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Shivkumar Sharma: शिवकुमार ने संगीत की दुनिया से संतूर का कराया परिचय, जानें कैसे बनी शिव-हरि की जोड़ी?

Mon, 13 Jan 2025 09:53 AM IST
सुवेश शुक्ला एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Shivkumar Sharma Birth Anniversary: आज संगीत की दुनिया के धुरंधर पंडित शिवकुमार की बर्थ एनिवर्सरी है। इस मौके पर हम उनके जीवन की कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानेंगे। 
 
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शिवकुमार शर्मा - फोटो : अमर उजाला
‘मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां’, ‘देखा एक ख्वाब’ और ‘जादू तेरी नजर’, जैसे गीतों में संगीत का जादू बिखेरने वाले प्रसिद्ध संतूर वादक शिवकुमार शर्मा को संगीत का साधक कहा जाता है। उन्होंने अपनी संगीत साधना से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। प्रसिद्ध बांसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया के साथ उनकी जोड़ी ने एक कीर्तिमान स्थापित किया। दोनों की लोकप्रियता विश्व भर में है। शायद ही कोई ऐसा हो, जो शिव-हरि की म्यूजिकल जोड़ी के बारे में ना जानता हो। कई राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजे गए दोनों कलाकारों ने फिल्मों में यादगार संगीत देकर अपना सिक्का जमाया। आज संतूर वादक शिवकुमार शर्मा की बर्थ एनिवर्सरी है। इस मौके पर हम उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ अहम बातों को जानेंगे।
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शिवकुमार शर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम
5 साल की उम्र में पकड़ा संगीत का दामन
पंडित शिवकुमार शर्मा का जन्म 13 जनवरी 1938 को जम्मू में पंडित उमा दत्त शर्मा के घर हुआ था। उनके पिता ने उन्हें 5 साल की उम्र में ही तबला और गायन की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी। इनके पिता ने संतूर वाद्य पर बहुत शोध किया और यह निश्चय किया कि शिवकुमार प्रथम भारतीय बनें जो भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजायें। तब उन्होंने 13 वर्ष की आयु से ही संतूर बजाना आरंभ किया। आगे चलकर उनके पिता का यह सपना साकार हुआ। पंडित शिवकुमार शर्मा ने साल 1955 में मुंबई में अपना पहला कार्यक्रम किया। 15 साल की उम्र में उन्होंने जम्मू रेडियो में ब्रॉडकास्टर के तौर पर भी काम किया था।

 
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शिवकुमार शर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम
संतुर ही नहीं गायन और तबला में भी हासिल थी महारथ
संतुर को लोकप्रिय शास्त्रीय वाद्य बनाने का पूरा श्रेय पंडित शिवकुमार शर्मा को ही जाता है। शिवकुमार शर्मा संतूर के महारथी होने के साथ साथ एक अच्छे गायक भी थे। बहुत कम लोगो को पता होगा कि वह संतुर के अलावा बहुत अच्छे तबलावादक भी थे।

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शिवकुमार शर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम
500 रुपये लेकर मुंबई पहुंचे
अपने सपनों को एक नई उड़ान देने के लिए पंडित शिव कुमार शर्मा ने मायानगरी मुंबई का रुख किया। उन्होंने एक बार इस बात का जिक्र किया था कि मुंबई आना उनकी जिंदगी का दूसरा बड़ा जुआ था। पहला जुआ वह तबला छोड़ने को मानते थे, क्योंकि उन्हें एहसास हो गया था कि संतुर बजाने में उनके दिल को ज्यादा खुशी मिलती है।


 
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शिवकुमार शर्मा - फोटो : इंस्टाग्राम
इस फिल्म में पहली बार संतुर का हुआ प्रयोग
संगीत को हमेशा से साधना माना गया है। पंडित शिवकुमार शर्मा ने भी संतुर को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए कड़ी साधना की। संतुर से उन्हें इतना लगाव था कि उन्होंने इसके लिए कई फिल्मों के ऑफर भी ठुकरा दिए। उन्होंने संतुर पर रिसर्च को जारी रखा। जिसकी, बदौलत उन्हें कई दिनों भूखें पेट भी सोना पड़ा। उनकी मेहनत रंग लाई और संतुर ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई। इससे उन्हें खूब शोहरत मिली। उन्होंने साल 1955 में फिल्म ‘झनक-झनक पायल बजे’ के एक सीन के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक कंपोज किया। इस फिल्म में पहली बार संतुर का प्रयोग किया गया था, जो बहुत हिट हुआ। 

 
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शिव कुमार शर्मा - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
कैसे बनी शिव-हरि की जोड़ी?
पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरि प्रसाद चौरसिया की म्यूजिकल जोड़ी को लोग ‘शिव-हरि’ की जोड़ी के रूप में जानते हैं। दोनों की जोड़ी बनाने में यश चोपड़ा का बड़ा हाथ है। इनकी दोस्ती और म्यूजिकल पार्टनरशिप तब शुरू हुई जब यश चोपड़ा ने उन्हें 1970 के दशक में फिल्मों के लिए संगीत रचना का सुझाव दिया। शिवकुमार और हरि प्रसाद चोपड़ा को बीआर चोपड़ा की फिल्मों में संगीत देने के कारण जानते थे। जब चोपड़ा स्वतंत्र निर्माता-निर्देशक बन गए, तो वे चाहते थे कि वे उनकी फिल्मों के आर्केस्ट्रा में शामिल हों। साल 1980 में, चोपड़ा ने उन्हें फिल्म ‘सिलसिला’ के लिए संगीत के लिए कहा, जिसे वह उस साल लॉन्च कर रहे थे। हालांकि, खय्याम ने पहले इस परियोजना को ठुकरा दिया था, इसलिए चोपड़ा शर्मा और चौरसिया के पास गए थे।

इस जोड़ी के शुरुआती काम में साल 1967 का कॉन्सेप्ट एल्बम ‘कॉल ऑफ द वैली’ शामिल है, जिसमें गिटारिस्ट बृज भूषण काबरा ने काम किया था। यह एल्बम गिटार के इस्तेमाल के मामले में काफी नया था और इसे अब तक रिकॉर्ड किए गए सबसे सफल भारतीय शास्त्रीय संगीत एल्बमों में से एक माना जाता है। इसके अलावा, शिवकुमार ने चौरसिया के साथ मिलकर कई हिंदी फिल्मों के लिए संगीत बनाए, जिसकी शुरुआत सिलसिला (1981) से हुई और उन्हें शिव-हरि संगीत जोड़ी के रूप में जाना जाने लगा। जिन फिल्मों के लिए उन्होंने संगीत तैयार किया उनमें से कुछ संगीतमय हिट रहीं, जैसे ‘फासले’ (1985), ‘चांदनी’ (1989), ‘लम्हे’ (1991) और ‘डर’ (1993)। अपने करियर में दोनों ने लंबे समय तक साथ काम किया और दोनों के बीच गहरी दोस्ती भी थी। 
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