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Yuva Najariya: युवाओं को अवसाद से बचाने के लिए दें भावनात्मक संबल

Wed, 07 Feb 2024 11:24 PM IST
भूपेंद्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, हिसार (हरियाणा)
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- शिवम उपाध्याय, विजय विहार कॉलोनी, हिसार कैंट - फोटो : संवाद
शिवम उपाध्याय विजय विहार कॉलोनी हिसार कैंट के अनुसार आपने कभी न कभी अपने मां बाप को यह कहते जरूर सुना होगा कि बेटा एक बार सरकारी नौकरी लग जा, फिर जो तेरा मन करे, वो करना। लोगों को भी यह कहते सुना होगा कि सरकारी नौकरी सबसे अच्छी और ऐशो आराम से भरी नौकरी होती है। भारत में ज्यादातर लोग सरकारी नौकरी को सबसे अच्छा मानते हैं, इसीलिए आजकल ज्यादातर बच्चे सरकारी नौकरी पाने की जद्दोजहद में लगे हैं। वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग जाते हैं।

आंकड़ों के अनुसार हर साल करीब 2 करोड़ बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए आवेदन करते हैं, इन परीक्षाओं में जेईई, नीट, एनडीए, आदि परीक्षाएं शामिल हैं, जिनमें से करीब 1 लाख आवेदकों का चयन होता है। इन परीक्षाओं की तैयारी कर रहे प्रतियोगी बच्चे दिन का अधिकांश समय अकेले में अपनी तैयारी करते हुए बिताते हैं।

ऐसे में अकेलेपन और मानसिक तनाव के कारण प्रतियोगियों पर अवसाद का खतरा बढ़ जाता है, इसके कारण बच्चे खुदकुशी तक कर लेते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक अकेलेपन और अवसाद का सीधा संबंध है। अवसाद आगे चलकर हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी खतरनाक बीमारी का कारण भी बन सकता है।

कई बार इन प्रतियोगी युवाओं पर इनके परिवार, रिश्तेदार और मां बाप की तरफ से भी काफी दबाव डाला जाता है। इससे यह होता है कि वे जीतोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन जब वे किसी कारणवश असफल होते हैं, तो अपनी याददाश्त और काबिलियत पर संदेह करने लगते हैं। आत्म संदेह या सेल्फ डाउट की वजह से उन्हें मानसिक तनाव हो जाता है। इससे भी अवसाद का खतरा बढ़ जाता है।

प्रतियोगी बच्चे अक्सर पढ़ाई का समय निर्धारित करना भूल जाते हैं और दिन-रात पढ़ते हुए बिताते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक नींद और ध्यान का सीधा संबंध है। अपनी नींद को ताक पर रखकर तैयारी करने वाले प्रतियोगियों को अपनी पढ़ाई में ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत होने लगती है। इससे उनमें चिड़चिड़ापन व तनाव बढ़ता है। जो आगे चलकर अवसाद को जन्म देता है।

इसके अलावा भारत की बढ़ती जनसंख्या के कारण और सीटों की कमी के कारण हर साल काफी प्रतियोगी भरसक प्रयास के बाद भी इन परीक्षाओं को पास नहीं कर पाते और खुद को दोष देने लगते हैं। इससे भी उनके दिमाग में तनाव आदि बढ़ता है। प्रतियोगियों को यह बात समझने होगी की भारत में सिर्फ 2 प्रतिशत लोग ही सरकारी विभाग में कार्यरत हैं, परंतु भारत में 30 प्रतिशत लोग सफल हैं। इसका अर्थ है कि सिर्फ सरकारी विभाग ही सफलता और अच्छी आय का जरिया नहीं है। इसलिए वे अपने प्रयास को व्यर्थ न समझें।
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- डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्रा, पूर्व प्राचार्य - फोटो : संवाद
विशेषज्ञ की राय
वास्तव में आज का युवा अपेक्षाकृत कहीं अधिक सुविधा संपन्न है। इसके बावजूद वे तनाव, कुंठा, चिंता व अवसाद से घिर जाते हैं। लगातार उदासी, खराब मूड या चिड़चिड़ापन और कम से कम दो सप्ताह तक सामान्य गतिविधियों में रुचि न लेना या किसी बात में खुशी अनुभव न होना आदि अवसाद के मानसिक लक्षण हैं। इसके साथ शारीरिक लक्षण भी हैं जैसे- नींद में खलल, थकान व बेचैनी आदि। संज्ञात्मक लक्षण जैसे अपने और भविष्य के बारे में नकारात्मक विचार, ध्यान केंद्रित करने या निर्णय लेने में कठिनाई होती है। अवसाद संक्षिप्त उदासी या हानि अथवा तनावपूर्ण घटना पर अपेक्षित प्रतिक्रिया से कहीं अधिक है। असफल होने और अकेले पड़ते जाने का निरंतर बढ़ता जा रहा है।

यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है। इसपर गंभीरता के साथ विचार-विमर्श बेहद जरूरी है। वास्तव में अवसाद वृद्धि के लिए किसी एक कारण को इंगित नहीं किया जा सकता है। यह संभवत: वित्तीय दबाव, सामाजिक अलगाव, प्रतिस्पर्धा दौड़ और जलवायु परिवर्तन जैसे अनेक कारकों के कारण है। विश्वव्यापी दृष्टिकोण से देखा जाए तो हमें परिवार को लेकर पुरातन और आधुनिक प्रतिक्रियाएं नजर आती हैं। वहीं नए मूल्यों का उजागर होना भी नजर आता है। इसपर गंभीरता से विचार-विमर्श की आवश्यकता है। अपनी अपेक्षाओं और आकांक्षाओं पर अंकुश लगाकर अपने बच्चों के लिए भी अभिभावक समय निकालें। अपने बच्चों की भावनाओं, उलझनों, हताशा, निराशा व परेशानियों के बीच भावनात्मक संबल की एक मजबूत कड़ी जोड़ने की जरूरत है। बाजारवाद व उपभोक्तावादी संस्कृति से बचना बेहद जरूरी है। - डॉ. सुरेंद्र कुमार मिश्रा, पूर्व प्राचार्य

यह भी जानें
2023 के आंकड़ों के अनुसार, 11.5 प्रतिशत युवा गंभीर असवाद की चपेट में हैं। हर 7 में से 1 भारतीय बीमार है। इनमें से भी 4.57 करोड़ अवसाद और 4.49 करोड़ लोग चिंता के शिकार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े बताते हैं कि हर साल 8 लाख लोग मानसिक बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर लेते हैं। इनके अलावा हजारों लोग ऐसे भी होते हैं, जो आत्महत्या की कोशिश करते हैं।
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मीनाक्षी, विद्या नगर, भिवानी - फोटो : संवाद
प्रतियोगी बच्चों में बढ़ता अवसाद
आधुनिक युग में वैश्वीकरण के दौर में जहाँ हमारे लिए अनेकों संभावनाओं का द्वार खोला है वहीं प्रतिस्पर्धा को भी कई गुणा बढ़ा दिया है। इस प्रतिस्पर्धा की दौड़ में जीतना हर कोई चाहता है ताकि अपने लिए एक बेहतर भविष्य सुनिश्चित कर सके। कुछ यही स्थिति प्रतियोगी बच्चों में भी देखने को मिल रही है। आज हर क्षेत्र में इंजीनीयर, मेडिकल, आर्ट, सीविल सर्विस आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए, प्रतियोगियों को परीक्षा से गुजरना पड़ता है। यह परीक्षा तय करती है कौन सफल है और कौन असफल। यही असफलता का भय और इससे उत्पन्न होने वाली भविष्य की चिंता, निराशा में बदलते समय नहीं लगता जिससे आजकल 14-16 साल की बालिक अवस्था की आयु के बच्चे बढ़ते अवसाद का शिकार हो रहें हैं।

