शहीद रामप्रसाद बिस्मिल।
- फोटो : अमर उजाला
दरअसल, 19 दिसंबर 1927 में जब जिला कारागार में बिस्मिल को फांसी दी गई तो शहर में निकली उनकी शवयात्रा इसी घंटाघर पर आकर रुकी थी। उसी दौरान बिस्मिल की माता ने यहां पर प्रेरणादायी भाषण भी दिया था। इस घटना के बाद यह स्थान पूरी तरह से पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को समर्पित हो गया।