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Diwali 2021: गोरखपुर का वह गांव जहां सीएम योगी बिना लोग नहीं मनाते दिवाली, आदित्यनाथ ने बदल दी इनकी जिंदगी

Tue, 02 Nov 2021 04:48 PM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।

सार

100 साल से उपेक्षित वनटांगियों के जीवन में सीएम योगी के प्रयासों से आई खुशहाली
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सीएम योगी आदित्यनाथ। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
गोरखपुर के कुसम्ही जंगल स्थित वनटांगिया गांव जंगल तिकोनिया नंबर तीन। ऐसा गांव जहां दीपोत्सव पर हर दीप 'योगी बाबा' के नाम से जलता है। साल दर साल यह परंपरा ऐसी मजबूत हो गई है कि 60 साल के बुजुर्ग भी बच्चों की तरह जिद करते हुए बोलते हैं कि बाबा नहीं आएंगे तो दीया नहीं जलाएंगे। बाबा यानी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ।

करीब ढाई दशक पहले बतौर सांसद एवं गोरक्षपीठ उत्तराधिकारी के रूप योगी आदित्यनाथ ने वनटांगियों के साथ दिवाली मनाने की जो परंपरा शुरू की, वह उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी जारी है। उनकी दीवाली की शुरूआत ही इस बस्ती से होती है। इस बार भी उनके आगमन के दिवाली पर सीएम योगी का बस्ती के हर किसी को शिद्दत से इंतजार है। इसके मद्देनजर तैयारियां जोरों पर हैं।

 
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सीएम योगी आदित्यनाथ। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
गोरखपुर-महराजगंज में 23 वनटांगिया गांव
ब्रिटिश हुकूमत में जब रेल पटरियां बिछाई जा रही थीं तो स्लीपर के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों से साखू के पेड़ों की कटान हुई। इसकी भरपाई के लिए बर्तानिया सरकार ने साखू के नए पौधों के रोपण और उनकी देखरेख के लिए गरीब भूमिहीनों, मजदूरों को जंगल मे बसाया। साखू के जंगल बसाने के लिए वर्मा देश की टांगिया विधि का इस्तेमाल किया गया, इसलिए वन में रहकर यह कार्य करने वाले वनटांगिया कहलाए।

कुसम्ही जंगल के पांच इलाकों जंगल तिनकोनिया नंबर तीन, रजही खाले टोला, रजही नर्सरी, आमबाग नर्सरी व चिलबिलवा में इनकी पांच बस्तियां वर्ष 1918 में बसीं। इसी के आसपास महराजगंज के जंगलों में अलग-अलग स्थानों पर इनके 18 गांव बसे। 1947 में देश भले आजाद हुआ लेकिन वनटांगियों का जीवन गुलामी काल जैसा ही बना रहा। जंगल बसाने वाले इस समुदाय के पास देश की नागरिकता तक नहीं थी। नागरिक के रूप में मिलने वाली सुविधाएं तो दूर की कौड़ी थीं। जंगल में झोपड़ी के अलावा किसी निर्माण की इजाजत नहीं थी। पेड़ के पत्तों को तोड़कर बेचने और मजदूरी के अलावा जीवनयापन का कोई अन्य साधन भी नहीं। समय-समय पर वन विभाग की तरफ से वनों से बेदखली की कार्रवाई का भय अलग से लगा रहा।

 
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सीएम योगी आदित्यनाथ। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
वर्ष 1998 में योगी आदित्यनाथ पहली बार गोरखपुर के सांसद बने। उनके संज्ञान में यह बात आई कि वनटांगिया बस्तियों में नक्सली अपनी गतिविधियों को रफ्तार देने की कोशिश में हैं। नक्सली गतिविधियों पर लगाम के लिए उन्होंने सबसे पहले शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को इन बस्तियों तक पहुंचाने की ठानी। इस काम में लगाया गया उनके नेतृत्व वाली महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद की संस्थाओं एमपी कृषक इंटर कॉलेज व एमपीपीजी कालेज जंगल धूसड़ और गोरखनाथ मंदिर की तरफ से संचालित गुरु गोरक्षनाथ अस्पताल की मोबाइल मेडिकल सेवा को। जंगल तिनकोनिया नंबर तीन वनटांगिया गांव में 2003 से शुरू ये प्रयास 2007 तक आते आते मूर्त रूप लेने लगे। इस गांव के रामगणेश कहते है कि वनटांगिया तो अहिल्या थे, महराज जी (योगी आदित्यनाथ को वनटांगिया समुदाय के लोग इसी संबोधन से बुलाते हैं) यहां राम बनकर उद्धार करने आए।

 