इस अवसाद के और कई कारण है जिसमें प्राथमिक रूप से सीमित सीट होना, प्रतियोगिता में बच्चों की बढ़ती संख्या जिससे प्रतियोगिता कठिन होती है और सफलता दर घट जाता है। इस असफलता के दर को माता-पिता का दबाव , अपेक्षा और सहपाठियों के साथ तुलनात्मक भाव और बढ़ा देता है। और तो और कोचिंग सेंटर्स ने तैयारी के स्तर को इतना बढ़ा दिया है की रेस में बने रहने के लिए घंटों पढ़ाई करनी पड़ती है और खेलकूद का समय भी नहीं मिलता अथवा शारीरिक दुर्बलता मानसिक दुर्बलता को बढ़ा देती है। ऊपर से माता-पिता बच्चों को समय भी नहीं दे पाते क्योंकि रोजी-रोटी की समस्याओं में उलझे रहते हैं। इस स्थिति में कोई सहायता न मिलने पर बच्चे आत्महत्या जैसी गंभीर कदम उठा लेते हैं ।

इस स्थिति को विचार कर सुधार करने की आवश्यकता है। पहले तो सरकार और निजी क्षेत्र में रोजगार को बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि प्रतिस्पर्धा का स्तर कम हो। दूसरा अभिभावकों को परीक्षा में सफलता को जीत हार का मापदंड नहीं बनने देना चाहिए ताकि बच्चों को विश्वास दिलाया जाए की एक परीक्षा में असफलता उनके जीवन और भविष्य का निर्धारण नहीं करेगी। तीसरा बच्चों को नियमित शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना चाहिए क्योंकि तन स्वस्थ होगा तभी तो मन स्वस्थ होगा। अंततः कोचिंग सेंटर्स के कार्यपालन पर भी सरकार को रस्सी कसनी होगी ताकि प्रतिस्पर्धा का बुखार बच्चों पर ना चढ़े।

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- सुनीता, कीर्ति नगर, भिवानी - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
आजकल प्रतियोगिता का युग है, हर क्षेत्र में प्रतियोगिता के माध्यम से एक दूसरे को पछाड़कर हर कोई आगे निकलना चाहता है, परंतु पढ़ने वाले छात्रों में इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ रहा है। भारत में मध्यवर्ग के माता पिता अपने बच्चों को अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर या सिविल सेवा का बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं। ज्यादातर वे स्वयं जो काम नहीं कर पाए ' वे अपने बच्चों से करवाने की अपेक्षाएं रखते हैं।

अभिभावकों को बच्चों की रुचि, पढ़ने का उनका स्तर, सोच विचार व उनसे तालमेल करके उनमें आत्म विश्वास पैदा करना, हीन भावना दूर करना, खेलों में डालना या संवाद रखने का समय नहीं होता, बल्कि दूसरों के बच्चों की उच्च सफलता का भूत स्वार रहता है और वे मनोगत तौर पर अपने बच्चों से यही अपेक्षा लेकर चलते हैं। एक कक्षा में कई स्तर के बच्चे होते हैं, उनकी पारिवारिक तौर पर अध्ययन करने के तरीके, माता-पिता से संवाद, घर के वातावरण इत्यादि का अलग-अलग प्रभाव होता है, उनका अंक हासिल करने का स्कोर, सीखने समझने का दृष्टिकोण भी अलग-अलग होता है।

गृह परीक्षाओं व अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में जो छात्र अच्छे अंक ले जाते हैं, उनका हौंसला बढ़ जाता है और वे आत्म विश्वास से भर जाते हैं, कुछ विद्यार्थी कम अंक प्राप्त कर पाते हैं, वे पिछड़ जाते हैं, माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाने की चिंताओं से ग्रस्त होकर हीन भावना के तहत अवसाद के शिकार हो जाते हैं और उनमें पीछे रहने की कुंठा पैदा जाती है। वे इस बात को अपने सहपाठी या संवाद हीनता के कारण अपने माता पिता को बताने का संकोच करते हैं और अपने मन ही मन दुखी होकर अवसाद ग्रस्त होने पर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।

