- सुनीता, कीर्ति नगर, भिवानी
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आजकल प्रतियोगिता का युग है, हर क्षेत्र में प्रतियोगिता के माध्यम से एक दूसरे को पछाड़कर हर कोई आगे निकलना चाहता है, परंतु पढ़ने वाले छात्रों में इसका विपरीत प्रभाव भी पड़ रहा है। भारत में मध्यवर्ग के माता पिता अपने बच्चों को अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर या सिविल सेवा का बड़ा अधिकारी बनाना चाहते हैं। ज्यादातर वे स्वयं जो काम नहीं कर पाए ' वे अपने बच्चों से करवाने की अपेक्षाएं रखते हैं।
अभिभावकों को बच्चों की रुचि, पढ़ने का उनका स्तर, सोच विचार व उनसे तालमेल करके उनमें आत्म विश्वास पैदा करना, हीन भावना दूर करना, खेलों में डालना या संवाद रखने का समय नहीं होता, बल्कि दूसरों के बच्चों की उच्च सफलता का भूत स्वार रहता है और वे मनोगत तौर पर अपने बच्चों से यही अपेक्षा लेकर चलते हैं। एक कक्षा में कई स्तर के बच्चे होते हैं, उनकी पारिवारिक तौर पर अध्ययन करने के तरीके, माता-पिता से संवाद, घर के वातावरण इत्यादि का अलग-अलग प्रभाव होता है, उनका अंक हासिल करने का स्कोर, सीखने समझने का दृष्टिकोण भी अलग-अलग होता है।
गृह परीक्षाओं व अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं में जो छात्र अच्छे अंक ले जाते हैं, उनका हौंसला बढ़ जाता है और वे आत्म विश्वास से भर जाते हैं, कुछ विद्यार्थी कम अंक प्राप्त कर पाते हैं, वे पिछड़ जाते हैं, माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाने की चिंताओं से ग्रस्त होकर हीन भावना के तहत अवसाद के शिकार हो जाते हैं और उनमें पीछे रहने की कुंठा पैदा जाती है। वे इस बात को अपने सहपाठी या संवाद हीनता के कारण अपने माता पिता को बताने का संकोच करते हैं और अपने मन ही मन दुखी होकर अवसाद ग्रस्त होने पर आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।
जहां-जहां मैडिकल व इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए कोचिंग सेंटर चलाते हैं, वहां शिक्षक अक्सर पीड़ित छात्रों के मनोविकार पर ध्यान देने के बजाए बस एक ही स्पीड से अपना कोर्स पूरा करने पर बल देते रहते हैं। छात्रों से फीडबैक लेने का उनके पास समय ही नहीं होता। सरकारों ने भी हमारी शिक्षा प्रणाली में सफलता का एक ही पैमाना तय कर रखा है कि जो छात्र उच्चतम स्कोर लाएगा वही इस तरह के कोर्सों में दाखिल होगा।
इससे बच्चों की सर्वोत्तम योग्यता का पता नहीं लगता और विषय को समझने के बजाय एक रट्टा लगाकर ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की होड़ रहती है , यह हमारे बच्चों के भविष्य के लिए खतरनाक परिपाटी है।
इसलिए बच्चों के अभिभावक, शिक्षा जगत व हमारी सरकारों को हमारी दोष युक्त शिक्षा प्रणाली तथा परीक्षा प्रणाली में आमूल चूल परिवर्तन करना होगा, ताकि बच्चों की रुचि, उनका स्तर, पारिवारिक आर्थिक, सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप उनका सर्वांगीण विकास हो, खेल, सांस्कृतिक गतिविधियों, कला, इतिहास, विज्ञान, साहित्य, भूगोल, पेशेवर व्यवसाय इत्यादि विषयों में रुचि के अनुसार आगे बढ़ सकें। इससे उनकी आत्मघात की बीमारी रुक सकती है।