कमाल अमरोही जब तक अमरोहा में रहे, उनका नाम रहा सैयद अमीर हैदर कमाल नकवी। 16 साल के रहे होंगे कि घर वालों से फिल्म में काम करने को लेकर कहासुनी हुई और एक दिन भाग निकले। पहुंचे लाहौर जहां उन दिनों हिंदुस्तान की तमाम फिल्में बना करती थीं। कहानियां वह पहले ही लिखने लगे थे। किसी तरह यहां कुंदन लाल सहगल से सोहबत हो गई और उनके साथ ही एक दिन वह चले आए बंबई। तब फिल्मों के संवाद हिंदी उर्दू मिश्रित हिंदुस्तानी होती थी और बंबइया सिनेमा में लाहौर से आने वाले को खास तवज्जो मिलती थी। कुंदन लाल सहगल ने कमाल की कलम के कमाल से ही उनको पहचाना था। कमाल उन दिनों उर्दू पत्रिकाओं के लिए कहानियां लिखा करते थे और इसी के दौरान उन्होंने ओरिएंटल कॉलेज से फारसी और उर्दू में पढ़ाई भी पूरी की। मुंबई आने के बाद कई साल कमाल ने खूब मेहनत की और फिर शानदार फिल्में बनाईं। कमाल अमरोही को ज्यादातर लोग उनकी फिल्म ‘पाकीजा’ के लिए ही जानते पहचानते हैं लेकिन उनकी अशोक कुमार और मधुबाला स्टारर फिल्म ‘महल’ भी कमाल की फिल्म रही और ‘रजिया सुल्तान’ के लिए भी कम मेहनत उन्होंने नहीं की। कमाल अमरोही की फिल्म ‘दायरा’ भी अपने समय के हिसाब से काफी विचारोत्तेजक फिल्म रही। आज के बाइस्कोप में हम बातें करेंगे फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ की जो 16 सितंबर 1983 को रिलीज हुई।
फिल्म- रजिया सुल्तान
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
यूं शुरू हुई फिल्म ‘रजिया सुल्तान’
कमाल अमरोही का सिनेमा कभी भी हंसी हंसी सिनेमाघरों तक नहीं पहुंचा। हर फिल्म के हजार अफसाने हैं। ‘रजिया सुल्तान’ भी पहले बताते हैं कि अमिताभ बच्चन के साथ बनने वाली थी। जब वह इस विषय पर रिसर्च कर रहे थे तो उन्हें पेरिस के किसी संस्थान में रजिया सुल्तान पर लिखी एक किताब हासिल हुई। उस किताब को पढ़ते ही उन्होंने तुरंत इस पर फिल्म बनाने की ठान ली। ठीक वैसे ही जैसे ‘दायरा’ की शूटिंग खत्म होते ही उन्होंने ‘पाकीजा’ की शूटिंग शुरू करने की ठान ली थी। ‘पाकीजा’ की शुरूआत 1956 से मानी जाती है और ये फिल्म रिलीज हो सकी थी 1972 में। ‘पाकीजा’ पहले ब्लैक एंड व्हाइट में शूट हुई। फिर इसे कलर में शूट किया है और फिर सिनेमास्कोप में शूट किया। बीच में छह साल तो ये फिल्म यूं ही डिब्बा बंद पड़ी रही क्योंकि मीना कुमारी और कमाल अमरोही में बोलचाल ही नहीं थी। बड़ी मुश्किल से ये फिल्म रिलीज हुई तो शुरू में तो लोग ही इसे देखने नहीं आए लेकिन तभी लंबी बीमारी के बाद मीना कुमारी चल बसीं। उनके दुनिया छोड़ने ने लोगों को इस फिल्म के सिनेमाघरों का रास्ता बता दिया और फिल्म सुपरहिट हो गई।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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अमिताभ बच्चन को मिला था ये रोल
‘रजिया सुल्तान’ का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है, हालांकि ‘पाकीजा’ के मुकाबले ये कुछ नहीं है। इस फिल्म को पूरा करने में कमाल अमरोही ने सिर्फ आठ साल लगाए। रजिया सुल्तान पर लिखी किताब मिलने के बाद जब फिल्म शुरू हुई तो वह खुद फिल्म के निर्माता थे और फिल्म के हीरो थे, अमिताभ बच्चन। बाद में धर्मेंद्र ने जो रोल किया, उसे तब अमिताभ बच्चन को करना था और विजयेंद्र घाटगे वाले रोल के लिए कमाल ने कबीर बेदी को साइन किया था। लेकिन, फिल्म को जब तक फ्लोर पर लाने की नौबत आई, कमाल अमरोही को समझ आया कि अब ये फिल्म बतौर प्रोड्यूसर बना पाना उनके बूते की बात नहीं है। तमाम पैसा वह तब तक कमालिस्तान स्टूडियो बनाने में भी लगा चुके थे। तो फिल्म के निर्माता बने ए के मिश्रा और उनके बैनर राजधानी फिल्म्स के तले ही ‘रजिया सुल्तान’ का निर्माण हुआ। फिल्म के लिए कमाल अमरोही ने बंबई और हॉलीवुड सब एक कर दिया था। फिल्म के तमाम सीन्स में जो कमाल के स्पेशल इफेक्ट्स दिखते हैं, वे सब कमाल ने वहीं हॉलीवुड में ही कराए। साल 1983 के हिसाब से ये बड़ा काम था जो कमाल अमरोही ने कर दिखाया था। कमाल ये भी था कि सत्तर के दशक की सबसे हिट जोड़ी धर्मेंद्र और हेमा मालिनी एक साथ फिल्म में काम कर रहे थे और साथ में थी परवीन बाबी।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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जावेद अख्तर के पिता ने लिखे गीत
फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ का संगीत आज तक लोगों को याद है। जावेद अख्तर के पिता जां निसार अख्तर ने फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ के गाने लिखने का बीड़ा उठाया था। मशहूर शायर मजाज की बहन साफिया से शादी करने वाले जां निसार अख्तर उर्दू के मशहूर विद्वान और शिक्षक रहे हैं, उनका लिखा अब भी उतना ही सामयिक माना जाता है, जितना कि उन दिनों में था। इस फिल्म की मेकिंग के दौरान ही जां निसार का इंतकाल हुआ और फिल्म के बाकी बचे दो गाने तब निदा फाजली ने लिखे। फिल्म का संगीत खय्याम ने दिया है। वैसे, कमाल अमरोही ने फिल्म की शुरूआत में इसके संगीत के लिए लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को ही लेने का फैसला किया था और दोनों ने फिल्म के लिए कुछ धुनें भी बनाईं।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को निकाला फिल्म से
ये वह दौर था जब लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी अपनी लोकप्रियता के सबसे ऊंचे शिखर पर थी और कमाल अमरोही ने तब उनके बनाए एक तेज रफ्तार गाने को खारिज कर दिया था। इसके बाद लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से संपर्क नहीं हो पा रहा था तो कमाल अमरोही एक दिन उनसे मिलने पहुंच गए। बताते हैं कि वहां उनसे इंतजार करने को कह दिया गया। वह थोड़ी देर तो वहां रुके फिर उन्हें लगा कि ये तो उनकी बेइज्जती है और वह वहां से चल दिए। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को फिल्म से बाहर करने के बाद उन्होंने खय्याम को फिल्म का संगीतकार नियुक्त किया और कम से कम इस मामले में कमाल अमरोही का फैसला बिल्कुल सही रहा। खय्याम को इस फिल्म के लिए बेस्ट म्यूजिक डायरेक्टर का फिल्मफेयर नॉमीनेशन भी मिला। उस साल फिल्म ‘सौतन’ के लिए उषा खन्ना, फिल्म हीरो के लिए ‘लक्ष्मीकांत प्यारेलाल’ और फिल्म ‘बेताब’ के लिए आर डी बर्मन को भी इस पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। उस साल ये पुरस्कार जीता था आर डी बर्मन ने फिल्म ‘मासूम’ के संगीत के लिए।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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कला निर्देशक को मिला पुरस्कार
फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ को बनाना आसान काम नहीं था, लेकिन कमाल अमरोही माने ही जाते रहे कमाल की फिल्में बनाने के लिए। टर्की की विरासत को दिल्ली के माहौल में सजाने के लिए जिम्मेदारी मिली थी कला निर्देशक एन बी कुलकर्णी को और उन्होंने पूरी रिसर्च के साथ फिल्म का माहौल बिल्कुल गुलाम वंश के दौर का ही रच दिया था। इसका इनाम भी उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार के तौर पर मिला। रजिया सुल्तान दिल्ली के तख्त पर बैठने वाली सिर्फ भारत की ही नहीं बल्कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की पहली ऐसी महिला रही जिसने ऐसी कोई पदवी हासिल की। रजिया सुल्तान को महिला सशक्तिकरण का पहला उदाहरण माना जा सकता है। लेकिन, एक तो उनकी शख्सीयत के साथ जुड़े विवाद, दूसरे उन पर लगा आक्रांताओं की वारिस होने का तमगा, उनके लिए भारतीय इतिहास में तो नुकसानदायक रहा ही, फिल्मी परदे पर भी इन्हीं बातों ने फिल्म को नुकसान पहुंचाया। ‘मुगले ए आजम’ की राइटिंग टीम में शामिल रहे कमाल अमरोही ने भी ‘रजिया सुल्तान’ खुद ही लिखी लेकिन अपने उर्दू और फारसी ज्ञान का मुजाहिरा करने के चक्कर में वह फिल्म के संवादों को दर्शकों से दूर कर बैठे। दर्शकों की तो दूर फिल्म में अभिनय करने वाले धर्मेंद्र तक नहीं समझ पा रहे थे कि वह कैमरे के सामने बोल क्या रहे हैं। और, ये तब जब कि धर्मेंद्र को हिंदी सिनेमा के ऐसे गिनती के लोगों में गिना जाता है जो न सिर्फ उर्दू में लिखते हैं बल्कि उर्दू का काफी ज्ञान भी रखते हैं।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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रजिया सुल्तान का समलैंगिक रिश्ता!
