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Randeep Hooda: पिता की मेहनत की कमाई बेचकर रणदीप ने बनाई स्वातंत्र्य वीर सावरकर, सेट पर घटी थी भूतिया घटना

Sat, 30 Mar 2024 12:27 PM IST
दीक्षा पाठक एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
 स्वातंत्र्य वीर सावरकर की बायोपिक आखिरकार राष्ट्रीय शहीद दिवस के मौके पर यानी 22 मार्च 2024 को रिलीज हुई और इसे दर्शकों का खूब प्यार मिला। 'स्वातंत्र्य वीर सावरकर' में रणदीप हुड्डा ने मुख्य भूमिका निभाई है। साथ ही उन्होंने इस फिल्म के जरिए अपने निर्देशन करियर की भी शुरुआत की। अब रणदीप ने बताया है कि इस फिल्म को बनाने के लिए उन्होंने अपने पिता की संपत्ति भी बेच दी थी। आइए जानते हैं कि अभिनेता ने क्या कहा है।
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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रणदीप हुड्डा हाल ही में, बीयरबाइसेप्स पॉडकास्ट में नजर आए। उन्होंने फिल्म के साथ अपनी यात्रा पर चर्चा की और इस बात पर जोर दिया कि इसे विश्व स्तर पर देखा जाए और इसे चुनावी वर्ष के दौरान दक्षिणपंथी रचना के रूप में न देखा जाए। उन्होंने फिल्म को पिछले साल 15 अगस्त और फिर 26 जनवरी को रिलीज करने की अपनी योजना का भी खुलासा किया है।
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रणदीप हुड्डा - फोटो : अमर उजाला
किरदार को निभाने के लिए अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए, रणदीप ने बताया कि उन्होंने फिल्म के लिए काफी वजन कम किया, लेकिन असली चुनौती शूटिंग के दौरान उस वजन को बनाए रखने की थी। अभिनेता ने खाना खाए बगैर, केवल पानी, ब्लैक कॉफी और ग्रीन टी पर निर्भर होकर फिल्म का निर्देशन किया। बाद में, उन्होंने अपने भोजन में चीला, डार्क चॉकलेट और नट्स को शामिल किया। इससे उन्हें नींद आने में दिक्कत होने लगी और वह सेट पर कई बार गिर पड़े थे।

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रणदीप हुड्डा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म के निर्माण को लेकर रणदीप ने कहा, 'मेरे पिता ने पैसे बचाकर मेरे लिए मुंबई में दो-तीन प्रॉपर्टी खरीदी थी। मैंने उन्हें बेच दिया और फिर वो पैसा फिल्म में लगाया। मैं खुद को रोक नहीं पाया। इस फिल्म को किसी का भी सपोर्ट नहीं मिला था।'
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रणदीप हुड्डा-स्वातंत्र्यवीर सावरकर - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
 सेल्युलर जेल में शूटिंग के अपने अनुभव का खुलासा करते हुए रणदीप ने कहा, “मैं सावरकर की कोठरी में कुछ समय अकेले बिताना चाहता था, इसलिए मैंने उसमें बंद रहने को कहा। कुछ देर तक मैं ठीक था, लेकिन फिर, मुझे लगा कि दीवारें मुझ पर गिर रही हैं। मैं मदद के लिए चिल्लाने लगा, लेकिन मेरी आवाज दूर तक नहीं गई। मैं क्लॉस्ट्रोफोबिक हो गया, मेरी सांसें उखड़ने लगीं।”

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