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कोरोना खौफ के बीच कमाने निकले श्रमिक, बोले- 'पेट की खातिर सब करना पड़ता है'

Wed, 10 Jun 2020 09:03 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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gorakhpur railway station - फोटो : अमर उजाला।
कोरोना संक्रमण के डर से सांसत भरा सफर तय कर घर आने वाले श्रमिक अब रोजगार की तलाश में अपने पुराने ठिकानों को लौटने लगे हैं। हालांकि, इनकी संख्या अभी बहुत कम है, लेकिन यह शुरूआत है।
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gorakhpur railway station - फोटो : अमर उजाला।
श्रमिकों का कहना है कि गांवों में मजदूरों की संख्या बहुत हो गई है, उस हिसाब से काम ही नहीं है। अब अगर कोरोना से डरेंगे तो घर का चूल्हा जलना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि कमाएंगे नहीं तो खाएंगे क्या? अब तो कोरोना के साथ जीने  की आदत डालनी पड़ेगी। इसी सोच के साथ गोरखधाम एक्सप्रेस में सोमवार को बैठे कुछ यात्रियों से बात की गई तो उन्होंने अपनी बात साझा की।
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gorakhpur railway station - फोटो : अमर उजाला।
देवरिया के अरविंद कुमार ने कहा कि हिसार की एक फैक्टरी में काम करता हूं। होली में घर आया था उसके बाद लॉकडाउन शुरू हो गया। फैक्टरी शुरू हो गई है वहां से फोन आया था। काम पर जा रहा हूं। अगर कोरोना संक्रमण के बारे में सोचूंगा तो घर का खर्च कैसे चलेगा।
 

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gorakhpur railway station - फोटो : अमर उजाला।
गोपालगंज के मनोज गुप्ता का कहना है कि साहब, परिवार को घर छोड़कर जा रहा हूं। यह सही है कि बड़ी मुश्किल से लॉकडाउन के बीच मार्च के अंतिम सप्ताह में दिल्ली से घर पहुंचे थे। लेकिन,गांव में कोई काम मिल ही नहीं रहा है। कितने दिन तक उधार पर गाड़ी चलेगी। वापस दिल्ली जा रहा हूं, अब तो कोरोना के बीच ही जिंदगी जीना है।
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gorakhpur railway station - फोटो : अमर उजाला।
कुशीनगर के महेंद्र ने कहा कि हिसार में रिफाइनरी फैक्टरी में काम करता हूं। होली में घर आया था, उसके बाद लॉकडाउन होने से यहीं रह गया। बहुत कोशिश की लेकिन मेरे लायक काम नहीं मिला। गांव में भी प्रधान जिस पर मेहरबान होंगे उसे ही मनरेगा में काम मिलेगा। मजदूर बहुत ज्यादा हो गए हैं, इसीलिए फिर से फैक्टरी में जा रहा हूं। वहां तो काम मिल जाएगा।
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