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हौसले को सलाम: अपनी तरह की दिव्यांग महिलाओं को रोजगार दे रहीं शशिकला, इनकी कहानी जानकर गर्व करेंगे आप

Wed, 16 Jun 2021 12:35 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।

सार

पिपराइच क्षेत्र के स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष हैं दिव्यांग शशिकला
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शशिकला ने दिव्यांग महिलाओं को जोड़कर बनाया स्वयं सहायता समूह। - फोटो : अमर उजाला।
कोरोना महामारी के दौर में जब लोगों का रोजगार छिन रहा था तब गोरखपुर जिले के मुड़ियारी बुजुर्ग गांव की दिव्यांग शशिकला अपनी जैसी दिव्यांग छह महिलाओं को रोजी-रोजगार से जोड़ रही थीं। उनके स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं सोलर लैंप निर्माण, सिलाई, कढ़ाई और दस्तकारी के जरिए हजारों रुपये प्रतिमाह कमा रही हैं।  

जन्म होने के एक साल बाद पोलियो का शिकार हुई शशिकला कहती हैं कि संघर्ष उनकी किस्मत में बचपन में ही लिख गया था लेकिन हार मानना नहीं सीखा। अनुसूचित जाति और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार की होने के बावजूद शशिकला ने पढ़ाई जारी रखी। सरकारी नौकरी नहीं मिली लेकिन आत्मनिर्भर बनने के प्रयास जारी रहे। प्रदेश सरकार की महिला सशक्तीकरण योजना के तहत बैंक सखी का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद गांव में जनसेवा केंद्र खोला, सरकार ने केंद्र संचालन के लिए खाते में 75 हजार रुपये भी डाले। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई तो अपने जैसी अन्य दिव्यांग महिलाओं को आगे बढ़ाने का ख्याल आया। इस दौरान गोनरहा गांव निवासी उमेश पांडेय मिले, उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की जानकारी दी और इससे मिलने वाले लाभ बताए।
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शशिकला। - फोटो : अमर उजाला।
शशिकला ने 2019 में गांव की छह दिव्यांग महिलाओं को जोड़ कर जनाधार आजीविका समूह का गठन किया। समूह ने ब्लॉक मुख्यालय पर सोलर लैंप बनाने का प्रशिक्षण लिया। लॉकडाउन में मांग कम हो गई। समूह की महिलाओं को रोजगार देने के लिए उन्होंने समूह की बचत, सरकारी मदद और निजी धन मिलाकर आठ सिलाई मशीन खरीदी। 
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सिलाई करती महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।
लॉकडाउन के दौरान मास्क, एप्रन आदि बनाकर बेचे गए। समूह की महिलाओं की आर्थिक समृद्धि हुई तो गांव की युवतियां भी उनसे जुड़ गईं। गांव की मीना, सुनीता, अनीता, काजल, संध्या, जान्हवी, सरोज आदि अनेक महिलाएं सिलाई, कढ़ाई आदि सीख कर प्रतिमाह अच्छी आमदनी कर रही हैं।  
 

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सिलाई करती महिलाएं। - फोटो : अमर उजाला।
गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का है जुनून
शशिकला कहती हैं गांव की सभी युवती और महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का सपना रखती हैं। कहती हैं कि यदि समाज कल्याण विभाग, जिलाधिकारी, जन प्रतिनिधियों का साथ मिले तो गांव के सिलाई कढ़ाई केंद्र को बड़े पैमाने पर विकसित करेंगी।
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सिलाई-कढ़ाई और दस्तकारी के हुनर से प्रति माह कमा रहीं 10 से 12 हजार रुपये। - फोटो : अमर उजाला।
थोक मात्रा में कपड़ा, कच्चा माल मंगाकर सलवार सूट, फ्रॉक आदि रेडीमेड ड्रेस तैयार कराई जाएं। इससे गांव की लगभग सभी महिलाओं को काम और रोजगार मिलेगा। वह अपने गांव को औद्योगिक गांव के रूप में विकसित करना चाहती हैं।
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