डॉ. चारुशीला सिंह।
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राष्ट्रीय फलक पर बड़ा मंच साझा कर रहीं कवयित्री डॉ. चारुशीला
कवि सम्मेलन और मुशायरे में शहर की कवयित्री डॉ. चारुशीला सिंह ने महज चार वर्षों में नया मुकाम हासिल किया है। डॉ. चारु अब राष्ट्रीय फलक पर बड़े मंचों को साझा कर रही हैं। अपनी दमदार रचनाओं से उन्होंने न सिर्फ बड़े कवियों से सराहना पाई है, बल्कि कई पुरस्कार से नवाजी भी जा चुकी हैं।
मूलत: संतकबीरनगर के देवरिया गंगा की रहने वाली डॉ. चारु कहती हैं कि साहित्य का माहौल उन्हें बचपन से मिला है। इनके पिता डॉ. नर्वदेश्वर सिंह गोरखपुर विश्वविद्यालय में बीएड के विभागाध्यक्ष रहे। शादी के बाद कविताओं के पाठ के लिए मंच तक जाने में उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा। मां के साथ ससुराल के लोग भी पक्ष में नहीं थे। पति रीतेश शाही और पिता ने बहुत साथ दिया। जब वे बड़े मंचों पर कविताओं का पाठ करने लगीं, तो घरवालों की सोच बदल गई।
पढ़ाई में भी टॉपर रहीं
डॉ. चारु पढ़ाई में भी टॉपर रही हैं। तिलक इंटर कॉलेज, सिद्धार्थनगर से कक्षा 10वीं व 12वीं में टॉपर रहीं। उन्हें स्कॉलरशिप भी मिली। गोरखपुर विश्वविद्यालय से हिंदी से एमए और पीएचडी कीं। वर्ष 2011 में वह शिक्षक बनीं और 2012 से एडी राजकीय कन्या इंटर कॉलेज में अध्यापन कर रही हैं।
पुरस्कार व सम्मान
महारानी मोहभक्त लक्ष्मी प्रतिभा सम्मान, शक्ति योद्धा सम्मान, नारी सशक्तीकरण सम्मान, केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा से साहित्य सेवा सम्मान, साहित्य विभूति सम्मान-2021, उत्कृष्ट शिक्षक सम्मान, फ्यूचर लीडर अवॉर्ड।
कुमार विश्वास के साथ कविता पाठ बड़ी उपलब्धि
डॉ. चारु कहती हैैं कि वर्ष 2018 में पहली बार गोरखपुर महोत्सव में मुझे कविता पाठ करने का मौका मिला। मेरे लिए गर्व की बात है कि 2019 से टैलेंट हंट में जज की भूमिका में आ गई। कला उत्सव व एमपी शिक्षा परिषद के संस्थापक समारोह में भी मुझे जज बनाया गया। वह कहती हैं कि कवि सम्मेलनों में महिलाओं को बड़ा मंच कम ही मिलता है। कपिलवस्तु महोत्सव में डॉ. कुमार विश्वास की मौजूदगी में मेरी कविता को बहुत सराहा गया। डॉ. चारु, ‘स्वप्न हूं, कल्पना हूं, मैं साकार हूं, दवा हूं, दर्द हूं, मैं ही उपचार हूं, मैं सृजन भी, प्रलय भी हूं, सुकुमार भी लोग कहते हैं सृष्टि का शृंगार हूं’ को अपनी श्रेष्ठ रचना मानती हैं।