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हथियारों की नकल करने में माहिर है चीन, अमेरिका के इन घातक हथियारों की बनाई कार्बन कॉपी

Tue, 15 Oct 2019 06:30 PM IST
Harendra Chaudhary हरेंद्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
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टैंक में सवार चीनी सैनिक - फोटो : सोशल मीडिया
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चीन की योजना है कि 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति वाला देश बन जाए। इसके लिए उसने अभी से ही तैयारियां शुरू कर दी हैं। चीन ने रिवर्स इंजीनियरिंग की मदद से महाशक्तिशाली देशों की रीढ़ समझे जाने वाले हथियारों के क्लोन भी बना दिए हैं। हाल ही में चीन ने एक ऐसे अमेरिकी हेलिकॉप्टर का चीनी संस्करण बना लिया, जो बेहद खास है।

ब्लैक हॉक नाम के इस हेलकॉप्टर को अमेरिका ने अल-कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को मारने में इस्तेमाल किया था। इसकी खासियत है कि यह रडार की पकड़ में न आने वाला स्टेल्थ हेलीकॉप्टर है। चीन ने इसी UH-60 ब्लैक हॉक को कॉपी कर लिया है। हार्बिन Z-20 नाम से चीन ने इसका क्लोन तैयार किया है, जो न केवल एडवांस टेक्नोलॉजी से लैस है बल्कि अमेरिकी ब्लैक हॉक से ज्यादा शक्तिशाली भी है। आइए जानते हैं अब तक किन घातक हथियारों की चीन कर चुका है नकल...
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अमेरिकन सी-17 ग्लोबमास्टर

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C-17 Globemaster
2011 में ऑरेंज काउंटी से एक एरोस्पेस इंजीनियर डोंगफैन ग्रेग चुंग को चीन के लिए गुप्तचरी करने के आरोप में 24 साल पांच महीने कैद की सजा सुनाई थी। चुंग पर आरोप था कि उसने बोइंग और रॉकवेल के ढाई लाख से ज्यादा दस्तावेजों को चुराकर चीन को भेजा था। इनमें बोइंग के भारी मालवाहक जहाज सी-17 ग्लोबमास्टर-3 के डिजाइंस भी शामिल थे। उसी साल खबरें आई थीं कि चीन की एयरक्राफ्ट इंडस्ट्रियल कॉरपोरेशन ने सी-17 से मिलता-जुलता भारी मालवाहक जहाज Y-20 का निर्माण शुरू कर दिया है। इस एयरक्राफ्ट को बनाने में चीन को काफी मेहनत भी करनी पड़ी।



चीन के पास अभी कर भारी मालवाहक जहाज बनाने की क्षमता ही नहीं थी और उसे काफी दिक्कतें आ रही थीं। चीनी वाई-20 की खासियत है कि 200 टन तक का वजन उठा सकता है और एक बार में 15 हजार किमी की दूरी तय कर सकता है। वहीं यह जहाजों में उड़ान के दौरान ईंधन भरने के साथ सैन्य साजो सामान को ढोने की क्षमता रखता है।
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अमेरिकी F-35 और F-22

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Lockheed Martin F-22A Raptor - फोटो : Twitter
अमेरिका की एफ-16 लड़ाकू जहाज बना वाली कंपनी लॉकहीड मार्टिन ने F-22A रैप्टर फाइटर बनाया था, जिसकी गिनती दुनिया के अत्याधुनिक लड़ाकू जहाजों में होती है। जुलाई 2014 के आखिर में चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन चेंगदू जे-20 लड़ाकू विमान का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। इस जहाज की डिजाइनिंग एफ-22 रैप्टर और अमेरिकी नेवी में इस्तेमाल होने वाले एफ-35 स्टाइक फाइटर प्लेन से मिलती-जुलती है।