जहां-जहां मैडिकल व इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए कोचिंग सेंटर चलाते हैं, वहां शिक्षक अक्सर पीड़ित छात्रों के मनोविकार पर ध्यान देने के बजाए बस एक ही स्पीड से अपना कोर्स पूरा करने पर बल देते रहते हैं। छात्रों से फीडबैक लेने का उनके पास समय ही नहीं होता। सरकारों ने भी हमारी शिक्षा प्रणाली में सफलता का एक ही पैमाना तय कर रखा है कि जो छात्र उच्चतम स्कोर लाएगा वही इस तरह के कोर्सों में दाखिल होगा।

इससे बच्चों की सर्वोत्तम योग्यता का पता नहीं लगता और विषय को समझने के बजाय एक रट्टा लगाकर ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की होड़ रहती है , यह हमारे बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक परिपाटी है।

इसलिए बच्चों के अभिभावक, शिक्षा जगत व हमारी सरकारों को हमारी दोष युक्त शिक्षा प्रणाली तथा परीक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा, ताकि बच्चों की रुचि, उनका स्तर, पारिवारिक आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उनका सर्वांगीण विकास हो, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, कला, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, भूगोल, पेशेवर व्यवसाय इत्यादि विषयों में रुचि के अनुसार आगे बढ़ सकें। इससे उनकी आत्मघात की बीमारी रुक सकती है। 
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- बिदामो देवी, आकाशवाणी हिसार उद्घोषिका, लुदास, हिसार - फोटो : संवाद
शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा से मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की बढ़ती व्यापकता : बिदामो देवी
व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं को अनिवार्य कर दिए जाने के बाद से भारतीय छात्रों को प्रतिस्पर्धा करने और प्रदर्शन करने के लिए भारी तनाव का सामना करना पड़ता है। प्रदर्शन के दबाव को संभालने, माता-पिता की अपेक्षाओं को पूरा करने और आकांक्षाओं को प्राप्त करने में असमर्थता मनोवैज्ञानिक संकट और बाद में अवसाद का कारण बन सकती है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अकादमिक उत्कृष्टता की निरंतर खोज ने अनजाने में छात्रों के बीच तीव्र दबाव और प्रतिस्पर्धा का माहौल पैदा कर दिया है। शैक्षणिक उपलब्धियों पर अत्यधिक ध्यान देने के साथ-साथ सामाजिक अपेक्षाओं और असफलता के डर ने छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाला है।

इसने चिंता, अवसाद और तनाव जैसे मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों में वृद्धि में योगदान दिया है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए कई बार छात्रों पर अच्छा प्रदर्शन करने का लगातार दबाव रहता है। वे अपनी तुलना दूसरों से करते हैं और आक्रामकता पूर्वक पूर्णता के लिए प्रयास करते हैं। यह अंतर्निहित दबाव मानसिक परेशानी के विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है, जिसमें चिंता, विफलता का डर और कम आत्मसम्मान शामिल है।

