कोरोना वायरस के नाम से जब लोग डरे हुए थे, तब बीआरडी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी की टीम कोरोना के सैंपलों की जांच कर रही थी। दूसरी लहर में ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस ने दस्तक दी तो उसका भी डटकर सामना किया। इस बीच टीम के कई लोग संक्रमित हुए, लेकिन हौसला किसी का नहीं टूटा। इस टीम ने अब तक 8.96 लाख आरटीपीसीआर और 21 हजार ट्रूनेट से जांच की है।
गोरखपुर जिले में कोरोना का पहला केस पिछले साल 26 अप्रैल को मिला था। उससे पहले ही बीआरडी मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी की टीम ने अंजान वायरस से लड़ना शुरू कर दिया था। 24 मार्च 2020 को जब टीम ने पहली जांच की तो उस वक्त कोई भी पॉजिटिव नहीं मिला, लेकिन सबके मन में डर था।
माइक्रोबायोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ अमरेश सिंह बताते हैं कि पहले सैंपल की जांच में कई तरह के सवाल थे। उस वक्त कोरोना वायरस को लेकर पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ था। ऐसे में टीम के लोग डरे हुए थे, लेकिन डर को दरकिनार कर टीम ने काम शुरू किया।
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डॉ. अमरेश सिंह।
- फोटो : अमर उजाला।
इसका नतीजा रहा कि सौ से एक हजार सैंपलों की जांच रोज होने लगी। इस बीच संक्रमण की रफ्तार बढ़ी तो दबाव भी बढ़ा। शासन की ओर से मशीनें बढ़ा दी गईं। अब सात हजार जांच प्रतिदिन की जा रही है।
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डॉ. अमरेश सिंह।
- फोटो : अमर उजाला।
कोविड से जंग जीती, फिर जुट गए काम में
डॉ अमरेश सिंह ने बताया कि बीएसएल थ्री (बॉयोसेफ्टी लैब) की शुरुआत जब हुई तो उसमें भी टीम ने काफी मेहनत की। हर दिन सात हजार से अधिक सैंपल की जांच करते रहे। इस बीच टीम के कई साथी संक्रमित हुए, लेकिन हिम्मत नहीं हारे। संक्रमण से जंग जीतने के बाद फिर से जांच में जुट गए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : istock
ब्लैक और व्हाइट फंगस से भी लड़े
कोरोना की दूसरी लहर कुछ कम हुई तो ब्लैक और व्हाइट फंगस ने दस्तक दे दी। इस पर टीम ने काफी मेहनत की और हर दिन 20 से अधिक सैंपलों की जांच की। जबकि इसमें दो-दो बार जांच करनी पड़ती थी। आखिर जांच क्लचर एंड सेंसटिविटी में 12 घंटे से अधिक का समय लगता था। इसमें खतरा भी अधिक था। इसके बावजूद टीम किसी बहादुर जवान की तरह मोर्चे पर डटी रही।