 
इस जहाज का पहला प्रोटोटाइप 2011 में बनाया गया था, जिसके बाद से उसमें एयर इनटेक, विंग साइज और नोज डिजाइन समेत कई तरह के बदलाव किए गए। अमेरिका का मानना है कि चीनी हैकरों ने अमेरिकी मिलिट्री और डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर्स पर साइबर अटैक करके इसकी जानकारियां हासिल की। वहीं जुलाई 2014 में अमेरिका ने एक चीनी बिजनेसमैन को पकड़ा था, जिसने बहुत से डिफेंस प्रोग्राम का डाटा चुरा कर चीन को भेजा था, जिसमें ए-35 और एफ-22 का डाटा भी शामिल था।

MQ-1 प्रीडेटर ड्रोन

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MQ-1 Predator Drone - फोटो : Social Media
अमेरिका ने लगभग 25 साल पहले 1994 में इस प्रकार के ड्रोन को विकसित करने का प्रोग्राम शुरू किया था। 2011 में इसकी लागत 238 करोड़ डॉलर करोड़ डॉलर तक पहुंच चुकी थी। इस ड्रोन को अमेरिकी कंपनी जनरल एटोमिक्स ने तैयार किया था और इसे अमेरिकन रिमोट पायलेटेड एयरक्राफ्ट भी कहा जाता है। वहीं अब इसका एडवांस वर्जन MQ-9 आ चुका है जिसे अमेरिकी सेना में पिछले साल ही शामिल किया गया था।


 
वहीं चाइना एरोस्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी कारपोरेशन के तहत आने वाली चाइना अकादमी ऑफ एरोस्पेस एरोडायनेमिक्स कंपनी ने काय होंग-4 (CH-4) या रैनबो-4 ड्रोन बनाया है, जो अमेरिकी MQ-1 प्रीडेटर की कापी है। चीनी मीडिया का दावा है कि CH-4 ड्रोन हर मामले में बेहतर है और मल्टीपर्पज है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के एयरफोर्स प्रवक्ता शेन जिंके का दावा है कि CH-4 को निगरानी, पैमाइश और जमीनी हमलों के लिए तैयार किया गया है। वहीं आतंक के खिलाफ इसकी अहम भूमिका है। यह चीनी ड्रोन 760 पाउंड का वजन ढो सकता है और 38 घंटों तक काम कर सकता है और 3218 किमी तक की दूरी तय कर सकता है।
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FGM-48 जैवलिन एंटी टैंक मिसाइल

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FGM-148 Javelin - फोटो : Social Media
2014 में चीन ने खुलासा किया था कि उसने HJ-12 एंटी टैंक मिसाइल का निर्माण कर लिया है, जो 3.2 किमी दूर से ही टैंक को निशाना बना सकती है। चीनी के अखबार चाइना डेली ने दावा किया था कि यह मिसाइल मौजूदा पीढ़ी की टैंकों जिनमें अमेरिका का एम1 अब्राहम, रूस का टी-90, जापान का टाइप 90 क्यू मारू शामिल है। इसे चीन की कंपनी NORINCO ने बनाया है।


 
यह सिस्टम हूबहू अमेरिका के FGM-48 जैवलिन एंटी टैंक मिसाइल सिस्टम की कापी है, जिसे अमेरिकी सेना इस्तेमाल करती है। चीन की इस कंपनी ने इस सिट्म को दक्षिण सूडान को भी बेचा है, ताकि वहां और तेजी से गृह युद्ध भड़क सके। चीनी मिसाइल सिस्टम का कार्यप्रणाली और डिजाइन हूबहू अमेरिकी सिस्टम जैसी है।
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द हमवी

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Humvee - फोटो : Social Media
1980 के आखिर में खबरें आई थीं कि अमेरिका के इंडियाना की कंपनी एएम जनरल अपने हाई मोबिलिटी मल्टीपर्पज व्हील्ड व्हीकल, द हमवी को चीन की सेना को बेचना चाहती है। लेकिन चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने इसे खरीदने से इंकार कर दिया। लेकिन एएम जनरल ने चीन छोड़ने से पहले एक हमवी वहीं छोड़ दी।
 