गंभीर मामलों में, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं आत्म-नुकसान का कारण बन सकती हैं, और यहां तक कि आत्महत्या के प्रयासों के विचार को भी जन्म दे सकती हैं। छात्रों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों की बढ़ती व्यापकता से निपटने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है जिसमें व्यक्ति, संस्थान और समग्र रूप से समाज शामिल हो। सफलता को फिर से परिभाषित करना और छात्रों को अपने जुनून और रुचियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना उनके मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक है। केवल शैक्षणिक उपलब्धियों पर आधारित सफलता की संकीर्ण परिभाषा से आगे बढ़ने से छात्रों को अपनी अद्वितीय प्रतिभा का पता लगाने और अपने चुने हुए रास्ते में पूर्णता पाने का मौका मिलता है।
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-प्रियंका सौरभ, आर्यनगर, हिसार - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
कठिन प्रतिस्पर्धा के बीच जीवित रहने का संघर्ष करते बच्चे - प्रियंका सौरभ
वर्तमान प्रतियोगी दौर में छात्रों की आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। परीक्षा केंद्रित शिक्षा से भारत में छात्रों की आत्महत्याओं में अंक, अध्ययन और प्रदर्शन के दबाव के साथ अकादमिक उत्कृष्टता की तुलना करना इस अवसाद के पीछे महत्वपूर्ण कारक हैं। भारत में किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे किसी भी छात्र के साथ एक साधारण साक्षात्कार, चाहे वह जेईई, एनईईटी या सीएलएटी हो, यह प्रकट करेगा कि छात्रों के बीच मानसिक संकट का प्रमुख स्रोत उन पर दबाव की असहनीय मात्रा है जो लगभग हर एक द्वारा डाला जाता है। हर शिक्षक, हर रिश्तेदार कठिन अध्ययन और एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश पाने के महत्व को दोहराते हैं। जबकि छात्र स्कूल से स्नातक होने के बाद क्या करने की आकांक्षा रखता है, या जहां उसकी रुचियां हैं, उसके बारे में सहज पूछताछ बहुत कम  की जाती है।

 इन सभी परीक्षाओं की अत्यधिक जटिल प्रकृति (सभी नहीं) का अनिवार्य रूप से मतलब है कि उन्हें पास करने के लिए माता-पिता को अपने बच्चों को प्रतिष्ठित कोचिंग सेंटरों में दाखिला दिलाने का सपना पूरा करना होगा, इससे छात्र के लिए एक से अधिक तरीकों से समस्या बढ़ जाती है क्योंकि वह कोचिंग पर माता-पिता द्वारा खर्च किए गए पैसे को चुकाने के लिए अब परीक्षा को पास करने का दबाव बढ़ गया है और उसे कोचिंग संस्थान के अतिरिक्त दबावों का भी सामना करना पड़ता है।

जब तक देश की परीक्षा संस्कृति से इस कुत्सित व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जाता है, तब तक छात्रों में आत्महत्या की दर को रोकने के मामले में कोई प्रत्यक्ष परिवर्तन नहीं देखा जाएगा। सरकार को इस मुद्दे पर संज्ञान लेना चाहिए, अगर वास्तव में हम सोचते है कि “आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। जबरन करियर विकल्प देने से कई छात्र बहुत अधिक मात्रा में दबाव के आगे झुक जाते हैं, खासकर उनके परिवार और शिक्षकों से उनके करियर विकल्पों और पढ़ाई के मामले में। शैक्षिक संस्थानों से समर्थन की कमी के चलते बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से निपटने के लिए सुसज्जित नहीं है और मार्गदर्शन और परामर्श के लिए केंद्रों और प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी है।

आत्महत्या के जोखिम कारकों को कम करने के लिए शिक्षकों को द्वारपाल के रूप में प्रशिक्षित करना और परीक्षा के नवीन तरीकों को अपनाया जाना चाहिए। छात्रों की सराहना करने की आवश्यकता है और यह बदलना महत्वपूर्ण है कि भारतीय समाज शिक्षा को कैसे देखता है। यह प्रयासों का उत्सव होना चाहिए न कि अंकों का। छात्रों की चिंताओं, अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों को दूर करने के लिए सभी स्कूलों/कॉलेजों/कोचिंग केंद्रों में प्रभावी परामर्श केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। बढ़ते संकट को दूर करने के लिए अतीत की विफलताओं से सीखना और  छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों, संस्थानों और नीति निर्माताओं सभी हितधारकों को शामिल करने वाले तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। 
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डॉ. सत्यवान सौरभ, बड़वा, सिवानी - फोटो : अमर उजाला
परीक्षा और नतीजे जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं है -डॉ. सत्यवान सौरभ
वैसे तो इस दौर में पूरी युवा पीढ़ी ही भयावह मानसिक व्याधि से विचलित है, इनमें विशेषत: छात्र विचलन गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। हमारे देश में प्रति 100 में 15 से अधिक छात्र आत्महत्या से प्रभावित हो रहे हैं। वे अवसाद, चिंता और आत्मघात से पीड़ित पाए जा रहे हैं। कठिन प्रतिस्पर्धा और पढ़ाई-लिखाई में अनुशासन आदि को लेकर तनाव बढ़ रहा है, उससे न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था से जुड़े लोगों, बल्कि पूरे समाज की चिंता बढ़ती गई है।

