मुम्बई से ट्रेन में बैठकर जब श्रमिक, बीबी बच्चों के साथ गोरखपुर चले तो उन्हें इस बात की खुशी थी कि अब अच्छे दिन आएंगे, पर उन्हें क्या पता उनका सफर सांसत भरा होगा। भूखे प्यासे श्रमिकों का कहना था कि साहब, कब ट्रेन गोरखपुर पहुंचेगी इसी चिंता में रात कट गई। कोई बताने वाला नहीं था। हम लोग तो किसी तरह भूखे रह गए पर बच्चों के चिल्लाने से मन तड़प उठता था।
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- फोटो : अमर उजाला।
मुम्बई से 36 घंटे की बजाय 63 घंटे की यात्रा के बाद रविवार को सुबह करीब 9 बजे ट्रेन गोरखपुर पहुंची तो ट्रेन से उतरे श्रमिकों का दर्द छलक उठा। यह वही ट्रेन है जो रास्ता बदलकर ओडिशा होकर आई। अपनी पीड़ा साझा करते हुए श्रमिक भावुक हो गए।
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वसई से आये सहजनवां के रमेश ने बताया की वसई में खाने के लाले पड़ गए थे। ट्रेन 21 मई की शाम को रवाना हुई थी। जब उन्होंने बिलासपुर स्टेशन देखा तो हैरान हो गए कि ये कहां जा रहे हैं। पहले लगा कि गलत ट्रेन में बैठ गए। जब मोबाइल पर ट्रेन के मिसिंग होने की सूचना देखी तब पता चला कि ट्रेन सही है, रास्ता बदल गया है।
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कोच डी 6 में बैठे आजमगढ़ के वहीब का कहना था कि डर में पूरी रात कट गई। कोच में सभी लोग खौफ में थे। ट्रेन राउरकेला में रुकी तो टीटीई से ट्रेन की जानकारी ली। टीटीई ने बताया कि इसका रूट बदला गया है यह आसनसोल होते हुए गोरखपुर जाएगी। इसके बाद सभी के जान में जान आई।
इसी कोच में सवार मिर्जापुर के राजकुमार बोले, रात में जब बच्चे भूख से रोने लगे तो उन्हें पानी पिलाकर किसी तरह सुलाया। राउरकेला स्टेशन पर किसी तरह से चाय-बिस्किट का इंतजाम किया। भोजन तो दूर की बात, पानी भी नसीब नहीं हो रहा था।