1991 खाड़ी युद्ध के दौरान जब चीन ने रेगिस्तानी इलाकों में हमवी का प्रदर्शन का देखा तो उन्हें इसकी जरूरत महसूस हुई और चीनी तेल कंपनियों की नागरिक इस्तेमाल के लिए खरीदी गईं कुछ हमवी और चीन में छोड़ी गई हमवी को रिवर्स इंजीनियरिंग की मदद से चीन ने इसका एक प्रोटोटाइप डोंगफेंग EQ2050 तैयार किया।


 
लेकिन चीन के लिए असल समस्या इंजन थी, जिसका लाइसेंस अमेरिकी कंपनी क्यूमिंस के पास था। 1989 में अमेरिका ने चीन पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिये, जिसके चलते इंजन का आयात नहीं हो पाया। उस दौरान अमेरिका की शर्त थी कि सैन्य सामान चीन को नहीं भेजा जाएगा, लेकिन नागरिक सामानों पर कोई पाबंदी नहीं है। इसी शर्त को देखते हुए चीन की सेना ने क्यूमिंस ने EQ2050 का नागरिक वर्जन तैयार किया और क्यूमिंस ने उन्हें इंजन भेजने शुरू किये। आज EQ2050 को चीन की सेना और पुलिस दोनों इस्तेमाल करते हैं।
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एक्टिव डेनियल सिस्टम

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Active Denial System - फोटो : Social Media
अमेरिका ने माइक्रोवेव टेक्नोलॉजी की मदद से खास सिस्टम तैयार किया था, जिससे भीड़ को कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ साल पहले चीन की सेना ने एक प्रदर्ईशनी के दौरान एक हथियार का प्रदर्शन किया, जिसे ट्रक से जोड़ा जा सकता है। WB-1 मिलीमीटर वेव बीम को चीन के पॉली ग्रुप कॉर्पोरेशन ने बनाया है, जो माइक्रोवेव फ्रीक्वेंसी पर बीम फैंकता है। ये बीम्स पानी के अणुओं की तरह काम करती हैं और स्किन के निचले हिस्से पर लगने पर दर्द और जलन का अहसास होता है।


 
चीन का यह हथियार सिस्टम अमेरिका का एक्टिव डेनियल सिस्टम (Ads) की कापी है, जिसे अमेरिकी डिफेंस कॉन्ट्रैक्टर रेथिऑन ने बनाया था। अमेरिका ने इस सिस्टम को 2010 में अफगानिस्तान में भी तैनात किया था, लेकिन इस्तेमाल नहीं कर पाया। चीनी मीडिया के मुताबिक इसकी रेंज 80 मीटर है जिसे एक किमी तक बढ़ाया जा सकता है। दंगों पर नियंत्रण पाने के लिए इसका इस्तेमाल होता है।

X-47B ड्रोन

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X-47B Drone - फोटो : Social Media
चीन की कंपनी स्टार यूएवी सिस्टम ने स्टार शेडो के नाम से एक ड्रोन डेवलप किया है, जो अमेरिका के मौजूदा X-47B का क्लोन है। चीन ने पहले इस ड्रोन के फोटो और डिजाइन हासिल किया और बाद में ईरान में एक दुर्घटनाग्रस्त ड्रोन को हिसाल करके इसकी टेक्नोलॉजी भी बना ली।


 
वहीं अमेरिका में मौजूद एक चीनी जासूस ने इस ड्रोन की स्टील्थ टेक्नोलॉजी और दस्तावजों को चीन को बेच दिया। माना जाता है इस ड्रोन का बाकी पेचीदगियां चीन ने साइबर अटैक के जरिये हासिल कीं।