पारिवारिक दबाव, शैक्षिक तनाव और पढ़ाई में अव्वल आने की महत्वाकांक्षा ने छात्रों के एक बड़े वर्ग को गहरे मानसिक अवसाद में डाल दिया है। अभिभावकों के सपनों की उड़ान न भर पाने वाले, परीक्षा में खराब प्रदर्शन करने वाले बच्चों को घर पर पिटना पड़ता है। परीक्षा और नतीजों के दबाव में छात्रों की आत्महत्याएं अब आम घटनाएं बनती जा रही हैं।

छात्र आत्महत्याओं में बेतहाशा वृद्धि के पीछे मानसिक तनाव सबसे आम कारक बन चुका है। तनावग्रस्त छात्रों की आत्महत्याओं का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। जैसे-जैसे परीक्षा के दिन निकट आते हैं, छात्रों का तनाव हद से गुजरने लगता है।

पूरी युवा पीढ़ी का परीक्षा के दिनों में ऐसे हालात से दो-चार होना देश और समाज, अभिभावकों और शिक्षाविदों, सभी के लिए अब गंभीर चिंता का विषय हो चला है। शिक्षा क्षेत्र में दशकों से व्याप्त कई बुनियादी गंभीर समस्याओं और चुनौतियों पर अभी तक पार पाने में कतई कामयाब नहीं हो पा रहा है।

प्रतियोगी पाठ्यक्रम के भारी भरकम बोझ से बच्चों का मानसिक विकास अवरुद्ध हो रहा है। इससे बच्चों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। बच्चों के जीवन में तनाव के पौध की बड़ी वजह यह भी है कि लंबे समय तक स्कूल के घंटों के बाद बच्चे घर लौटते ही होमवर्क निपटाने में जुट जाते हैं। इसके बाद ट्यूशन के लिए दौड़ पड़ते हैं। खाना-पीना, सोना, खेलकूद, सब हराम हो जाता है। आराम करने और अन्य पाठ्येतर गतिविधियां करने का उन्हें समय ही नहीं मिलता है।

ऐसे में छात्रों के लिए कम नींद और अवसाद की स्थिति या गंभीर तनाव का सबब बनी रहती है। ऐसे कठिन दौर में, आज छात्रों में आत्महत्या की प्रकृति और प्रवृत्ति का नए सिरे से अध्ययन करने की भी बहुत जरूरत है, क्योंकि देश की पूरी युवा बौद्धिक संपदा दांव पर लगी हुई है, जिसके दूरगामी गंभीर नतीजे पूरे राष्ट्र के माथे पर गहरा सिकन ला सकते हैं। युवाओं के कंधे पर स्थापित विकासशील प्रगति का पूरा ढांचा ही भरभरा कर गिर सकता है। छात्रों को इसे चुनौती के रूप में लेते हुए पूरी क्षमता के साथ इसका सामना करना चाहिए।  

परीक्षा जीवन-मृत्यु का प्रश्न नहीं है। परीक्षा परिणामों को जीवन का अंतिम आधार न मानकर अपनी सफलता की राह स्वयं बनानी होती है। बिना श्रम के जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिलती। अभिभावकों को यह समझना है कि उन्हें अपने बच्चों के साथ कैसा घरेलू बर्ताव करना है।
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