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सीएम योगी आदित्यनाथ। (फाइल) - फोटो : अमर उजाला।
वनटांगियों के लिए मुकदमा भी झेला है योगी ने
वनटांगिया लोगों को शिक्षा के जरिये समाज की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए योगी आदित्यनाथ ने मुकदमा तक झेला है। 2009 में जंगल तिकोनिया नंबर तीन में योगी के सहयोगी वनटांगिया बच्चों के लिए एस्बेस्टस शीट डाल एक अस्थायी स्कूल का निर्माण कर रहे थे। वन विभाग ने इस कार्य को अवैध बताकर एफआईआर दर्ज कर दी। योगी ने अपने तर्कों से विभाग को निरुत्तर किया और अस्थायी स्कूल बन सका। हिंदू विद्यापीठ नाम से यब विद्यालय आज भी मौजूद है।

 
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वनटांगिया गांव। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला।
2009 से वनटांगियों संग मनाते हैं दिवाली
वनटांगियों को सामान्य नागरिक जैसा हक दिलाने की लड़ाई शुरू करने वाले योगी ने वर्ष 2009 से वनटांगिया समुदाय के साथ दिवाली मनाने की परंपरा शुरू की। इसके बाद यह सिलसिला बन पड़ा। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी योगी इस परंपरा का निर्वाह करना नहीं भूलते हैं। इस दौरान बच्चों को मिठाई, कापी-किताब और आतिशबाजी का उपहार देकर पढ़ने को प्रेरित करते हैं तो सभी बस्ती वालों को तमाम सौगात। इस बार भी दिवाली पर सीएम योगी के आगमन के मद्देनजर ग्रामीण उत्साह से उनकी अगवानी की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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वनटांगिया गांव तिकोनिया नंबर तीन स्थित सरकारी स्कूल। - फोटो : अमर उजाला।
चार दिवाली में मिटा दी सारी कसक
मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने बीते दिवाली में वनटांगिया समुदाय की सौ साल की कसक मिटा दी है। लोकसभा में वनटांगिया अधिकारों के लिए लड़कर 2010 में अपने स्थान पर बने रहने का अधिकार पत्र दिलाने वाले योगी ने सीएम बनने के बाद अपने कार्यकाल के पहले ही साल वनटांगिया गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा दे दिया। राजस्व ग्राम घोषित होते ही ये वनग्राम हर उस सुविधा के हकदार हो गए जो सामान्य नागरिक को मिलती है। इसी अधिकार से उन्होंने पहली बार पंचायत चुनाव में भागीदारी की और गांव की सरकार चुनी। सिर्फ तिकोनिया नंबर तीन ही नहीं, उसके समेत गोरखपुर-महराजगंज के 23 वनटांगिया गांवों में कायाकल्प सा परिवर्तन दिखता है।
 
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वनटांगिया गांव तिकोनिया नंबर तीन स्थित हिंदू विद्यापीठ। - फोटो : अमर उजाला।
बाबा के बिना तिउहार अधूरा
जंगल तिकोनिया नंबर तीन के बुजुर्ग बंशु बताते हैं, 'गांव में जवन भी काम लउकत बा, सब बाबा के ही करावल है। नाइ त के पूछे वाला रहल। बाबा के गोड़ (पैर) पड़ल त समझा कि उदयार हो गइल।' गांव में सबके लिए पक्का मकान, शौचालय, बिजली, रसोई गैस, खेती के लिए जमीन का पट्टा, बच्चों के लिए स्कूल समेत सीएम योगी से मिले कई सौगातों का जिक्र करते हुए बंशु दिवाली पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आने की खुद ही चर्चा कर उत्साहित हो जाते हैं।
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वनटांगिया बंशु व चन्द्रजीत निषाद। - फोटो : अमर उजाला।
वनटांगिया गांव जंगल तिकोनिया नंबर तीन के मुखिया रहे चंद्रजीत निषाद की आंखों की रोशनी उनके उम्र की विलोमानुपाती होने लगी है लेकिन इन आंखों में योगी आदित्यनाथ के संघर्ष की तस्वीर जीवंत लगती है। 'बाबा जी (योगी) के नजर नाही पड़त त हम्मन के कई पीढ़ी अउर अइसहीं बीत जात।' चंद्रजीत का यही एक वाक्य ही वनटांगियों की जिंदगी के सौ साल और अब साढ़े चार साल के अंतर को स्पष्ट कर देता है।

चंद्रजीत उस घटनाक्रम के भी साक्षी हैं, जब वनटांगिया समुदाय के बच्चों के लिए एक अस्थायी स्कूल खोलने को लेकर वन विभाग ने योगी पर मुकदमा करा दिया था। योगी तब सांसद थे। चंद्रजीत निषाद के मुताबिक, 'बाबा जवन ठान लेवलें वोके हरहाल में पूरा कइके रहेलें। स्कूल बनवले से रोकल जात रहल। आज गांवें में दू गो स्कूल ही नाही बा बल्कि ऊ सब सुविधा-व्यवस्था भी बा जवन शहर में होला। ई सब बाबा जी के ही देन है।'
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