अमेरिकी ब्लैक हॉक

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UH-60 Black Hawk Helicopter - फोटो : Wikipedia
चीन ने अमेरिकी के प्रसिद्ध सीकोरस्काई यूएच-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर का क्लोन तैयार किया है। चीनी ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर का नाम हार्बिन Z-20 है और चीनी सेना को सौंप दिया गया है। इस हेलीकॉप्टर को दुनिया का सबसे बेहतरीन मीडियम लिफ्ट यूटिलिटी कॉप्टर बताया जा रहा है। ट्विन इंजन वाले Z-20 हेलीकॉप्टर को एविएशन इंडस्ट्री कॉर्प ऑफ चाइना ने बनाया है। इसकी खासियत है कि मुश्किल मौसमी हालातों में भी उड़ सकता है।


 
चीन का दावा है कि इस हेलीकॉप्टर के हर पुर्जे को चीन में ही बनाया गया है। Z-20 के इंजन इतने पावरफुल हैं कि कम-ऑक्सीजन वाले इलाके में भी उड़ान भरने में सक्षम है। इसमें एक्टिव वाइब्रेशन कंट्रोल, फ्लाई-बाई-वायर, लो नॉयज रोटर डिजाइन जैसे फीचर भी दिए गए हैं। माना जा रहा है कि पाकिस्तान ने ही चीन को इस हेलीकॉप्टर का एक्सेस दिया था। 2011 में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज ने जब अल-कायदा लीडर ओसामा बिन लादेन का मारने के लिए रेड की थी, तब उनका एक सीकोरस्काई यूएच-60 ब्लैक हॉक हेलीकॉप्टर क्रेश हो गया था।

अमेरिकी लैंडिंग क्राफ्ट एयर कुशन

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LCAC - फोटो : Wikipedia
अमेरिकी नौसेेना परिवहन के लिए लैंडिंग क्राफ्ट एयर कुशन पर बहुत निर्भर करती है। इसे अमेरिकी नेवी का होवरक्राफ्ट भी कहा जाता है। वहीं चीन ने इस होवरक्राफ्ट की नकल करके Type 726A के नाम से अपना होवरक्राफ्ट तैयार किया है। इस होवरक्राफ्ट से गोलियों से लेकर टैंक तक ट्रांसपोर्ट किये जा सकते हैं।


 
चीनी मीडिया के मुताबिक यह होवरक्राफ्ट 60 टन तक का वजन ढो सकते हैं। चीन ने इस होवरक्राफ्ट का सीरीयल प्रोड़क्शन भी शुरू कर दिया है। इसे चीन के शंघाई स्थित एक शिपयार्ड में बनाया जा रहा है। इसकी खासियत यह है कि यह जमीन और पानी दोनों जगह चल सकता है।

सुखोई एसयू-27

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Sukhoi Su-27 - फोटो : Wikipedia
हालांकि अमेरिकी ट्रेडवॉर के चलते चीन और रूस एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं। बावजूद इसके रूस अपने कई हथियारों की टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण चीन को नहीं करता है। हाल ही में भारत और चीन ने रूस से एस-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदा है, लेकिन रूस ने भारत के साथ टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर हस्ताक्षर किए हैं, जबकि चीन के साथ ऐसा नहीं किया है।


 
सोवियत संघ के विघटन के बाद नकदी संकट से जूझ रहे रूस ने रूसी वायुसेना के गौरव के नाम से मशहूर दो दर्जन से ज्यादा सुखोई-27 लड़ाकू जहाज चीन को बेचे थे। चीन ने रूस से मोलभाव करके 200 और जहाज बनाने का लाइसेंस हासिल कर लिया। लेकिन 100 जहाज बनाने के बाद 2004 में समझौते को तोड़ दिया। जिसके बाद चीन ने शेनयांग J-11B के नाम से अपना लड़ाकू जहाज बनाया, जो दिखने में एस-27 जैसा था। वहीं चीन ने SU-33 तर्ज पर शेनयांग J-15 फ्लाइंग शार्क भी बना लिया है।
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