गोबर से निर्मित भगवान गणेश की मुर्ति।
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धूप नहीं, इन मूर्तियों को हवा से सुखाते हैं
मीनाक्षी राय ने बताया कि इन मूर्तियों को धूप में नहीं, बल्कि हवा में सुखाते हैं। धूप लगने से इसमें दरारें आ जाती हैं। हवा में पूरी तरह से सूख जाने के बाद इन्हें प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है।
पर्यावरण को नहीं करेंगी प्रदूषित, खाद के रूप में भी हो सकेंगी इस्तेमाल
दिवाली के दौरान सामान्य तौर पर गौरी गणेश की मूर्तियां, दीपक, स्वास्तिक आदि मिट्टी या चीनी मिट्टी के बनाए जाते हैं। मिट्टी की मूर्तियों को बनाने के बाद उन पर केमिकल पेंटिंग की जाती हैं। फिर अगली दिवाली के बाद इन मूर्तियों को नदी, तालाब या पोखर में विसर्जित करने की मान्यता है। ऐसे में केमिकल रंग से रंगी हुई मूर्तियों की वजह से सिर्फ नदियां या तालाब ही प्रदूषित नहीं होते, बल्कि कालांतर में भूगर्भ जल प्रदूषित होता है। लेकिन, गोबर की मूर्तियां पानी को प्रदूषित नहीं करेंगी। पानी में डालने पर यह पूरी तरह से घुल जाएंगी। अगर इनको जल में प्रवाहित नहीं करना चाहते हैं तो इन्हें गमले में रख दिए जाने पर कुछ दिन में यह पानी से घुल कर खाद के रूप में बन जाएंगी।