जिंदगी में हर पल दुश्वारियां और ठोकरें। बड़ी से बड़ी विपत्ति आई पर वे टूटीं नहीं। बल्कि संघर्ष की बदौलत अग्निपथ पर चलती रहीं। न सिर्फ घर की माली हालत सुधारी बल्कि बेटों को पढ़ालिखा कर काबिल बनाया। ऐसी ही कुछ जुनूनी माताओं से रूबरू कराते हैं, जो समाज के लिए नजीर बन गईं।
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ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व सहजनवां तहसील की एसडीएम अनुज मलिक अपनी मां के साथ।
- फोटो : अमर उजाला।
मां-बेटी कोरोना वारियर, एक दिल्ली में दूसरी गोरखपुर में लड़ रही जंग
2017 बैच की तेज तर्रार आईएएस व ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व सहजनवां तहसील की एसडीएम अनुज मलिक अपनी सूझ बूझ, कड़ी मेहनत और ईमानदारी की वजह से लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। खुद के जान की परवाह किए बिना कोरोना वायरस से लोगों को बचाने के साथ ही साथ हर तबके के लोगों की मदद को अगली पंक्ति में खड़ी रहती हैं।
इसी का नतीजा रहा कि वह कोरोना संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आईं और उन्हें खुद को क्वारंटीन करना पड़ा। अनुज मलिक पर उनकी मां राजेश मलिक बहुत गर्व करती हैं। अनुज के साथ ही उनकी मां राजेश मलिक भी कोरोना वारियर हैं।
दिल्ली के लाजपत नगर की निवासी और स्वास्थ्य विभाग में न्यूटरीनिस्ट राजेश मलिक गर्व से कहती हैं कि एक मां को और क्या चाहिए कि उनकी बेटी न केवल प्रशासनिक सेवा जैसे सर्वोच्च पद पर काबिज है बल्कि एक अदृश्य जानलेवा बीमारी से लोगों को बचाने और उनकी मदद में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हो। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट व एसडीएम सदर गौरव सिंह सोगरवाल अनुज मलिक के पति हैं।
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परिवार के साथ इंद्रपरी।
- फोटो : अमर उजाला।
आठवीं पास इंद्रपरी ने बच्चों को पहुंचाया शिखर पर
तारामंडल इलाके में रहने वाली आठवीं पास इंद्रपरी के सामने 1991 में उस वक्त विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा, जब उनके इंजीनियर पति की असामयिक निधन हो गया। लेकिन जज्बे की बदौलत उन्होंने न सिर्फ खुद को फौलादी बनाया बल्कि बच्चों को मां का प्यार दिया, साथ ही पिता की भूमिका भी निभाई। आज उनके बेटे ही नहीं बहुएं भी शिखर पर हैं।
देवरिया रुद्रपुर के छपरा बुजुर्ग गांव के सोमेश्वरनाथ त्रिपाठी पीडब्लूडी में अवर अभियंता थे। 41 वर्ष की उम्र में ही उनका निधन हो गया। पत्नी इंद्रपरी पर तीन बेटों और दो बेटियों की जिम्मेदारी आ गई। बुरा वक्त आया तो रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया। कम पढ़ी लिखी होने के चलते उनकी इच्छा थी कि बच्चे पढ़ लिखकर काबिल बनें।
लिहाजा पूरा ध्यान बच्चों की पढ़ाई पर केंद्रित कर दिया। बड़े बेटे अश्वनी को पिता की जगह नौकरी मिल गई। दूसरे बेटे प्रदुम्न त्रिपाठी का चयन वर्ष 2001 में भारतीय राजस्व सेवा में हो गया। जबकि तीसरा बेटा अरुण 2008 में दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हो गया।
इंद्रपरी ने बेटी का विवाह अच्छे परिवार में किया। यही नहीं उनकी दो बहुएं भी भारतीय विदेश सेवा में हैं। इंद्रपरी को जहां अपने बच्चों की कामयाबी पर खुशी है तो बच्चे भी मां के त्याग को ही अपनी कामयाबी का मूलमंत्र मानते हैं।
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बच्चों के साथ बिंद्रावती देवी।
- फोटो : अमर उजाला।
मुफलिसी में नहीं हारी हिम्मत, तदबीर से बदली तकदीर
चमक रहा है सितारा जमाने में मेरे नाम का, मिल गया है नतीजा मुझे मेरे काम का। यह पंक्तियां मेहनतकश और जुनूनी मां बिंद्रावती देवी के लिए सटीक बैठती हैं। बिंद्रावती को आज अपने परवरिश पर गर्व होता है।
शहर के नौसड़ की रहने वाली बिंद्रावती देवी के दो पुत्र इस समय पुलिस की सेवा में हैं और एक अधिवक्ता हैं। चार बच्चों की मां बिंद्रावती के पति धर्मदेव यादव की आर्थिक स्थिति शुरू से ही कमजोर थी। धर्मदेव गाय-भैंस पालकर दूध बेचा करते थे और उससे घर का खर्च चलाते थे।
जबकि बिंद्रावती खेत में काम करने के साथ ही घर पर चारों बच्चों अनिल, रंजीत, अमरजीत एवं मोनू की परवरिश में लगी रहती थीं। पढ़ी नहीं थीं, फिर भी बिंद्रावती ने कभी भी बच्चों की पढ़ाई के साथ समझौता नहीं किया।
वे बच्चों को रोज स्कूल छोड़ने जाया करती थीं। बच्चों ने भी मन लगाकर पढ़ाई की और मां की उम्मीदों पर खरे उतरे। बड़े बेटे अनिल का झारखंड पुलिस में चयन हो गया। तो वहीं तीसरे नंबर के बेटे अमरजीत भी उत्तर प्रदेश पुलिस में चयनित हो गए। दूसरे नंबर का बेटे रंजीत अधिवक्ता हैं। सबसे छोटा बेटा मोनू अभी पढ़ाई कर रहा है।
बेटी दीक्षा के साथ प्रियंबदा त्रिपाठी।
- फोटो : अमर उजाला।
मेंटर बन बेटी का बढ़ाया मनोबल, बेटी ने भी नेशनल खेल दिया तोहफा
मेरे पास जो भी शोहरत है वो मेरी मां की बदौलत है...ये पंक्तियां पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय में कार्यालय अधीक्षक के पद पर कार्यरत खिलाड़ी प्रियंबदा त्रिपाठी पर सटीक बैठती हैं। एथलीट और जैवलिन थ्रो की खिलाड़ी प्रियंबदा कभी भारतीय टीम से नहीं खेल सकीं, यह मलाल उन्हें हमेशा रहा लेकिन अपनी बेटी दीक्षा त्रिपाठी को हॉकी खेलने को प्रोत्साहित किया।
उनकी मेंटर बनकर हर पल खड़ी रहीं। मां की परवरिश और मनोबल बढ़ाने का नतीजा है कि आज दीक्षा कई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में अपनी चमक बिखेर चुकी हैं। फिलहाल वह प्रयागराज में सीनियर टीटीई के रूप में कार्यरत होने के साथ ही इंडिया के लिए कैंप कर रही हैं।