर उजाला
हाईस्कूल प्रथम श्रेणी में पास करने वाले नीरज
इटावा जिले के पुरावली गांव में बाबू ब्रजकिशोर सक्सेना के घर गोपालदास नीरज का जन्म चार जनवरी 1925 को हुआ। जब वह महज 6 साल के थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया।
बचपन में ही उनके सिर पर घर की जिम्मेदारियां आ गई थीं। घर का चूल्हा जलाने के लिए बचपन में ही काम शुरू कर दिया। बावजूद इसके 1942 में हाई स्कूल की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की।
4 of 9
अमर उजाला के मंच पर कवि गोपाल दास नीरज (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
पढ़ते रहे और नौकरी करते रहे दिल टूटा और कविताएं फूटी
नीरज के उपर घर की जिम्मेदारियां थीं तो उन्होंने पढ़ाई के साथ ही नौकरी शुरू कर दी। उन्होंने इटावा की कचहरी में टाइपिस्ट की नौकरी शुरू की। एक सिनेमाघर में काम किया। फिर दिल्ली के सफाई विभाग में टाइपिस्ट का काम किया।
लेकिन वहां नौकरी ज्यादा नहीं चल सकी और उन्होंने नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में काम किया। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कंपनी में 5 साल तक टाइपिस्ट का काम किया। कविताएं भी लिखीं।
विज्ञापन
5 of 9
फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
मेरठ में अध्यापन के दौरान क्लास न लेने के आरोप लगे तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया
हिंदी से एमए करने के बाद उन्हें मेरठ कॉलेज में पढ़ाने का मौका मिला। यहां कॉलेज प्रशासन ने इन पर कक्षा नहीं लेने के आरोप लगाए। इससे नाराज होकर उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद वे अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक पद पर नियुक्त हुए। फिर यहां से वे मुंबई चले गए।
विज्ञापन
6 of 9
gopal das neeraj
बॉलीवुड ने गीत लिखने के लिए बुलाया, 3 साल लगातार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला
उन्हें मुंबई फिल्म जगत से सीधेे 'नई उमर की नई फसल' के गीत लिखने के लिए बुलाया गया। पहली ही फिल्म में उनके लिखे कुछ गीत जैसे 'कारवां गुजर गया खूब लोकप्रिय हुआ। ये सिलसिला मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी जैसी अनेक फिल्मों में जारी रहा। तीन साल लगातार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।
विज्ञापन
7 of 9
गोपाल दास नीरज
फिल्म फेयर पुरस्कार
नीरज सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए तीन बार फिल्म पुरस्कार दिया गया।
1970 : काल का पहिया घूमे रे भइया। (फिल्म: चन्दा और बिजली)
1971: बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं (फिल्म: पहचान)
1972: ए भाई जरा देख के चलो (फिल्म: मेरा नाम जोकर)
यूपी की सपा सरकार ने नीरज को भाषा संस्थान का अध्यक्ष बनाकर मंत्री का दर्जा दिया था। नीरज की कविताओं के अनुवाद गुजराती, मराठी, बंगाली, पंजाबी, रूसी समेत 10 से ज्यादा भाषाओं में हुए हैं।
8 of 9
Gopaldas Neeraj
फिल्मों में टॉप- 6 गीत
फूलों के रंग से, दिल की कलम से, तुझको लिखे रोज पाती। (फिल्म: प्रेम पुजारी)
शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलाई, थोड़ी सी शराब। (फिल्म: प्रेम पुजारी)
रंगीला रे, तेरे रंग में यूं रंगा है मेरा मन, छलिया रे न बुझे है। (फिल्म: प्रेम पुजारी)
लिखे जो खत तुझे, वो तेरी याद में, हजारों रंग के नजारे बन गए। (फिल्म:कन्यादान )
खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को। (फिल्म: शर्मीली)
आज मदहोश हुआ जाए रे मेरा मन। (फिल्म:शर्मीली)
अमर उजाला शब्द सम्मान का पोस्टर जारी करते पद्मभूषण गोपाल दास नीरज
नीरज के प्रमुख कविता संग्रह
संघर्ष 1944
अन्तर्ध्वनि 1946
विभावरी 1948
प्राणगीत 1951
दर्द दिया है 1956
बादर बरस गयो 1957
मुक्तकी 1958
दो गीत 1958
नीरज की पाती 1958
गीत भी अगीत भी 1959
आसावरी 1963
नदी किनारे 1963
लहर पुकारे 1963
कारवां गुजर गया 1964
फिर दीप जलेगा 1970
विश्व उर्दू परिषद् पुरस्कार
पद्म श्री- 1991
यश भारती - 1994
पद्म भूषण सम्मान 2007