पहले कार्यकाल में राष्ट्रपति का वेतन 10,000 रुपये हुआ करता था। राजेंद्र प्रसाद महज 5,000 रुपये ही बतौर वेतन लेते थे। अपने कार्यकाल के अंत में तो वे केवल 2,500 रुपये ही लेने लगे थे। वे, इतने सादगी पसंद थे कि अपने सारे काम स्वयं करते थे। अपने लिए, उन्होंने केवल एक सहायक रखा था। वे किसी तरह के तोहफे कुबूल नहीं करते थे।
26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने जा रहा था, तैयारियां अपने शबाब पर थीं और इससे एक दिन पहले, मां समान उनकी बड़ी बहन भगवती देवी का निधन हो गया। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भारतीय गणराज्य की स्थापना की रस्म पूरी की और फिर बहन के अंतिम संस्कार में शामिल हुए।
राजेंद्र बाबू मानते थे कि धर्मनिरपेक्षता का असली अर्थ, सभी धर्मों के प्रति बराबर और सार्वजनिक सम्मान प्रदर्शित करना है। सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, लेकिन नास्तिक नहीं। दरअसल, नेहरू नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद मंदिर के उद्घाटन समारोह में जाएं।
बेटे के मुखिया पद का प्रत्याशी बनने पर हुए थे नाराज
डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दो बेटे थे, बड़े मृत्यंजय प्रसाद, छोटे धनंजय प्रसाद। आजाद भारत में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ होने के बाद, 1957 में पहली बार जीरादेई पंचायत के लिए चुनाव हुआ, जिसमें धनंजय प्रसाद मुखिया पद के लिए चुनाव में खड़े हो गए। उस दौर में हाथ उठाकर चुनाव होते थे, उस वक्त कुछ विवाद हो गया। नतीजा, चुनाव स्थगित हो गया। इसके कुछ समय बाद, राजेंद्र प्रसाद गांव आए तो उन्हें इसकी जानकारी मिली, इस पर वे धनंजय पर चुनाव में खड़े होने के लिए बहुत नाराज हुए।
उद्घाटन की बाट जोह रही फोटो गैलरी
स्मारक की दुर्दशा देखकर, उसे पर्यटन योग्य बनाने के उद्देश्य से क्षेत्र के शिक्षाविद संजीव सिंह ने कुछ करना चाहा तो उनके पसीने छूट गए। आखिर में वे दिल्ली में डीजी एएसआई से मिले और उनसे मदद का अनुरोध किया। डीजी ने बजट की कमी बताते हुए हाथ खड़े कर दिए।
संजीव ने खुद पैसे खर्च करके एक फोटो गैलरी बनाने और कुछ पुनर्निर्माण का प्रस्ताव रखा। खैर, उसे हुज्जत के बाद मान लिया गया और अब एक भव्य फोटो गैलरी बनकर तैयार हो गई है। दो बार उद्घाटन की कोशिश हुई, मगर कोरोना लॉकडाउन के चलते कार्यक्रम नहीं हो सका।
मेधावी छात्र, कई भाषाओं के ज्ञाता
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, बेहद मेधावी छात्र थे। घर की परंपरा के मुताबिक, उन्हें पांच वर्ष की उम्र में उर्दू के अध्ययन के लिए एक मौलवी को सौंप दिया गया था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छपरा (बिहार) के जिला स्कूल में हुई।
- 18 वर्ष की उम्र में उन्होंने, कोलकाता विवि की प्रवेश परीक्षा, प्रथम श्रेणी से पास करके दाखिला लिया था। 1915 में उन्होंने कानून में मास्टर डिग्री हासिल की और कानून में ही पीएच.डी. की डिग्री ली। तत्कालीन प्रेसीडेंसी कॉलेज में उनकी एग्जाम शीट देखकर, उनके एग्जामिनर ने कहा था कि 'द एक्जामिनी इज बेटर देन एग्जामिनर'।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, हिंदी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, बांग्ला, गुजराती समेत 17 भाषाओं के अच्छे जानकार थे।
- उनकी स्मरण शक्ति के कई किस्से हैं, उनमें से एक यह है कि 32 पेज के किसी दूसरे के लिखे एक भाषण की स्क्रिप्ट खो गई। इस स्क्रिप्ट को उन्होंने एक बार पढ़ा था, जरूरत पड़ने पर उन्होंने डिक्टेट करके उसे दोबारा लिखवा दिया। जब कुछ दिनों बाद उस भाषण की गुम हुई स्क्रिप्ट मिली तो उनके द्वारा डिक्टेट करके लिखवाए गए भाषण और मूल भाषण में एक अक्षर का भी फर्क नहीं मिला।