अगर आपने शो मैन संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावत’ देखी है तो आपको याद होगा कि इसमें अलाउद्दीन खिलजी के बच्चाबाजी के शौक को बड़े होने के बाद भी दिखाया गया है। ऐसा ही कुछ इशारा कमाल अमरोही ने फिल्म ‘रजिया सुल्तान’ में किया था। यहां कमाल अमरोही ने रजिया सुल्तान के समलैंगिक होने का इशारा दिया फिल्म के खास गाने ‘ख्वाब बन कर कोई आएगा’ में। हेमा मालिनी और परवीन बाबी का एक दूसरे को लेकर आकर्षण दोनों की आखों की लाली से यहां बयां होता है। रजिया सुल्तान का बदन तमाम जुंबिशें और करवटें इस दौरान लेता है और दोनों के बीच चुंबन का भी इशारा इस गाने में मिलता है। इस दृश्य को लेकर काफी हो हल्ला भी हुआ और बताते हैं कि जब ये फिल्म बाद में दूरदर्शन पर दिखाई गई तो उसमें ये गाना और उसके पास के दृश्य इसी वजह से हटा दिए गए थे। फिल्म में पैसा लगाने वाले इसके निर्माता ए के मिश्रा बिहार से ताल्लुक रखते थे। राजनीति में अच्छा खासा दखल रखने वाले ए के मिश्रा ने ही दिल्ली टेरिटरी में ‘पाकीजा’ रिलीज की थी और फिल्म ने उनकी तिजोरियां भर दी थीं। बताते तो ये भी है कि उनका हथियारों का बड़ा कारोबार रहा। फिल्म में धर्मेंद्र की त्वचा का रंग लगातार बदलते रहने के भी खूब किस्से उन दिनों बने थे, हालांकि फिल्म में उन पर फिल्माए गए इस गाने के कद्रदान अब भी बहुत हैं, जिसे गाया है उन दिनों विविध भारती पर रात 10 बजे आने वाला कार्यक्रम ‘छायागीत’ पेश करने वाले कब्बन मिर्जा ने।
फिल्म- रजिया सुल्तान
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‘मजनू’ बंद कर बनाई ‘रजिया सुल्तान’
कमाल अमरोही की बनाई चारों फिल्मों के बारे में तो लोगों ने कभी न कभी कुछ न कुछ तो सुना और पढ़ ही रखा है। लेकिन उनकी एक अधूरी फिल्म भी बहुत चर्चा में रही है जिसे बनाने के लिए कमाल अमरोही को खुद राजेश खन्ना ने अपने घर बुलवाया था। इस फिल्म पर दोनो के बीच लंबी बातचीत हुई। कहानी फाइनल हुई। कास्ट और क्रू सब फाइनल होने के बाद कमाल अमरोही ने फिल्म के दो गाने भी संगीतकार खय्याम के साथ बैठकर रिकॉर्ड कर लिए। इस फिल्म का नाम था मजनू और इसका बहुत बड़े पैमाने पर हुई एक पार्टी में मुहूर्त भी हुआ। ये फिल्म बंद करने के बाद ही कमाल अमरोही ने शुरू की थी ‘रजिया सुल्तान’। इस फिल्म के फ्लॉप होने के बाद कमाल अमरोही ने फिर किसी दूसरी फिल्म को बनाने का दीवानापन नहीं दिखाया। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।